Saturday, June 29, 2013

What we are willing to learn lessons from the tragedy Uttarakhand?

ब से उत्तराखंड में लालची लोगों द्वारा निर्मित आपदा आयी है, जिसे प्राकृतिक संसाधनों को डॉलर के भाव से सौदा कर मौज-मस्ती करने वाले लोग प्राकृतिक आपदा की संज्ञा देने पर तुले हुए हैं, तब से मैं बहुत खुश हूं। लेकिन क्या मेरी खुशी का कारण हजारों लोगों की मौत, तड़पन और बेबसी है? क्या आपदा प्रबंध की लाचारी देखकर मैं प्रसन्न हूं? या क्या इस परिस्थिति में भी भाजपा और कांग्रेस के बीच चल रहे वोट बटोरने की राजनीति से मैं खुश हूं? बिल्कुल नहीं! ये सब मेरी खुशी के कारण कभी नहीं हो सकते हैं। पिछले एक सप्ताह से राष्‍ट्रीय न्यूज चैनलों के संपादक चिल्ला-चिल्ला कर यह कह रहे हैं कि उत्तराखंड की आपदा मानव निर्मित है। यह लालची लोगों की देन है। यह अंधाधुंध विकास का परिणाम है। यह पैसा कमाने के लिए पहाड़ों की खुदाई और विकास के नाम पर नदियों का रास्ता बदलने का प्रतिफल है, इत्यादि-इत्यादि। और यही मेरी खुशी के कारण हैं।
यह इसलिए क्योंकि यही बात बार-बार कहने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों ने हम जैसे लाखों लोगों को प्रताड़ित किया, हजारों के खिलाफ फर्जी मुकदमा दायर किया, सैंकड़ों लोगों को जेलों में डाला, बहुतों को गोलियों से भून डाला और कई परिवारों को लाचार बना दिया। लेकिन कुदरत ने एक झटके में ही रास्ता मोड़ दिया है। आज वही बात बड़े-बड़े मीडिया घरानों के संपादक डंके की चोट पर कह रहे हैं और सरकारें निर्लज्‍ज की तरह चुपचाप सुन रही हैं। आज मिस्टर एडिटर ने भी अपने अखबार के फ्रांट पेज में लीड स्टोरी लिखी है, जिसका शीर्षक है – ‘मौजूदा आर्थिक विकास मॉडल के पाप का परिणाम है उत्तराखंड में हुई तबाही’। क्या लाजवाब है? मैं क्यों न गदगद रहूं? ऐसा लगता है कि अब संपादकगण ‘एक्टिविस्ट’ बन गये हैं। हमारी जगह अब वे कह रहे हैं कि प्रकृति का सौदा महंगा है जनाब! लेकिन डर यह है कि ये लोग कितने दिनों तक इसे बरकरार रख पाएंगे, क्योंकि यही लोग हमारे जैसे आदिवासियों को विकास विरोधी, पिछड़ा, राष्‍ट्रद्रोही और न जाने क्या-क्या कह चुके हैं। हमलोग वर्षों से यही तो कह रहे हैं कि जंगलों को काट कर विकास करना कितना खतरनाक है, पहाड़ों को खोदकर इमारत बनाना मंहगा पड़ेगा, नदियों को बहने दो, प्रकृति का जरूरत के हिसाब से उपयोग करो और प्रकृति के साथ जीना सीखो। पर हमलोग की कौन सुने, हमलोग असभ्य जो ठहरे?
लेकिन उत्तराखंड में प्रकृति ने इस कदर तबाही मचायी कि स्‍वयं को प्रकृति से ज्यादा बुद्धिमान और शक्तिशाली समझनेवाले तथाकथित शिक्षित, सभ्य एवं विकसित कहलाने वाले लोग तबाह हो गये और देश के चारों ओर शोर मचा रहे हैं कि सरकार ने उन्हें समय पर सहायता नहीं पहुंचायी, यात्रा का सही प्रबंध नहीं किया एवं सरकार अक्षम है, इत्यादि। लेकिन ये लोग खुद का गुनाह स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं कि उन्होंने अब तक प्राकृतिक संसाधनों को विकास के नाम पर बेचकर अपनी जेब गरम की, प्रकृति का सौदा कर मौज-मस्ती की और प्रकृति को तड़पाते रहे। क्यों उन्होंने कभी नहीं सोचा कि उनका अप्राकृतिक कार्य प्रकृति को कितना नुकसान पहुंचा सकता है? इसलिए अब प्रकृति की बारी थी और उसने दिखा दिया कि जितना भी दंभ भर ले इंसान, लेकिन वह प्रकृति से ज्यादा ताकतवर कभी नहीं बन सकता है और प्रकृति का सौदा करना उसके लिए बहुत महंगा साबित होगा।
यहां यह बात नहीं भूलना चाहिए कि जब जयराम रमेश ने उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों को इको सेंसिटिव जोन घोषित करने का आदेश जारी किया था, तो लोग विरोध पर उतर आये थे। इसमें भाजपा और कांग्रेस दोनों पार्टियों के वैसे नेता शामिल थे, जो प्रकृति को बेचकर मौज-मस्ती में जुटे हुए हैं। भाजपा सरकार की तरह ही वर्त्तमान कांग्रेस सरकार भी इको सेंसिटिव जोन घोषित करने के खिलाफ है क्योंकि वहां उनकी कमाई का जरिया खत्म हो जाएगा। यह भी प्रत्‍यक्ष है कि दोनों पार्टियों को देश के पूंजीपति ही चलाते हैं इसलिए उनके खिलाफ कोई निर्णय नहीं लिया जा सकता है। अगर यहीं पर आदिवासियों को जंगलों से हटाने की बात होती, तो अब तक उन्‍हें हटा दिया गया होता, यही पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी का तर्क देकर। उत्तराखंड में तीन सौ डैम का निर्माण हो रहा है, पहाड़ों में सुरंग खोदकर नदियों का रास्ता बदल दिया गया, बेहिसाब खनन, पहाड़ों पर होटलों का बेहिसाब निर्माण और धर्म के नाम पर जरूरत से ज्यादा पर्याटन। प्रकृति इसे कैसे बर्दास्त कर सकती थी? ये लोग विकास के नाम पर विनाश का खाका तैयार कर रहे थे।
कुछ भी हो, आजकल मैं और मेरे मित्र संजय कृष्‍ण बत्ती जलाकर यह खोजने की कोशिश में जुटे हैं कि ‘विकास और आर्थिक तरक्की’ के मुद्दे पर बड़ा-बड़ा तर्क देने वाले कवि, लेखक, बुद्धिजीवी, उद्योगपति और बड़े-बड़े थिंक टैंक कहां खो गये? क्या उन्हें सांप सूंघ गया या चील-कौवे खा गये? जब आदिवासी लोग यह तर्क देते हैं कि प्राकृतिक संसाधन का उपयोग इंसान की जरूरत के हिसाब से किया जाए और इसका बेहिसाब दोहन नहीं होना चाहिए, तब उन्हें तो सीधे तौर पर विकास विरोधी घोषित कर दिया जाता है। लेकिन हद तो यह है कि अब भी कुछ व्यापारी समूह (उद्योगपति, नेता और नौकरशाह) यह मानने को ही तैयार ही नहीं हैं कि उत्तराखंड की त्रासदी प्रकृति के दोहन का परिणाम है। वे अब भी दबी जुबान से ही सही, लेकिन यह कह रहे हैं कि विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन जरूरी है। लेकिन ऐसे लोगों की संख्या फिलहाल तो न के बराबर ही है। हो सकता है कुछ दिनों के बाद उत्तराखंड की त्रासदी को भुलाकर वे फिर से प्रकृति का सौदा करने में जुट जाएं।
देखा जाए तो भारत के संविधान में यह वादा किया गया है कि देश के सभी लोगों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय मिलेगा। लेकिन हकीकत में ऐसा क्यों नहीं होता है? क्यों मुकेश अंबानी का छह सदस्यीय परिवार 44 सौ करोड़ रुपये से निर्मित 27 मंजिला मकान में रहता है, जबकि देश में लाखों परिवारों के पास रहने के लिए मकान नहीं हैं? क्या अंबानी ने इतने पैसे सही तरीके से कमाये या सरकार की लूट नीतियों ने उन्हें देश का सबसे अमीर आदमी बना दिया? अब उसी रास्ते को अपना कर हजारों पूंजीपति प्रकृति का सौदा कर जल्द से जल्द मुकेश अंबानी के नजदीक पहुंचने की फिराक में लगे हुए हैं और केंद्र एवं राज्य सरकारें उन्‍हें फायदा पहुंचाने में जुटे हुए हैं। क्या यही विकास है? सवाल यह है कि अगर विकास का अर्थ लोगों के जीवन स्तर में बदलाव एवं खुशहाली लाना है, तो क्या विकास के इस रास्ते को अपना कर देश के 125 करोड़ लोगों के जीवन स्तर में बदलाव एवं खुशहाली लायी जा सकती है?
अगर आप हमारे देश में चल रहे आधुनिक विकास या आर्थिक विकास को प्राकृतिक संसाधनों का सौदा करके ही बढ़ाने के पक्ष में हैं, इसका मतलब यह समझ लीजिए कि आप प्रकृति के खिलाफ लड़ रहे हैं, जिसमें न सिर्फ आपकी हार तय है बल्कि जिस तरह से प्रकृति का दोहन अपने लालची मन को संतुष्‍ट करने में लगे हैं, प्रकृति उसका बदला एक के बाद एक लेने वाली है, जिसमें न सिर्फ आप बल्कि पूरी मानव सभ्यता के साथ-साथ सभी जीवित प्राणी तबाह हो जाएंगे। आदिवासियों को प्रकृति के दोहन का विरोध करने के लिए आप विकास विरोधी, अशिक्षित व पिछड़ा या कुछ और कह लें, लेकिन प्रकृति ने उत्तराखंड त्रासदी के द्वारा आदिवासियों के रास्ते को ही सही साबित किया है और अगर आप उस रास्ते पर चलने के लिए तैयार नहीं हैं, तो एक बात जरूर याद रखिए कि विकास के नाम पर प्रकृति का सौदा करना इंसान को बहुत महंगा पड़ेगा।

Thursday, June 27, 2013

Politics Must Ruralization!

 स्वतन्त्रता के 65 वर्षों के दौरान गाँवों का ज़बर्दस्त राजनीतिकरण हुआ है। खासतौर पर 1992 में 73 वें संविधान संशोधन के बाद जिसमें पंचायतों को संवैधानिक मान्यता और अधिकार दिये गये। इससे एक ओर ग्रामीण स्तर पर लोगों की राजनीतिक सहभागिता तो बढ़ी, लेकिन सदियों से चली आ रही ग्रामीण-भाईचारे की संस्कृति पर बुरा प्रभाव पड़ा। राजनीतिक सहभागिता ने गाँवों में ज़बर्दस्त राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया। इस प्रतिस्पर्धा का आधार राजनीतिक विचारधारा न हो सकी। राजनीतिक दलों ने जाति के आधार पर मतदाताओं को आकर्षित करना शुरु किया। जाति पर आधारित राजनीति ने आग में घी का काम किया। परिणामस्वरूप, जिस जातिगत बंटवारे एवं वैमनस्य के बावजूद गाँवों में भाईचारा बना रहता था उसका लोप हो गया और जातिगत बंटवारे राजनीतिक खेमों में बदल गये। जैसे-जैसे देश में राजनीतिक संस्कृति का पतन हुआ वैसे-वैसे ग्रामीण समाज में अन्तर जातिए सम्बन्धों में कटुता आती गई। कुछ लोग इस कटुता को यथा दृस्थितिवाद में परिवर्तन का संकेत मानकर इससे मुंह मोड़ लेते हैं और इसे सदियों से चले आ रहे उत्पीडऩ के अन्त का आरम्भ मानते हैं। शायद डॉ अम्बेडकर ने इसी स्थिति से बचने के लिये गांधी जी के राम राज्य की अवधारणा (जिसमें गाँवों को स्वशासन की इकाई बनाने का विचार था) का संविधान सभा में विरोध किया था। लेकिन आज डॉ अम्बेडकर की चिंता ने वास्तविक एवं विकराल स्वरूप ग्रहण कर लिया है। क्या इसका कोई समाधान है? 

किसी भी समाज में विचारों की भिन्नता एवं सामाजिक वर्गो में संघर्ष तो अपरिहार्य है, लेकिन राजनीति इसी समस्या के समाधान की कुंजी है। दुर्भाग्य से अपने देश में राजनीति समाधान के बजाय समाजिक संघर्षों की जननी बन गई है। इसीलिये ज्यादातर लोग राजनीति को गंदा समझ कर उससे दूर भागते हैं और यह धारणा घर कर गई है कि राजनीति केवल गुंडे-बदमाशों के लिये है। कैसे राजनीति को उसका वास्तविक स्वरूप लौटाया जाये? और कैसे इस गलत धारणा को दूर भगाया जाये? यह चुनौती बहुत बड़ी है पर यह न केवल सामजिक समरसता वरन देश के समग्र विकास के लिये बहुत ज़रूरी है।

ऐसी कोई समस्या नहीं जिसका समाधान न हो। हमने स्वतन्त्रता के बाद लोकतन्त्र और वयस्क मताधिकार का प्रावधान कर राजनीति को गाँवों की ओर ले जाने में तो सफलता प्राप्त की, लेकिन हम अपनी राजनीति को ग्रामोन्मुखी न बना सके। अर्थात एक कृषि प्रधान देश होते हुए भी हमारी राजनीति शहरोन्मुखी बनी रही। जो राजनीतिज्ञ गाँवों से आते, वे भी शहरों के ही स्वप्न देखते। इससे भारतीय राजनीति में गाँवों की हैसियत शहरों के मुकाबले दोयम दर्जे की हो गई। राजनीति उपर से चलकर नीचे पहुंची, वह दिल्ली से चलकर लखनऊ और वहां से भुआलपुर नगर या प्रदेश के अन्य किसी गाँव में पहुंची और, पहुंचने में राजनीतिक दलों द्वारा लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन न किये जाने के कारण गाँवों में राजनीति का चरित्र उपर से आरोपित सा हो गया, न कि नीचे से पल्लवित एवं पुष्पित। इसी से वहां की राजनीति व्यक्तिगत स्वार्थों, जातिगत प्रतिस्पर्धा व स्थानिक संकीर्णताओं पर आधारित हो गई। ऐसी राजनीति न गाँवों के विकास की सोच सकी, न ही देशहित की। और जब पंचायतों को संवैधानिक अधिकार दिये गये तब वे स्वराज और सुशाशन के केन्द्र बनने के बजाय लूट-पाट और भ्रष्टाचार के अड्डे बन गये। आज प्रत्येक पंचायत में औसतन तीन करोड़ रुपये प्रतिवर्ष पहुंच रहे हैं जो केन्द्र, राज्य सरकार और विभिन्न संस्थाओं से आते हैं। इतना धन किसी भी पंचायत में आने वाले गाँवों को कुछ वर्षों में खुशहाल बनाने के लिये पर्याप्त हो सकता है,शर्त यह है कि उसका सदुपयोग किया जाये। लेकिन सत्ता की वर्तमान संरचना ऐसा होने नहीं देगी।

क्या किसी वैकल्पिक सत्ता संरचना द्वारा इसे रोका जा सकता है? हां, यह सम्भव तो है पर यह एक पूरी नवीन संवैधानिक व्यवस्था की मांग करती है जिसमें कुछ मूलभूत परिवर्तन अनिवार्य होंगे। एक, भारतीय राजनीति नीचे से उपर जाये अर्थात राजनीतिक दलों की आन्तरिक संरचना में लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन हो ओर जो राजनीतिक कार्यकर्ता स्थानीय स्तर पर सक्रिय हों और जिनका अपने मतदाताओं से सीधा संवाद हो केवल उनको ही संगठनात्मक पदों पर निर्वाचित किया जाये और पंचायतों, नगर पालिकाओं, विधान सभाओं तथा संसद में उनको ही जन प्रतिनिधित्व का अवसर दिया जाये। 

द्वितीय, राजनीति ग्रामोन्मुखी हो जिससे दलीय नीतियों और सरकारी निर्णयों में देश की 70 फीसदी ग्रामीण आबादी और गाँवों के हितों का ध्यान सर्वोपरि हो। ऐसा नही कि छोटेए मझोले और बड़े शहरों की उपेक्षा कर के ही यह हो पायेगा। अभी हम विकास की 'औद्योगिक मानसिकता' में फसें हैं इसलिये उद्योगों के केन्द्र बने शहर और उनकी ज़रूरते हमें ज्यादा आकर्षित करती हैं। चूकिं प्रिन्ट और इलेक्ट्रानिक मीडिया भी शहरों को ही ज्यादा तरजीह देते हैं इसलिये भी सरकारें और राजनीतिक दल शहरोन्मुखी होने को विवश हैं, लेकिन ऐसा कर वे अपने वास्तविक दायित्व से विमुख हो रहे होते हैं। अगर लोकतान्त्रिक राजनीति का ककहरा यह कहता है कि सर्वसम्मत नहीं तो बहुमत से निर्णय हों, और यदि सर्वजन हिताय नहीं तो बहुजन हिताय तो अवश्य हो, तब तो यह मानना पड़ेगा कि बहुसंख्यक ग्रामीण आबादी और बहुसंख्य गाँवों को शहरी आबादी और शहरों के मुकाबले ज्यादा महत्व देना लोकतंत्र की पहली मांग है। क्या हमारी सरकारों और राजनीतिक दलों को लोकतन्त्र की इतनी भी साधारण समझ नही है? 

तीन, गाँवों और शहरों के साधारण नागरिकों को भी राजनीति में प्रवेश करने की परिस्थितियां बनें। यह कितनी विचित्र बात है कि जिस देश में 70 फीसदी जनता गाँवों से आती हो उसके शासन की बागडोर शहरी मानसिकता वाले राजनीतिज्ञों में निहित हो। आज सामान्यजन में यह बात बैठ गई है कि बिना पैसे और बाहुबल के राजनीति सम्भव नहीं, लेकिन हमें समझना होगा कि पैसे और बाहुबल की राजनीति में तभी ज़रूरत पड़ती है जब हमारा अपने क्षेत्र की जनता से जुड़ाव नहीं होता। इसका प्रमाण यह है कि अधिकतर लोगों को यही शिकायत होती है कि उनका विधायक, सांसद या अन्य जन प्रतिनिधि कभी मिलते ही नहीं। मिलें कैसे? वे तो शहरों और महानगरों की आलीशान कोठियों में विराजमान होंगे। हमें अपनी राजनीति और राजनीतिज्ञों को शहरों और महानगरों की आलीशान कोठियों से खींच कर गाँव की पुआल व चौपाल तथा शहरों और नगरों की धूल-धूसरित गलियों व झुग्गियों में लाना होगा।  

Tuesday, June 25, 2013

सरकारों को लाशों से मतलब नहीं, उसे बस ‘विकास’ चाहिए!


Myrtyre Memorial
शहीद स्‍थलTata Project
टाटा स्‍टील प्रोजेक्‍ट

दोजनवरी, 2006 को उड़ीसा के जजपुर जिले के कलिंगनगर में टाटा कंपनी के प्रस्तावित ग्रीन फिल्ड परियोजना का विरोध करने वाले आदिवासियों पर बम और बंदूक से हमला किया गया। 19 आंदोलनकारी मारे गये। इतिहास बताता है कि जहां-जहां आंदोलनकारी शहीद हुए हैं, वहां उनकी जमीन बच गयी है। इसलिए कलिंगनगर जाते समय मेरे मन में भी काफी उत्साह था उस आंदोलन के बारे में जानने के लिए। मैं उन बहादुर आदिवासी शहीदों के बारे में जानना चाहता था, जिन्होंने अपने पूवजों की धरोहर को बचाने के लिए अपनी जान दे दी। लेकिन कलिंगनगर पहुंचते ही मेरे होश उड़ गये क्‍योंकि वहां टाटा कंपनी का एक विराट स्टील प्लांट खड़ा किया जा रहा है। फिर भी हम बचे हुए आंदोलनकारियों को खोजने लगे। शाम होते ही कलिंगनगर रोशनी की चकाचौंध भरी छटा से सराबोर हो गया। आधुनिक दौड़ में इसी को विकास कहते हैं विकास पंडित। लेकिन हम तो इस रोशनी में भी उन आदिवासियों को देखना चाहते थे, जिनकी जमीन पर टाटा कंपनी की विशाल इमारत खड़ा की जा रही है। निश्चय ही आदिवासी दिखे, लेकिन अपनी ही जमीन पर मजदूरी करते हुए। टाटा प्लांट के बाहर सैकड़ों की संख्या में हड़िया बेचते हुए। और कुछ लोग इस चिंता में पड़े हुए मिले कि उनका अस्तित्व बच पाएगा या नहीं। कुल मिलकर कहें तो भविष्‍य अंधकारमय!
कंलिंगानगर का इलाका ‘हो’ आदिवासी बहुल था। लेकिन नीलाचल और टाटा कंपनी की स्थापना के बाद यहां गैर-आदिवासियों की संख्या निरंतर बढ़ने लगी है। नये-नये रेस्टोरेंट, होटल और टाउनशिप का निमार्ण हो रहा है। आदिवासियों के साथ एक और बड़ी त्रासदी यह है कि निलाचल, टाटा कंपनी और उड़ीसा सरकार ने तो विकास के नाम पर उनसे लगभग 13 हजार एकड़ जमीन छीन ली है। लेकिन इन कंपनियों में नौकरी करने आये गैर-आदिवासियों ने भी गैर-कानूनी तरीके से उनकी बची-खुची जमीन को हड़पने का प्रयास जारी रखा है, जो तब तक चलता रहेगा जब तक यहां के आदिवासी पूरी तरह से लुट नहीं जाते हैं। गांवों से शहरों में विकसित किया गया जमशेदपुर, रांची, बोकारो, राउरकेला या आप कहीं का भी उदाहरण ले लीजिए – वे इसी तरह लूटे गये हैं और लूटे जा रहे हैं। आज के जमाने में विकास का मतलब ही यही है कि आदिवासियों से उनकी जमीन, जंगल, पानी, खनिज और पहाड़ छीनकर पूंजीपतियों को दे देना। और जिन-जिन राज्यों की सरकारें इसमें जितना ज्यादा माहिर हैं, उसे उतने ही ज्यादा तेजी से उभरता हुआ राज्य कहा जा रहा है। अब इस सूची में छत्तीसगढ़ और उड़ीसा पहले और दूसरे पायदान पर दिखाई दे रहे हैं। इसी से आप समझ सकते हैं कि इन राज्यों में आदिवासियों के संसाधनों को लूटने की रफ्तार कितनी तेज है।
आदिवासियों के कलिंगनगर आने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। यह क्षेत्र सुकिंदा कहलाता है, जहां सुकिंदा राजा का शासन चलता था। कहा जाता है कि सुकिंदा और पोड़हाट के राजाओं के बीच काफी अच्छी दोस्ती थी। सुकिंदा राजा के पास प्रजा बहुत कम थे इसलिए जंगल की रक्षा हेतु उन्होंने पोड़हाट के राजा से कुछ प्रजा अपने यहां भेजने का आग्रह किया। इस पर पोड़हाट के राजा राजी हो गये और आदिवासियों को यहां भेज दिया। इस तरह से आदिवासी यहां पर आये। सुकिंदा राजा ने आदिवासियों की मेहनत को देखकर उन्हें यहीं बसाया और उन्हें जमीन भी दे दी। इसके बाद में और भी आदिवासी इस क्षेत्र में आये, जिन्होंने जंगल साफ कर खेती योग्य जमीन बनायी। आज भी आदिवासियों के पास राजा द्वारा निर्गत पट्टा उपलब्ध है। हालांकि 1928 में पहली बार अंग्रेज सरकार ने जमीन का सेटलमेंट किया लेकिन उस समय भी सभी को पट्टा नहीं दिया गया। यहां के आदिवासी आज भी जमीन पर अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं क्योंकि जमीन उनकी आजीविका का संसाधन भर नहीं है बल्कि उनकी पहचान, संस्कृति, इतिहास, विरासत और अस्तित्व भी जमीन पर ही निर्भर है।
1991 में उदारीकरण के तुरंत बाद सरकार की नजर इस क्षेत्र पर पड़ी। 1992 में उड़ीसा सरकार ने यहां ‘‘कलिंगनगर इंडस्ट्रियल कॉम्पलेक्स’’ के निर्माण लिए जमीन अधिग्रहण कानून 1894 के तहत जमीन का मूल्य प्रति एकड़ 37,000 रुपये निर्धारित कर अधिग्रहण शुरू किया लेकिन आदिवासियों ने इसका भारी विरोध किया। इसी बीच कुछ गैर-आदिवासी लोग सरकार को जमीन देने के लिए तैयार हो गये। इस तरह से सरकार ने 13,000 एकड़ जमीन को अधिगृहित घोषित कर दिया लेकिन रैयतों से जमीन हासिल करने में असमर्थ रहा। इसी बीच कुछ अधिगृहित जमीन पर भूमि पूजन भी किया गया लेकिन फिर से रैयतों के विरोध के कारण काम शुरू नहीं किया जा सका। इसी बीच भूषण कंपनी और सिमलेक्स कंपनी ने भी इस क्षेत्र में जमीन लेने का प्रयास किया लेकिन आदिवासियों के भारी विरोध की वजह से वे भी अपने मनसूबे में कामयाब नहीं हुए।
फिर 1997 में उड़ीसा सरकार के सहयोग से चलने वाली कंपनी ‘नीलाचल इस्पात निगम लिमिटेड’ का यहां आगमन हुआ। कंपनी ने प्रतिवर्ष 1.1 मिलियन टन आयन और स्टील उत्पादन क्षमता वाले प्लांट की स्थापना का प्रयास शुरू किया। कंपनी ने जमीन के बदले मुआवजा और नौकरी देने के नाम पर आदिवासियों से लगभग 2500 एकड़ जमीन मांगा। जब आदिवासी लोग इसके लिए तैयार हो गये, तो कंपनी ने पूरी जमीन पर घेरा डाल दिया। इसके बाद सेरेंगसाई, खोडयापुम, सरामपुर, डोंकागडिया और हेसाकुंडी के लगभग 1000 घरों को बुलडोजर से रौंद दिया गया और विरोध करने वाले आदिवासियों को पुलिस द्वारा लाठी चलवाया गया और उन्हें जेलों में डाल दिया गया। इसके बाद बचे हुए लोगों को गोबरघाटी कॉलोनी में डंप कर दिया गया तथा सात वर्षों तक उन्हें न मुआवजा और न ही नौकरी दी गयी। कंपनी के रवैये को देखते हुए आदिवासियों ने 2004 में ‘‘विस्थापन विरोधी जनामंच’’ का गठन कर कंपनी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। आदिवासियों के भारी विरोध को देखते हुए नीलाचल कंपनी ने रैयतों को जमीन का मुआवजा और नौकरी देना शुरू किया। हालांकि अभी भी सभी रैयतों को मुआवजा और नौकरी नहीं मिल पायी है। आंदोलन के नेतृत्वकर्ता चक्रधर हाईब्रू कहते हैं कि आंदोलन नहीं होने से रैयतों को कुछ भी नहीं मिलता।
इसी बीच 17 नवंबर, 2004 को ओड़िसा सरकार और टाटा कंपनी के बीच ग्रीनफिल्ड परियोजना हेतु एक समझौता-पत्र पर हस्ताक्षर किया गया। कलिंगनगर परियोजना टाटा की दूसरी सबसे बड़ी ग्रीनफिल्ड परियोजना है, जो दो फेज में तीन-तीन मिलियन टन की बनेगी, जिसकी लागत 15,400 करोड़ रुपये है और जिसके लिए कंपनी को कुल छह हजार एकड़ जमीन की जरूरत है। सरकार ने टाटा कंपनी को 3471.808 एकड़ जमीन दे दी है, जो उड़ीसा इंडस्ट्रियल इनफ्रास्‍ट्रक्‍चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन द्वारा हस्तांतरित है, जिसमें 2755.812 एकड़ जमीन 1195 परिवारों से ली गयी है। टाटा कंपनी दावा करती है कि सरकार ने रैयतों से 1992 में ही भूमि अधिग्रहण कानून 1894 की धारा-34 के तहत मुआवजा दे दिया था लेकिन विस्थापित लोगों को जमीन से बेदखल नहीं किया गया था। इस तरह से टाटा कंपनी इस क्षेत्र में प्रवेश कर गयी और परियोजना लगाने का प्रयास शुरू कर दिया।
दो जनवरी, 2006 को टाटा कंपनी ने बुलडोजर लगाकर जमीन का समतलीकरण शुरू किया, जिसको देखते हुए आदिवासियों के बीच आक्रोश पैदा हुआ और वे काम रोकने के लिए प्रस्तावित परियोजना स्थल पर गये, जहां पुलिस के साथ सीधा संघर्ष हुआ। आंदोलन के नेता अमर सिंह वानारा बताते हैं कि परियोजना स्थल को लगभग तीन सौ सुरक्षा बलों ने घेर रखा था और कंपनी के लोगों ने जमीन में लैंड माइंस बिछाया था, इसलिए जैसे ही आंदोलनकारी वहां विरोध करने पहुंचे, लैंड माइंस बलास्ट किया गया और लोगों के ऊपर फायरिंग भी की गयी। फायरिंग में मौके पर ही 12 लोगों की मृत्यु हो गयी और 50-60 लोग बुरी तरह घायल हो गये। इतना ही नहीं, कंपनी के लोगों ने लाशों के साथ भी अमानवीय व्यवहार किया। चक्रधर हाईब्रू और अमर सिंह वानारा दोनों बताते हैं कि पोस्ट मॉर्टम के बाद जब उन्हें लाश दी गयी, तब कुछ महिलाओं के स्तन और कुछ के हाथ कटे हुए थे। इससे जनाक्रोश और ज्यादा बढ़ गया। आंदोलनकारियों ने सभी शहीदों का अंतिम संस्कार एक ही जगह किया, जहां शहीद स्थल का निर्माण किया गया है। आंदोलन के दौरान पुलिस फायरिंग में 12 लोग एक साथ मारे गये थे और सात लोगों की मौत इलाज के दौरान अस्पाताल में हुई। इस तरह से कलिंगनगर गोलीकांड में कुल 19 आदिवासी लोग शहीद हो गये।
इस घटना के बाद आंदोलन और ज्यादा तेज हो गया। कलिंगनगर से पारादीप जाने वाली सड़क को अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दिया गया, जो 14 महीनों तक जारी रहा। स्थिति ऐसी हो गयी थी कि टाटा कंपनी के लिए परियोजना लगाना मुश्किल दिखाई दे रहा था। और जब 19 लोग शहीद हुए हों, तो मानवता के नाते भी टाटा कंपनी को परियोजना वापस ले लेना चाहिए था। लेकिन टाटा कंपनी को सिर्फ और सिर्फ लाभ चाहिए। उन्हें मानवता से क्या लेना देना? टाटा कंपनी ने कई गांवों के युवाओं को पैसे का लालच देकर दलाल बनाया। इसका सबसे बड़ा साक्ष्‍य यह है कि गांवों में आधुनिक गाड़ियां बॉलेरो, पजेरो, स्कॉरपियो इत्यादि देखा जा सकता है। ये गाड़ियां गांवों में कैसे पहुंची? आंदोलनकारियों के खिलाफ फर्जी मुकदमा किया गया। आठ आंदोलनकारियों को कंपनी के एक कर्मचारी की हत्या करने के आरोप में जेल भेज दिया गया। चक्रधर हाईब्रू, रवि जारिका, चक्रधर हाईब्रू (जूनियर), तुरम पूर्ति, प्रताप चाला इत्यादि के खिलाफ माओवादी होने का आरोप लगाकर फर्जी मुकदमा दर्ज किया गया। कोई भी ऐसा आंदोलनकारी नहीं है, जिसको पुलिस ने धमकाने की कोशिश नहीं की। पुलिस आंदोलनकारियों को बाजार, घर या तालाब कहीं से भी उठा लेती थी। इस तरह से लगभग 120 लोगों को जेल में डाला गया। आंदोलन को तोड़ा गया, जिसमें राजनीतिक दलों के स्थानीय नेताओं ने भी इसमें प्रमुख भूमिका निभायी क्योंकि उन्हें भी पैसे का लालच दिया गया।
इतना ही नहीं, जजपुर जिले के जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक और सहायक पुलिस अधीक्षक लगातार आंदोलन के नेतृत्वकर्ताओं के पास जाकर उन्हें समझाने व धमकाने की कोशिश में जुटे रहे। ऐसा लगने लगा था कि जजपुर जिले का प्रशासन और पुलिस दोनों सिर्फ टाटा कंपनी के लिए काम कर रहे हैं। आंदोलन के नेता चक्रधर हाईब्रू बताते हैं कि जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक और सहायक पुलिस अधीक्षक उसके यहां जाते थे और उसे गेस्ट हाउस भी बुलाकर यही कहते थे कि वे कंपनी का विरोध नहीं करें, नहीं तो उन्‍हें इसके लिए भुगतना पड़ेगा। पुलिस दमन के कारण आंदोलनकारी और ग्रामीण भयभीत हो गये व जमीन देने के अलावा उनके पास दूसरा कोई विकल्प ही नहीं बचा। आंदोलनकारी अमर सिंह वानरा कहते हैं कि राजकीय दमन ने आदिवासियों को जमीन छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। हार कर आदिवासियों ने टाटा कंपनी को अपनी जमीनें दे दी। इस परियोजना से सनचानडिया, बैइबुरू, चंपाकोयला-1, कालामाटी, चंडिया, बालिगोथा, गोबरघाटी, बमियागोथा, चंपाकोयला-2, अंबागडिया, ससोगोथा, गदापुर और बंदगाडिया गांवों के लगभग छह हजार लोग विस्थापित हो गये। उनके गांवों को बुलडोज कर उन्हें ट्रांजिट कॉलोनियों में रख दिया गया और प्रचार किया गया कि वे स्वयं ही जमीन देने के लिए राजी हो गये और टाटा परिवार के सदस्य बन गये हैं।
टाटा कंपनी की कलिंगनगर परियोजना का निर्माण ठेका पर किया जा रहा है, जिसमें 35 हजार मजदूर प्रतिदिन 170 रुपये की हाजरी पर कार्यरत हैं। यह अलग बात है कि ओवर टाइम काम करके वे ज्यादा पैसा कमा लेते हैं लेकिन वे प्रतिदिन शाम में नशीले पदार्थों का सेवन कर अपनी सेहत भी बिगाड़ रहे हैं। और यह करना उनकी मजबूरी है वरना काम ही नहीं कर पाएंगे। इतना ही नहीं कंपनी के बाहर सैकड़ों की संख्या में हड़िया दुकान, दारू दुकान और छोटी-छोटी अन्य दुकानें हैं। मीडिया की भाषा में ये सारे रोजगार हैं, जो कंपनी द्वारा पैदा किया जाता है। इसमें हास्यास्पद बात यह है कि जहां भी कोई बड़ी परियोजना का निर्माण होता है, उसमें दिहाड़ी मजदूरी, उसके इर्द-गिर्द लगने वाली सभी तरह की दुकानें हड़िया-दारू दुकान सहित रोजगार के श्रेणी में आती हैं लेकिन वहीं काम आम जगहों पर होने पर रोजगार की श्रेणी में नहीं गिने जाते हैं। कभी-कभी तो इसे गैर-कानूनी कार्य की श्रेणी में भी रखा जाता है और लोगों को जेल भी जाना पड़ता है। सवाल यह भी है कि 35 हजार मजदूरों का भविष्‍य क्या है? क्या प्लांट तैयार हो जाने के बाद उन्हें बाहर नहीं कर दिया जाएगा? बड़े उद्योग को ही विकास और रोजगार बताकर ढोल पीटने वाले मीडिया को इसका जवाब देना चाहिए।
26 जनवरी, 2001 को देश के पूर्व राष्‍ट्रपति केआर नारायणन ने गणतंत्र दिवस के मौके पर राष्‍ट्र को संबोधित करते समय देशवासियों को चेतावनी देते हुए कहा था कि ‘‘आनेवाली पीढ़ी हमें यह न कहे कि इस हरी-भरी धरती और उस पर सदियों से वास करने वाले बेगुनाह आदिवासियों को बर्बाद कर भारतीय गणतंत्र का निर्माण किया गया’’। लेकिन कलिंगनगर का दौरा करने के बाद मुझे यह विश्वास हो चुका है कि भारतीय गणतंत्र को आदिवासियों की हत्या करने में शर्म नहीं आती है। और वह लगातार आदिवासियों की लाश पर इस आधुनिक भारत के निर्माण में लगा हुआ है। अब मेरा विश्वास भी तथाकथित लोकतंत्र से लगातार टूटता जा रहा हैं। आजकल राष्‍ट्रीय टेलीविजन चैनलों में हम आदिवासियों को यह लेक्चर दिया जा रहा है कि अगर हमारे साथ अन्याय हो रहा है तो हमें लोकतांत्रिक तरीके से आवाज उठानी चाहिए न कि बंदूक की गोली से। मैं उन लोगों से पूछना चाहता हूं कि आप किस लोकतंत्र की बात कर रहे हैं? क्या कलिंगनगर के आदिवासी बंदूक लेकर टाटा कंपनी का विरोध कर रहे थे? जब जिले का उपायुक्त और पुलिस अधीक्षक पूंजीपतियों को जमीन दिलाने में दिन-रात एक कर दे, तो आदिवासी लोग किसके पास जाए? जिले के उपायुक्त को ही तो आदिवासियों की जमीन रक्षा का जिम्मा दिया गया है? आदिवासियों के लिए लोकतंत्र कहां है?
टाटा कंपनी की कलिंगनगर परियोजना का नारा है ‘‘नया जीवन, नयी आशा’’ … लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि 19 आदिवासियों की हत्या कर उनकी जमीन पर विकास की इमारत खड़ा करने वाली टाटा कंपनी आदिवासियों को क्या नया जीवन और नयी आशा दे सकती है? क्या 19 शहीदों का कोई मूल्य भी है? क्या कंपनी और सरकार तब भी इसी तरह का व्यवहार करते, जब 19 गैर-आदिवासी वहां शहीद हो गये होते? आदिवासियों की लाश पर विकास की इमारत खड़ा करने से पहले पांचवीं अनुसूची और पेसा कानून की अनदेखी क्यों की गयी? क्यों आदिवासियों से यह नहीं पूछा गया कि वे क्या चाहते हैं? क्या इस लोकतंत्र में आदिवासियों का कोई अधिकार ही नहीं है? आदिवासियों को चारों तरफ से क्यों लूटा जा रहा है? क्या तथाकथित मुख्यधारा में शामिल लोगों के पास मानवता, नैतिकता और भाईचारा ही नहीं बची है? अगर ऐसा ही है तो आदिवासियों को मुख्यधारा में शामिल कर आप उन्हें भी लूटेरा मत बनाइए। आदिवासियों को आदिवासी ही रहने दीजिए क्‍योंकि हम हरी-भरी धरती और किसी की लाश पर विकास की इमारत खड़ा नहीं करना चाहते हैं।

Monday, June 24, 2013

राँझणा, दीवानगी और जज्बात की एक नयी परिभाषा!


कुछ महीनों से फिल्म प्रचारक चैनलों पर राँझणा के रंगों ने लगातार आकृष्ट किया था। नायक के रूप में निहायत साधारण चेहरा भी आकर्षित कर रहा था। यूँ तो कोलावरी डी के इस गायक और पहचान को समृद्ध करने के लिए एकदम सीधे दक्षिण के सुपर स्टार रजनीकान्त के दामाद के रूप में धनुष को हम जानने की कोशिश कर रहे थे लेकिन बहुतेरों को इतना मालूम नहीं था कि तमिल सिनेमा में चार-छः साल से यह युवा ठीकठाक जमा हुआ है। इधर बहुतायात में तमिल और तेलुगु की सुपरहिट फिल्मों की कहानी और पटकथाएँ मुम्बइया सिनेमा में आयातित हो रही हैं। आमिर खान, सलमान खान और अक्षय कुमार का सितारा इसीलिए बुलन्दी पर है। इसी परिप्रेक्ष्य में खास पूर्वोत्तर की पृष्ठभूमि पर गढ़ी जाने वाली देसी प्रेमकथा के लिए धनुष को निर्देशक ने नायक लेना चाहा, यह गौरतलब है।

फिल्म में यह जता भी दिया गया है कि किस तरह नायक के पूर्वज दक्षिण से बनारस आकर बसे और पीढ़ी दर पीढ़ी पुजारी के रूप में अपना जीवनयापन करने लगे। अपने स्वभाव से मस्त और खिलन्दड़ यह हीरो छुटपन में ही रावण फूँकने का चन्दा इकट्ठा करता हुआ नायिका के घर पहुँच जाता है और उसे देखकर मोहित हो जाता है। कहानी यहीं से परवान चढ़ती है। प्रेम को हर हाल में हासिल करने के तीस साल पुराने फार्मूले से ही नायक को सफलता मिलती है लेकिन जिस तरह फिल्म यह प्रमाणित करती है कि छः-सात साल की उम्र में भी प्रेम हो सकता है उसी तरह फिल्म यह भी प्रमाणित करती है कि पाँच साल का बिछोह नायिका का प्रेम जैसे विषय में स्मृतिलोप कर देता है। नायक उसे इशारे से एक मिनट में सभी चीजों का पाँच सौ फीट दूर से स्मरण करा देता है।
राँझणा में नायक-नायिका के बीच प्रेम का तीसरा एंगल अभय देओल का किरदार है जो उन्हीं पाँच सालों में नायिका के हृदय पर काबिज होता है। इस किरदार की सीमित मगर कहानी और उजला असर देने वाली उपस्थिति तक ही फिल्म बढि़या चली आयी है। किरदार की मृत्यु के बाद नायक के प्रायश्चित, नायिका की प्रेम-निष्ठा से कहानी पटरी उतरती है। बनारस से पंजाब और पंजाब से कहानी का दिल्ली आना उस पूरे अनुभूतिपरक असर को व्यर्थ करना शुरू करता है जो हम बनारस के घाट पर, गंगा के तट पर, बनारस की पहचान वाले मूलभूत स्थानों, घरों, छलों और उड़ती पतंगों के साथ-साथ रामबारात, आरती, ध्वनियाँ, त्यौहारों के समय सजता शहर और ऐसे ही प्रसंगों के साथ जीते आये हैं। अच्छी सिनेमेटोग्राफी को इसका श्रेय है। धनुष तो खैर नायक हैं, चार अवगुन उनके नायकत्व पर कुरबान सही लेकिन स्वरा भास्कर, मोहम्मद जीशान अयूब आदि कलाकार अपने किरदारों के साथ बेहतर न्याय करते हैं, वे अधिक आश्वस्त भी लगते हैं। धनुष का विश्लेषण करते हुए रजनीकान्त को दिमाग से निकाल देना चाहिए। 


राँझणा के प्रेम-विजय के लिए किए जाने वाले उपक्रम यथार्थ में बेहद अविश्वसनीय हैं लेकिन चटख संवाद और उनका देशज आनंद देता है। उस तरह की गालियों की छूट भी ली गयी है जो अब हमें घर में भी बोलने (बकने) की लगभग स्वतंत्रता हो गयी है जिस पर नोटिस लिया नहीं जाता। साँप के फन से पिछवाड़ा खुजाने का जोखिम जैसा संवाद नायक मंत्री को बोलकर अपना शत्रु बना लेता है। संवादों में, अन्त के उस आधे घण्टे में एलीट मेच्योरिटी दिखायी देती है जब कहानी दिल्ली पहुँच जाती है और जेएनयू के उन प्रतिवादी छात्रों के आसपास ठहर जाती है जिनके मुखिया अभय देओल हैं जिनके मन में अदम्य राजनैतिक महात्वाकांक्षा है। इस जमीन पर हम जो दृश्य देखते हैं उनमें ही मूलभूत कहानी कहीं खो जाती है। नुक्कड़ नाटकों, नारेबाजियों और प्रदर्शनों के बीच राँझणा का भटकाव बोझिल करता है।

इरशाद कामिल की गीत रचनाएँ और ए.आर. रहमान का संगीत बहुत अच्छा है। गानों में रूमानी एहसास प्रबल महसूस होते हैं। सोनम कपूर के बारे में यह कहा जा सकता है कि उनको एक अच्छी फिल्म मिली है, अपने किरदार को इससे बेहतर अदा कर भी नहीं सकती थीं। अभय देओल की उपस्थिति के बारे में पहले लिख ही दिया गया है।  फिल्म की शुरुआत पूर्वदीप्ति (फ्लेश-बैक) से होती है और वह भी प्राण छोड़ते नायक के अवचेते आत्मकथ्य से, वह अपने अति-साधारण रूप-रंग पर भी बोलता है और जब अंत में फिल्म पुनः उसकी आवाज़ से पूरी हो रही होती है, एक पराजय सी लेकर वह दुनिया छोड़ रहा है, थोड़ा अवसाद महसूस होता है। 

फिल्म की शुरुआत पूर्वदीप्ति (फ्लेश-बैक) से होती है और वह भी प्राण छोड़ते नायक के अवचेते आत्मकथ्य से, वह अपने अति-साधारण रूप-रंग पर भी बोलता है और जब अंत में फिल्म पुनः उसकी आवाज़ से पूरी हो रही होती है, एक पराजय सी लेकर वह दुनिया छोड़ रहा है, थोड़ा अवसाद महसूस होता है। 

Thursday, June 20, 2013

बलात्कारियों के असली दलाल यही हैं!

नवरात्री के समय हमारे देश में कई जगह बलात्कार करने वालों की दलाली करने वाले पुलीस अधिकारियों की वजह से बलात्कार की घटनायें हुईं ऐसी ही एक घटना 14.04.2013 को महेन्द्रगढ, हरियाणा में हुई जिसमें सात लोगों(चार के नाम इस प्रकार हैं - 1. सुनील   2. सतीश   3. करमवीर   4. मुकेश) ने 21 वर्षीय युवती के साथ सामूहिक बलात्कार किया| क्योंकि यह मामला एक मजदूर की बेटी का था और आरोपी दबंग रुपयों-पैसे वाले थे इसलिये संबंधित मामले में किसी भी प्रकार की कोई भी कार्यवाही आजतक नहीं हो पाई| संबंधित मामले में F.I.R. No. 145 Date: 14.04.2013 जब SHO से बातचीत की तो SHO Inspr. Ramesh Kumar, Mahendragarh (Haryana) 97299-90546 / 94163-16539  ने कहा कि "गाड़ी बरामद हो चुकी है, दो आरोपी पकड़े गये हैं बाकी की तलाश जारी है|"मगर आज तक कोई कार्यवाही इस मामले में नहीं की गई और न ही Charge Sheet दाखिल की गईजब कि जैसा कि पीड़ित से बातचीत पर पता चला था कि सातों आरोपियों को उसी दिन पकड़ लिया गया था मगर दूसरे दिन जब पीड़िता अपनी माँ के साथ थाने गई तो वह देखती है कि थाने के अधिकारी व आरोपी अन्दर के कमरे में बैठकर कोल्ड ड्रिंक की दावत उड़ा रहे हैं और बाहर जो पुलिस का जवान मौजूद था उसने इन लोगों को देखकर इन लोगों के साथ अभद्र व्यवहार किया व आपत्तिजनक शब्दों का उपयोग किया वहाँ की हालत और परिस्थिती देखने के बाद पीड़िता और उसकी माँ दोनों बुरी तरह घबरा गये और वहाँ से भाग कर दिल्ली आ गये उन्होंने सोचा कि अगर हम वहाँ रहेंगे तो बलात्कारियों ने तो जो किया सो किया लेकिन यह पुलिस वाले भी हमारे साथ उससे भी बुरा कर सकते हैं|
इस पूरे मामले को संज्ञान में लेने के बाद जो नज़र आ रहा है वह यह दर्शाता है कि हमारे देश में कानून की रक्षा के लिए तैनात SHO Ramesh Kumar जैसे अधिकारी व उनके थाने के साथी एक तरीके से इन बलात्कार करने वालों के दलाल हैं| इसका मतलब यह कि ये लोग बलात्कारियों को बलात्कार करने की अनुमति देने के लिये दलाली लेते हैंमतलब रुपया लेकर बलात्कारियों को पूरी छूट दे देते हैं कि मेरा पूरा इलाका आपके लिये सुरक्षित है जिसके साथ चाहो इसके साथ दुष्कर्म करो| बस मुझे मेरा रुपया बराबर पहुँचाते रहो शायद इन्हें उम्मीद से अगर अधिक रुपया मिल गया तो ये अपनी माँ-बहन के साथ भी दुष्कर्म करने की छूट देने को तैयार हो जायेंगे, ऐसे हैं इस थाने के SHOऔर उनका दल|
वो तो भला हो कानूनी बंदिशों का, जिसकी वजह से ये भ्रष्ट नेता व अधिकारी बचे हुए हैं, क्योंकि आम नागरिक के हाथ में ऐसा किसी भी प्रकार का कोई हथियार उपलब्ध नहीं हो पाता हैंनहीं तो वे ऐसी विषम परिस्थिती में जब उनका इस प्रकार से शोषण हो रहा है तब वे उसी वक्त उस हथियार का उपयोग करके ऐसे दबंग और भ्रष्ट अधिकारियों को उनके अन्जाम तक पहुँचा दें क्योंकि अगर उस वक्त उस पीड़िता या उसकी माँ के पास ऐसा कोई हथियार होता जिसका उपयोग करके वो दबंगों या भ्रष्ट अधिकारियों को मौत के घाट उतार सकती तो ऐसा कार्य करने से वे नहीं हिचकते भले ही उसका अंजाम उनके लिये फांसी ही क्यूँ न हो वह हँसते-हँसते फांसी पर झूलने को तैयार हो जातीं|
आज हमारे देश को ऐसे भ्रष्ट दलाल Ramesh Kumar जैसे पुलिस अधिकारिओं ने ही बर्बाद करके रखा है और इन लोगों की वजह से आम नागरिक बागी होते चले जा रहे हैं| संगठन चाहता है ऐसे भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवाही हो जिससे आम पीड़ित उधम सिंह बनने की कतार में न खड़ा हो सके| संबंधित मामले में पहले भी DGP Rakesh Malik और SP को शिकायत पत्र भेजा गया था मगर पूरा प्रशासन सो रहा है और इन्तजार कर रहा है कि देश की जनता सड़कों पर उतरे और तांडव करें|
इस मामले में तो उल्टा ही हो रहा है पीड़िता की माँ को वैश्या बताया जा रहा है| संगठन की समझ में एक बात नहीं आ रही है कि क्या वैश्या के साथ बलात्कार करना जायज़ हैं मतलब आप वैश्याओं के साथ उसकी इच्छा के विरूद्ध किसी भी प्रकार का दरिन्दगीपूर्ण व्यवहार या सामूहिक रूप से बलात्कार करो आपके ऊपर कोई भी कानून लागू नहीं होगा| संबंधित मामले में पीड़िता की माँ की तरफ से  Narnaul के SP और Women Cell में शिकायत दर्ज की गई है|
संगठन सदस्यों व पाठकों से अपील करता है कि
SHO Shri. Ramesh Kumar - Mob. 97299-90546 / 94163-16539
DGP Shri. Rakesh Malik - Mob. 09876600419
SP Shri. SimarDeep Singh - Mob. 9729996500
के नं. पर SMS करें -


Thursday, June 13, 2013

पीड़ितों के पास इंसाफ पाने का कोई मौलिक अधिकार नहीं!

प्राचीन संस्कृतियों में अपने प्रति होने वाले अपराध और अपमान का बदला मजलूम खुद लेता था। कहानी चाहे यूलिसीज और इडिपस की हो चाहे रामायण और महाभारत की, बहादुरी की सारी गाथाएं ऐसे लोगों के पराक्रम के विषय में है जिन्होंने अपराधी को दंड दिया, अपने और अपने समाज के अपमान का बदला लिया और समाज में सुरक्षा की भावना लाने का प्रयास किया।
जब आधुनिक व्यवस्था आयी तो संविधान का राज्य हो गया। अब किसी व्यक्ति के प्रति किया गया अपराध राज्य के प्रति किया गया अपराध माना जाने लगा। अब अपराधी को दंड देना राज्य का काम है समाज को अपराध से मुक्त रखना भी। परंतु क्या राज्य पीड़ित को न्याय दिला पा रहा है। पीड़ित निहत्था है उसके पास आत्मरक्षा का भी हक नहीं है, अपराधी हथियारबंद है और राज्य के बनाये सारे कानून अभियुक्त के अधिकारों की व्यवस्था कर रहे हैं। पीड़ित के पास कोई हक नहीं उसे तो उसके मामले में हो रही सुनवाई की सूचना तक दिया जाना जरूरी नहीं। हमारा क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम, जस्टिस फॉर द क्रिमिनल है, न कि जस्टिस फॉर द विक्टिम आफ क्राइम। क्या पीड़ित को न्याय मिल पाता है?
पिछले कुछ दिनों में भारत के संविधान में प्रदत्त प्रावधानों और न्याय प्रक्रिया के आधार पर उच्चतम न्यायालय द्वारा अपराधी पाये गये जिन अपराधियों को फांसी की सजा सुनायी गयी थी, उनमें दो को वास्तव में फांसी दे दी गयी। वे दोनों आतंकवाद से जुड़े थे अत: उनकी सजा से उठे विवाद ने एक और रंग ले लिया, जो राजनीतिक था। कसाब के पक्ष में कविताएं लिख कर ई मेल द्वारा वितरित की गयीं, अफजल गुरु की माता, पत्नी तथा पुत्र का चित्र छापते हुए शोक व्यक्त किया गया। हममें से किसी ने भी इन हत्याकांडों में मारे गये दो सौ से भी अधिक पीड़ितों के शोक संतप्त परिवार वालों के चित्र नहीं देखे, न ही उनकी व्यथा प्रसारित की गयी। जिन्होंने अपराधी को फांसी की सजा का समर्थन किया, वे प्रतिक्रियावादी ठहराये गये और अपराधी के अधिकारों का समर्थन करने वाले प्रगतिशील कहलाये।
इसी प्रकार वर्ष 2012 के अंतिम माह में 16 तारीख को हुए बर्बरता पूर्ण, नृशंस और क्रूर कृत्य को लेकर राष्ट्रव्यापी बहस छिड़ गयी। दस अप्रैल 2013 को दिये वक्तव्य में हमारे प्रधानमंत्री ने कहा कि 16 दिसंबर की घटना ने हमें नया कानून बनाने और संशोधित करने पर मजबूर किया। द्रष्टव्य है कि हमारा देश स्त्री के लिए बनाये गये हर कानून के लिए हादसे का इंतजार करता रहा है। रेप के विरुद्ध बनाये गये नियम में गवाही का नियम तब बदला गया, जब 1979 में मथुरा बलात्कार कांड हुआ और कार्यस्थल पर यौन शोषण रोकने का विशाखा दिशा निर्देश (जो फरवरी 2013 में कानून बन गया) तब जारी हुआ, जब 1997 में राजस्थान में भंवरी देवी का बलात्कार हुआ।
मगर इस बार इंटरनेट पर अधिक सक्रिय रहने वाले नारीवादी संगठनों ने वर्ष 2013 में जस्टिस एससी वर्मा कमेटी को सिफारिशें भेजने में आश्चर्यजनक भूमिका निभायी। वे घूरने और पीछा करने (स्टॉकिंग) के अपराधों को गैरजमानती बनाना चाहती हैं, ताकि इन अपराधों की गंभीरता को समझा जाए और न्यायोचित सजा मिले जो सही भी है, परंतु नाबालिग, पांच छह वर्ष की बच्चियों के साथ बलात्कार करने वाले अपराधियों को कठोरतम दंड देने के वे सख्‍त खिलाफ हैं। गैंगरेप यानी सामूहिक बलात्कार के अपराधी को फांसी न दिये जाने के पक्ष में उन्होंने हस्ताक्षर अभियान चलाया। अपराधी को क्या सजा हो इस बात पर सारा बुद्धिजीवी वर्ग साफतौर पर वामपंथ और दक्षिणपंथ के आधार पर बंटा दिखाई दिया इनमें कुछ नारीवादी संगठन भी थे।
प्रस्तुत आलेख मैंने अगस्त सन 2004 में लिखा था, जब धनंजय चटर्जी को फांसी दी गयी थी, और अपने संगठन के सहयोगियों के साथ साझा किया था। वह आलेख ज्यों का त्यों अपनी सारी दुविधाओं के साथ पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत कर रही हूं। देखें इन नौ वर्षों में क्या बदला सरकार, न्यायव्यवस्था, सत्ता पक्ष, विपक्ष, वामपंथी, मानवाधिकारवादी, मुजरिम, हत्यारे, या पीड़ित और उनके रिश्तेदार, बेकसूर मजलूम। देखें, कुछ बदला भी है या नहीं?
जुर्म और सजा : मामला हंस और शिकारी का
क्राइम एंड पनिशमेंट यानी जुर्म और सजा पर लेखनी उठाने वालों में मैं पहली नहीं हूं। जबसे सामाजिक व्यवस्था बनी है, यह मुद्दा तभी से चर्चा में रहा है।
चौदह अगस्त 2004 को धनंजय चटर्जी नाम के व्यक्ति को फांसी पर लटका कर सजा दी गयी। उसने एक दसवीं कक्षा में पढ़ती हुई बच्ची का कत्ल किया था, और कत्ल से पहले बलात्कार। फांसी उसे कत्ल का जुर्म करने के लिए दी गयी। फांसी उसे जुर्म के चौदह साल बाद दी गयी। राष्ट्रपति ने उसकी दया याचिका खारिज कर दी। उसके बाद पुन: उसने सर्वोच्च न्यायालय से इस आधार पर मुक्ति की याचना की कि वह चौदह वर्ष जेल में काट चुका है। सर्वोच्च न्यायालय ने एक ही दिन में यह कह कर मामला खारिज कर दिया कि यह विलंब अपराधी ने जानबूझ कर स्वयं अपने ऊपर कई स्थानों से मुकदमे चलवा कर करवाया है, कत्ल की सजा फांसी है।
जब से ओपेन स्काइ पॉलिसी के तहत अनेक टीवी चैनल आये हैं, तब से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अनर्गल प्रलाप करने की एक अद्भुत परम्परा प्रारंभ हो गयी है। कातिल के मां बाप कितने शोक संतप्त हैं यह सभी चैनल दिखाने लगे। स्टार न्यूज ने बताया कि हत्यारे की तीन नंबर पर अटूट आस्था है। वह जेल की तीन नंबर कोठरी में रहता है। उसके लिए ट्रे में नाश्ता आता है। वह नाश्ते में एक अंडा, छह टोस्ट, एक फल और एक गिलास दूध पीता है। वह खाने में तली हुई मछली, दाल, चावल, रोटी और सब्जी खाता है। वह रेडियो से मनोरंजन करता है। (बेचारा टीवी नहीं देख पाता)। उसकी बहन अनब्याही है। कातिल के प्रति दया की याचना करते हुए कुछ मानवाधिकारवादी भी दिखाये जाते रहे।
इस बीच उस मासूम बच्ची के माता पिता जो कलकत्ता छोड़ कर मुंबई में बस गये थे, वे अपने घर से भाग कर कहीं और जा छिपे ताकि मीडिया पीछा न करे। हममें से कोई नहीं जानता कि इन चौदह वर्षों तक उस बच्ची के मां बाप ने यह मुकदमा कैसे लड़ा, वकीलों को कितनी फीस दी, कितना पैसा खर्च किया और अपनी मासूस बच्ची की हत्या के सदमे को बर्दाश्त करते हुए यह चौदह वर्ष कैसे काटे।
जिस बात ने मुझे बहुत द्रवित किया, वह थी एक व्यक्ति, जो मृत बच्ची का पड़ोसी रहा था तथा जिसकी बेटी उस बच्ची के साथ पढ़ती थी, हत्यारे की फांसी वाले दिन जेल तक आया। वह चाहता था कि फांसी जरूर हो। हत्यारा उस बिल्डिंग में लिफ्टमैन था, बिल्डिंग के बच्चों के स्कूल से घर लौटने पर उन्हें घर पहुंचाने की जिम्मेदारी उसकी थी। जाहिर है वह चौदह वर्ष की बच्ची भी उस पर यकीन करती रही होगी। सर्वोच्च न्यायालय के वकील ने भी कहा कि अस्सी प्रतिशत से भी अधिक जनता हत्यारे को फांसी चाहती है। हम जानते हैं कि फांसी की सजा जनमत के आधार पर नहीं दी जाती। पर यह दोनों हृदयस्पर्शी बातें यह द्योतित करती है कि मानव हृदय आज भी पोएटिक जस्टिस चाहता है मुजरिम को सजा, निर्दोष को माफी।
लेकिन जुर्म और सजा के इस मुद्दे पर लेखनी उठाना मेरे लिए उतना सहज नहीं है, जितना किसी अन्य के लिए होता। आज से छह वर्ष पूर्व मैंने स्वयं अपने इन्हीं हाथों से लेखनी उठाकर, अपनी ओर से हस्ताक्षर करके एक दया याचिका राज्यपाल और राष्ट्रपति को सौंपी थी, जिसमें बंदिनी रामश्री के प्राणों की भीख मांगी थी। मेरी उस दया याचिका पर उसकी फांसी की सजा उम्रकैद में बदल दी गयी और आज वह औरत लखनऊ जेल में है। वह अक्सर जेल से मुझे पत्र भिजवाती रहती है। यह बात और है जिस समय मैंने वह दया याचिका लिखी थी, उस समय तक मैंने उसे देखा तक नहीं था। इस प्रकरण में प्रतिष्ठित वकील आईबी सिंह मेरे सहयोगी थे।
एक औरत को हत्या के लिए माफी और एक आदमी को हत्या के लिए फांसी, कहीं यह मानदंड दोहरे तो नहीं? आज पुनरावलोकन करना होगा।
मैंने पुरानी फाइलो में से निकाल कर वह दया याचिका पुन: पढ़ी। यह याचिका मैंने अखबार में 16 मार्च 1998 को छपी रिपोर्ट के आधार पर 17 मार्च 1998 को लिखी थी और 18 मार्च 1998 को राज्यपाल को सौंप दी थी और राष्ट्रपति को फैक्स द्वारा प्रेषित कर दी थी। दया याचिका के आधार पर क्षमादान का अधिकार राष्ट्रपति तथा राज्यपाल दोनों के पास समान रूप से होता है। दया के लिए हमने एक व्यक्ति की निजी एवं विशेष सामाजिक परिस्थिति को आधार बनाया था। हमने कहा था कि बंदिनी ने जेल में ही एक बच्ची को जन्म दिया जो तीन वर्ष की हो गयी पर उससे मिलने कोई नहीं आया। पति तक नहीं, क्‍योंकि बंदिनी के साथ उसके पिता तथा भाई भी फांसी पाने वाले हैं और बंदिनी की फांसी के बाद उसकी पुत्री अनाथ हो जाएगी। कि जिस समाज में माता पिता के जीवित होते हुए भी पुत्री बराबरी का दर्जा नहीं पा पाती, वहां निर्धन वर्ग की अनाथ तीन वर्ष की बच्ची का क्या होगा। कि बंदिनी अपने पिता व भाई के साथ सह अपराधिनी है मुख्य अभियुक्त नहीं। कि न्यायालय में सत्र परीक्षण के दौरान या अपील के दौरान किसी ने उसकी ओर से उचित बचाव या पैरोकारी नहीं की। कि बंदिनी का मामला उच्च अदालतों तक गया ही नहींऔर साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि हम नहीं चाहते कि एक व्यक्ति को केवल इसलिए क्षमा कर दिया जाए कि वह स्त्री है। हमारी दया याचिका के विषय में अनेक अखबारों ने प्रमुखता से छापा था।

महामहिम को दया याचिका सौंपने जब मैं और गीता कुमार गये तो इस बात पर बार बार जोर दिया कि फांसी का मामला सर्वोच्च न्यायालय तक जाना ही चाहिए। रामश्री निपट निरक्षर और इतनी निर्धन थी कि उसकी अपील उच्चतम न्यायालय तक पहुंची ही नहीं थी। उसे उच्च न्यायालय के आदेश से ही फांसी होने वाली थी। इसके बरक्स धनंजय चटर्जी का मामला सर्वोच्च न्यायालय तक दो बार गया और राष्ट्रपति तक भी। उसने देर करने के सारे हथकंडे अपनाये और फांसी की पूर्व संध्या पर भी उसने यही कहा कि वह स्वयं को दोषी नहीं समझता।
















मेरा मन बार बार अपनी दया याचिका पर लौट जाता है। वह औरत निचली अदालत से सजा पाकर अपील के बिना 6 अप्रैल 1998 को फांसी चढ़ जाती, अपने फैसले की कॉपी पाये बिना। दया याचिका देने के कई महीने बाद हम लोगों ने उच्च न्यायालय में फीस के पैसे जमा करके बड़ी कठिनाई से फैसले की नकल फैक्स द्वारा इलाहाबाद से मंगवाई थी। फैसला पढ़ कर हम स्तब्ध रह गये थे। माननीय न्यायाधीशों ने रामश्री के विषय में लिखा था कि उसके वकील ने एक बार भी उसे निर्दोष सिद्ध करने की कोशिश ही नहीं की थी, केवल उसकी सजा कम करने का अनुरोध किया था, अत: न्‍यायाधीश के पास फांसी देने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं था। फैसले के अनुसार उसके पूरे परिवार को फांसी होनी थी।
एक निर्धन निरक्षर औरत के मामूली वकील ने मुवक्किल को निर्दोष साबित करना जरूरी नहीं समझा, तो जज फांसी के अलावा क्या सजा देता। हमारी पूरी न्याय प्रणाली आमूल चूल परिवर्तन चाहती है। आज से छह साल पूर्व रामश्री के लिए दी गयी दया याचिका का मुझे कोई मलाल नहीं।
मामला रामश्री की माफी का हो या धनंजय की फांसी का एक बहुत बड़ा सवाल जो हमारे सामने खड़ा है, वह यह कि हर जुर्म की सजा पाने के लिए सिर्फ गरीब लोग ही जेल में क्यों है?
जुर्म और सजा का मसला जटिल होता है और नाजुक भी। हर मसला दूसरे से अलग होता है और विशिष्ट। इसलिए हर मामले को उसकी विशिष्टता में सुलझाने का प्रावधान है। न तो हर हत्या की सजा फांसी है और न हर चोरी की सजा जेल। मै मानती हूं कि फांसी की सजा या तो हो ही न, और यदि हो तो न्याय प्रणाली की सारी राहों को पार करके सर्वोच्च स्तर पर तय की जाए। परंतु जघन्य अपराधों के क्रूर अपराधियों को कड़ी सजा तो मिलनी ही चाहिए।
हमारी न्यायप्रणाली के अनुसार सजा के चार मकसद होते हैं : रिफॉर्मेटिव यानी सुधार के लिए, रेस्ट्रिक्टिव यानी अपराधी को बंद करके समाज को उससे बचाने के लिए, डिमास्ट्रेटिव यानी समाज के अन्य अपराधियों को आगाह कर देने के लिए और रेट्रिब्यूटिव यानी जिसके प्रति अपराध हुआ है उसकी ओर से प्रतिशोध लेने के लिए।
बच्ची के साथ बलात्कार उसके बाद हत्या करने वाले जघन्य अपराधी को सजा देकर समाज को आगाह भी किया गया है और उनके माता पिता के मन को ठंडक भी पहुंचायी गयी है जिन्होंने यह चौदह लंबे वर्ष मुकदमा लड़ते हुए बिताए होंगे। जघन्य हत्या के दोषी के लिए जीवन मांगने वालों ने कहा कि वह चौदह वर्ष जेल में रहा, यह सजा काफी है। उन्होंने यह क्यों नहीं पूछा कि हत्या जैसे स्पष्ट मामले की सुनवाई में चौदह वर्ष क्‍यों लगाये गये। देरी करने के लिए अपराधी दोषी था, यह सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया। आमतौर पर ऐसे सभी मामलों में मैंने अपराधियों को तारीख बढ़वाते ही देखा है, और इस आधार पर मुक्त होते भी कि मामले में बहुत देर हो रही है सो बेल दे दो, और एक बार बेल हो जाए, तो समझो मुक्ति।
जरा मुड़ कर देखें, तो पाएंगे कि मथुरा बलात्कार के मामले में सारे स्त्री संगठन अपराधियों को सजा दिलवाने के लिए उठ खड़े हुए थे और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सजा घटा दिये जाने का स्त्री संगठनों ने कड़ा विरोध किया था। इसी प्रकार भंवरी देवी के प्रति अपराध करने वालों को सजा न दिये जाने के मामले में सभी स्त्री संगठन न्यायपालिका से नाराज हैं और अपना विरोध दर्ज कराते रहे हैं। देश में स्त्रियां सुरक्षित नहीं हैं, यह चर्चा जारी है। बलात्कारों और हत्याकांडों का ब्यौरा रखना, मेरी रुचि का विषय नहीं है, इसलिए मैं यह गिनाना नहीं चाहती कि कितने हत्यारे छूट गये। मैं तो यह जानना चाहती हूं कि आखिर हम चाहते क्या है? कभी अपराधी को मुक्त कर दिये जाने का विरोध करना और कभी अपराधी को सजा दिये जाने का विरोध करना एक अंतर्विरोधी दृष्टि का प्रतीक है। स्त्री संगठनों, मानवाधिकार संगठनो और बुद्धिजीवियों को अपने विचारों में स्पष्टता तो लानी ही होगी।
देश में बढ़ते हुए अपराध और असुरक्षा की भावना का कारण यह नहीं है कि जुर्म की कठोर सजा दी जाती है, यहां तो समस्या यह है कि असली मुजरिम को सजा दी ही नहीं जा पाती। जेलों में बंद कैदियों में से केवल 10 प्रतिशत ही सजायाफ्ता मुजरिम हैं। शेष 90 प्रतिशत हैं बदनसीब विचाराधीन कैदी, जिनका एक निर्णय लेने में अदालत दस से पंद्रह वर्ष लगाती है। तिहाड़ जेल में एक समय में बंद 8500 कैदियों में से 7114 विचारधीन कैदी थे। असली अपराधी या तो स्वेच्छा से तारीख बढ़वाते रहते हैं, या खुले छूट जाते हैं।
भारत में, आज तक ब्रिटिश सरकार द्वारा सन 1860 में बनायी गयी क्रूर तथा रूढ़िवादी दंड प्रणाली लागू है, जो वकीलों और जजों के लिए लाभदायक है, मुजरिमों और मजलूमों के लिए नहीं। ये व्यवस्था निरक्षर निर्धन और कमजोर मुजरिम, तथा बदनसीब बेगुनाह मजलूम (विक्टिम) को, चाहे वह किसी भी वर्ग का क्यों न हो, न्याय नहीं दिला सकती। हमारा क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम क्रिमिनल के अधिकारों की रक्षा करता है, पीड़ित को कोई हक नहीं देता।
मैंने अपने संगठन की ओर से एक युवा लड़की रोमिल वाही का केस लड़ा था, जिसके सिर में कई गोलियां मार कर उसके ससुर और पति ने उसकी हत्या कर डाली थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में लिखा था कि उसकी हत्या से पहले उसे चार दिन तक भूखा रखा गया था। उसकी रिपोर्ट लिखने स्वयं मजिस्‍ट्रेट को बुलवाना पड़ा था। पुलिस ने रिपोर्ट लिखने से इनकार कर दिया था, क्योंकि ससुर ज्वांइट डायटेक्टर प्रॉसीक्यूशन थे। वे अपनी बड़ी मूंछों के कारण खुद को कर्नल वाही कहलवाना पसंद करते थे। आज वे दोनों बाप बेटे जेल में हैं। वे हर चार महीने बाद जमानत की अर्जी लगाते हैं और उनकी अर्जी का विरोध करने में मृत लड़की के पिता का हर बार चालीस से साठ हजार रुपये खर्च होता है। तीन चार वर्ष तक लाखों रुपये खर्च करके वे थक गये हैं, और अब यदि वे खूब पैसे लगा कर बेल का विरोध नहीं कर सकेंगे तो अपराधी इस आधार पर जमानत पा लेंगे कि वे काफी समय से जेल में हैं और निर्णय नहीं हो सका है इसलिए उन्हें कब तक जेल में रख जाए। मृत लड़की के पिता यदि निर्धन होते तो अपराधी शायद एक क्षण भी जेल में नहीं रहते। अपने इन अट्ठारह साल के अनुभव में मैंने दहेज उत्पीड़न और हत्या की बीसियों मामलों में से किसी एक को भी पूरी सजा होते नहीं देखा। यह व्यवस्था अपराधी को शक का लाभ (बेनिफिट ऑफ डाउट देती है, अपराध का शिकार तो शिकार होने को अभिशप्त है, पहले शिकारी का, फिर व्यवस्था का।
जो लोग फांसी की सजा का विरोध करना चाहते हैं, वे दंड विधान में परिवर्तन लाने के लिए संविधान में संशोधन का प्रयास किसी और समय क्यों नहीं करते? दसवीं में पढ़ती हुई मासूम बच्ची का बलात्कार और क्रूरता से हत्या करने वाले अपराधी को मृत्युदंड मिलते ही उसके पक्ष में रैली निकालना, बयानबाजी करना और फांसी हो जाने के बाद हाथों में दीपक लेकर उसका महिमामंडन करते हुए यात्रा निकालना कितना अशोभनीय है, कितना असामयिक और कितना क्रूर यह समझना क्या उसी का काम है जिसने अपनी बच्ची खोयी है? मानवता के पक्षधर क्या इतना भी नहीं समझ सकते?
इस बीच नागपुर में एक सनसनीखेज घटना हुई, जिसमें 13 अगस्त 2004 को कचहरी के अंदर ही औरतों के समूह ने अक्कू यादव नाम के एक अपराधी को जूते चप्पलों से पीट पीट कर मार डाला। उन्होंने उस पर लाल मिर्च और छोटे चाकुओं से हमला किया। च औरतें अपराध में पकड़ी गयीं। चार सौ अन्य औरतें सामने आ गयी और बोलीं कि अपराध में वे भी शामिल हैं। पांचो औरतों को तत्काल जमानत मिल गयी। यह अपनी तरह का अनूठा उदाहरण है, जहां अपनी सुरक्षा, अपने सम्मान और संवेदनाओं के लिए समाज स्वयं उठ खड़ा हुआ। अक्कू यादव 12 बार हत्या और बलात्कार के जुर्म में पकड़ा गया, र हर बार जमानत पर छोड़ दिया गया। दस वर्ष से आतंक फैलाने वाला मुजरिम समाज के हाथ मारा गया। यह समाज का स्वायत्त निर्णय था, जहां पीड़ित औरतों के समूह ने तय किया कि वह अपराधी को प्रश्रय देने वाली न्यायप्रणाली का मोहताज नहीं रहेगा। भावना इसके पीछे भी उसी पोएटिक जस्टिस की है अपराधी को सजा और निर्दोष को माफी। ऐसी घटनाएं भारतीय न्याय व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी हैं।
आज धनंजय चटर्जी को मासूम बच्ची की हत्या और बलात्कार के अपराध पर होने वाली फांसी से सहमत होने का भी मुझे मलाल नहीं। यह सजाएं अमानवीय भले ही लगें पर सिद्ध करती हैं कि समाज क्रूर और जघन्य अपराधों को सहन नहीं करेगा। हमें वह समाज बनाना है जहां निर्दोष निरपराध लोग भी चैन से जी सकें, जहां बच्चियां स्कूल जा सकें, पार्कों में खेल सकें, जहां मां बाप और बच्चों को हर समय बलात्कार और हत्या के खौफ के साये में न जीना पड़े, जहां न्याय प्रणाली का एकमात्र ध्येय केवल 99 फीसदी अपराधियों को इसलिए बचाना न हो कि कहीं एक निरपराध को सजा न हो जाए, बल्कि जन सामान्य को सहज सुरक्षित जीवन जीने में मदद करना हो।
इस प्रकरण में एक अहम मुद्दा है, मीडिया की भूमिका का। मीडिया गणतंत्र का चौथा स्तम्भ है। नयी तकनीक के कारण टीवी और अखबार बहुत त्वरित गति से समाचार प्राप्त करके लोगों तक पहुंचाने लगे हैं। नयी तकनीक ने उन्हें ताकत दी है, पर क्या उन्होंने इसका सही इस्तेमाल किया है? पत्रकार अपनी ताकत और लोकप्रियता के गर्व में इतने उन्मत्त हैं कि ये वे तय करेंगे कि न्यायवेत्ता न्याय कैसे करें, प्राध्यापक कैसे पढ़ाएं, डाक्टर के इलाज में क्या गलती है, सिपाही सरहद पर किस प्रकार लड़े और वैज्ञानिक किस विषय पर शोध करें। यह स्थिति इसलिए पैदा हो गयी क्‍योंकि जनता तक समाचार पहुंचाने का काम पत्रकारों के पास है, वैज्ञानिक शिक्षक, समाज सेवक, न्यायवेत्ता, सिपाही की सीधी पहुंच जनता तक नहीं, वे तो अपने क्षेत्रों में काम कर रहे हैं, डिया एक्सपर्ट कमेंट कर रहा है।
मीडिया न्यूज की जगह व्यूज दे रहा है। वह समाचार की जगह विचार दे रहा है : एक पत्रकार के अपने निजी विचार। सारे पत्रकार समाज के सबसे महान सामाजिक चिंतक नहीं है, यह बात स्पष्ट कर दी जानी चाहिए। उनका दायित्व है समाचार दे कर जनता के मन में विचारों को जगाना न कि उनके मन में अपने निजी विचार ठूंसना।
इस बीच ऐसी दो गैरजिम्मेदार बातें मीडिया धनंजय चटर्जी के मामले में उठाता रहा, और समाज दोहराता रहा, वह ये कि चौदह साल की उम्रकैद वह काट चुका और बलात्कार के लिए यह सजा काफी है।
वास्तविकता यह है कि उम्रकैद का अर्थ है मृत्युपर्यंत टिल द लास्ट ब्रेथ जेल में रहना। चौदह वर्ष की उम्रकैद केवल हिंदी फिल्मों में दिखायी जाती है, असली उम्रकैद में सारी उम्र जेल में ही रहना पड़ता है। दूसरी बात यह कि धनंजय को हत्या के अपराध की सजा मिली है, न कि बलात्कार की। बलात्कार से जुड़ी मेडिकल टेस्ट आदि की प्रक्रिया इतनी जटिल अपमानजनक तथा अपर्याप्त है कि यह मामला यदि हत्या का न होता, तो बच्ची के माता-पिता बलात्कार का अपराध सिद्ध ही न कर पाते और यदि कर भी लेते तो धनंजय केवल सात वर्ष तक जेल की कोठरी नंबर तीन में उबले अंडे, छह टोस्ट, दूध, तली मछली और दाल चावल खाकर रेडियो सुनते हुए समय बिताता और उसके बाद ऐसे ही अन्य अपराध करने के लिए स्वतंत्र हो जाता।
अब दो शब्द बुद्धिजीवियों के विषय में। भारतीय गणतंत्र में एक है पक्ष और एक है विपक्ष। अक्सर देखा गया है कि शासन जो भी निर्णय ले, उसके विरोध में आवाज उठाना जरूरी समझा जाता है, और अनेक बुद्धिजीवी विरोधी पक्ष में जा खड़े होना बेहद जरूरी समझते हैं। यह सच है कि सत्ता के मद में चूर होते प्रशासन के सामने न्याय की बात रखना बुद्धिजीवियों का दायित्व है, पर हमेशा ही विरोध का स्वर उठाते रहना इस वर्ग को अप्रांसगिक बना देगा।
अहिंसा में विश्वास करने वाले गांधीवादी विचारक यदि फांसी का विरोध करें तो यह उनकी धारणा के अनुरूप है। पर स्वयं को वामपंथी बताने वाले कम्युनिस्ट संगठनों से जुड़े तथाकथित जनवादी अपने अति बौद्धिक लेखों में लोकतंत्र के विरुद्ध हथियारबंद आंदोलनों को सही ठहराते हैं, भले ही इनमें होने वाली हिंसा का शिकार हो कर मरने वालों में वे सब आम नागरिक हों, जिनका कोई कसूर नहीं। खेद है कि इन तथाकथित जनवादियों द्वारा उकसाये गये लोगों द्वारा की गयी बेकसूरों की हत्या को जो लोग जायज मानते हैं वे ही लोग न्याय की पूरी प्रक्रिया से गुजर कर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गयी उस सजा-ए-मौत को हिंसक बता कर उसके खिलाफ खड़े हैं, जो उस बलात्कारी तथा हत्यारे को सुनायी गयी, जिसे कसूरवार पाया गया।
फांसी की सजा किसी को भी होनी ही नहीं चाहिए, यह बात अहिंसा में विश्वास करने वाले गांधीवादी विचारक मानें तो ठीक हैं, परंतु महाश्वेता देवी जैसी विदुषी लेखिका तो अपने अनेक लेखों कहानियों और उपन्यासों में ऐसी असहनीय परिस्थितियों में जीते हुए लोगों को चित्रित करती रही हैं, जिनके आगे नक्सली हिंसा में शामिल होने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं था। वे शोषण दमन और अन्याय के विरुद्ध हिंसात्मक प्रतिरोध को गलत नहीं मानती। हजार चौरासी की मांहो या नीलछवि’, या मास्टर साहबया घहराती घटाएं’, हिंसात्मक प्रतिरोध का चित्रण महाश्वेता देवी सहानुभूति से ही करती रही हैं, भले ही एक निरुपाय, दमित, शोषित विकल्पहीन व्यक्ति के अंतिम विकल्प के रूप में।
मासूम बच्ची के बलात्कार और हत्या के अपराधी से निबटने का और क्या विकल्प था? अपराधी की हिमायत में खड़े अनेक आदतन विरोधी पक्ष रखने वाले बुद्धिजीवियों की पंक्ति में महाश्वेता देवी का खड़ा होना, मुझे अचभ्मित करता है और विचलित भी। उनके प्रति असीम सम्मान और श्रद्धा रखने के बावजूद इस विषय पर मैं उनसे अपनी असहमति दर्ज कराती हूं।
मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता हैऔर जो जीवन हम दे नहीं सकते उसे हम ले भी नहीं सकतेयह वाक्य कह कर तथागत सिद्धार्थ ने एक सुकोमल निर्दोष हंस का जीवन शिकारी देवव्रत से बचा लिया था। सिद्धार्थ ने यह बात निर्दोष हंस का जीवन बचाने के लिए कही थी। बचपन में पढ़ी इस कहानी का असली अर्थ भूलकर, अपने अति उत्साह में मानवाधिकार के नाम पर बुद्धिजीवी यह वाक्य हंस के स्थान पर शिकारी को बचाने के लिए इस्तेमाल करने लगे। पीड़ित की पीड़ा को पूरी तरह नजरअंदाज करके इस बार ये लोग निर्ममता से अभियुक्त की नहीं एक निर्मम अपराधी के पक्ष में खड़े हैं।
गणतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सही इस्तेमाल हमारी बहुत बडी जिम्मेदारी है। हमें मुंह खोलने से पहले सोचना है कि हम निर्दोष हंस को बचाएंगे या नृशंस शिकारी को।
ज लगभग नौ साल बाद भी मामला ज्यों का त्यों है। 16 दिसंबर 2012 की खौफनाक घटना के बाद जब पूरा देश सड़कों पर उतर कर बलात्कार व हत्या के लिए कठोरतम सजा की मांग कर रहा था, तब यह बात फिर से चर्चा में आयी कि देश की भूतपूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने गृह विभाग की संस्तुति पर तीस लोगों की फांसी की सजा माफ कर दी थी, जिनमें 22 ऐसे लोगों की सजा माफ की गयी, जिन्होंने बच्चियों का बलात्कार किया था, सामूहिक हत्याकांडों को अंजाम दिया था और छोटे बच्चों को बर्बरतापूर्वक मार डाला था। इंडिया टुडे (22 दिसंबर 2012) में छपी सूचना के अनुसार मोतीराम तथा संतोष यादव बलात्कार के जुर्म में जेल में रह रहे थे, उन्हें सुधारने के लिए उन्हें जेलर के बगीचे का बागवान नियुक्त किया गया। उन्होंने जेलर की दस वर्षीय बच्ची के साथ बलात्कार करके उसे मार डाला। प्रतिभा पाटिल ने उसे क्षमादान दिया। सुशील मुर्मू ने एक नौ वर्षीय बच्चे का गला काट डाला, इससे पहले वह अपने छोटे भाई की बलि चढ़ा चुका था, वह भी पाटिल की दया का पात्र बना। धर्मेंद्र और नरेंद्र यादव ने नाबालिग बच्ची का बलात्कार का प्रयास किया था और उनका प्रतिरोध करने पर उसके परिवार के पांच लोगों की हत्या कर दी थी और एक दस साल के लड़के की गरदन काट कर उसका शरीर आग में झोंक दिया था। मोहन और गोपी ने एक पांच वर्ष के बच्चे का अपहरण करके उसे यातनाएं देकर मार डाला और पांच लाख की फिरौती मांगी।
हम सब जानते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय रेयरेस्ट ऑफ द रेयर केसेज में ही मृत्युदंड सुनाता है। हमारे देश में खास कर हमारे उत्तर प्रदेश में पिछले एक वर्ष से सामूहिक बलात्कार के बाद छोटी बच्चियों की हत्या अखबार में प्रतिदिन छपने वाली खबर है। यह रेयर नहीं रह गयी है, पर सजा रेयरली ही सुनायी जाती है।
भेरूसिंह बनाम राजस्थान सरकार के मामले में, जिसमें अपराधी ने अपनी पत्नी तथा पांच बच्चों की नृशंस हत्या की थी, न्यायालय ने कहा सजा देने का उद्देश्य है कि अपराध बिना सजा के न छूट जाए, पीड़ित तथा समाज को यह संतोष हो कि इंसाफ किया गया है। हमारी राय में सजा का परिमाण अपराध की क्रूरता पर निर्भर होना चाहिए, अपराधी के आचरण पर भी और असहाय तथा असुरक्षित पीड़ित की अवस्था पर भी। न्याय की मांग है कि सजा अपराध के अनुरूप हो और न्यायालय के न्याय में समाज की उस अपराध के प्रति वितृष्णा परिलक्षित हो। न्यायालय को केवल अपराधी के अधिकारों को ही नहीं, पीड़ित के अधिकारों को भी ध्यान में रखना चाहिए और समाज को भी।’’ (एससीसी पृ 481 पृ 28)
आज हमारे राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी तथाकथित बुद्धिजीवियों के उपहास व निंदा के पात्र हैं कि उन्होंने प्रतिभा पाटिल की राह नहीं अपनायी। अखबार में कार्टून है कि कहीं फांसी के फंदे चीन से आयात न करने पड़ें। पत्रकार भूल रहे हैं कि यह सजाएं 20-30 वर्ष पहले दी गयी थीं, यदि तभी तामील हो जातीं तो शायद सजा का डिमान्स्ट्रेटिव तथा डिटेरेंट होने का लक्ष्य पूरा कर कर पातीं।
प्रणव मुखर्जी ने जिन्हें दया के योग्य नहीं समझा, उनमें धरमपाल था, जो बलात्कार के अपराध में जेल गया था। बीमारी के नाम पर पैरोल पर छूटा और बलात्कार की शिकार के परिवार के पांच लोगों को मार डाला। प्रवीन कुमार ने चार लोगों की हत्या की, रामजी और सुरेश जी चौहान ने बड़े भाई की पत्नी की चार बच्चों समेत कुल्हाड़ी से काट कर हत्या की, गुरमीत ने तीन सगे भाइयों की, उनकी पत्नियों बच्चों समेत तेरह लोगों को तलवार से काट डाला, जाफर अली ने अपनी पत्नी व पांच बच्चियों को मार डाला। (हिंदुस्तान 5 अप्रैल 2013)
राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने जिनको क्षमादान नहीं दिया, उनमें वीरप्पन के चार साथी भी शामिल हैं। पाठकों को शायद स्मरण हो कि जब सैकड़ों हाथियों और पुलिसकर्मियों की हत्या करने वाले तस्कर वीरप्पन को पूर्ण क्षमादान का आश्वासन देकर उससे आत्मसर्मपण करवाने की बात सरकार चला रही थी, तब एक शहीद पुलिस अधीक्षक की पत्नी ने याचिका दी थी कि यदि अपराधी से समझौता ही करना या तो क्यों जंगलों की रक्षा करते हुए उसके पति को, वीरप्पन के हाथों मारे जाने दिया गया। उच्चतम न्यायालय ने शहीद पुलिस अधीक्षक की पत्नी की याचिका पर सरकार द्वारा वीरप्पन से समझौते पर रोक लगा दी थी।
जेल में रहकर अपराधी को अनेक अधिकार हैं। पैरोल पर छूटकर बाहर आकर अपराधों को अंजाम देने और पीड़ित के परिवार को नेस्तनाबूत करने और गवाहों को धमकाने के उदाहरण असंख्य हैं। हमारे प्रयासों से जो कर्नल वाही पिता पुत्र जेल गये थे, वे भी अक्सर लखनऊ की जेल रोड पर घूमते और फल सब्जी खरीदते देखे जाते थे। हम सबने नीतीश कटारा के हत्यारे विकास यादव, कार से लोगों को कुचलने वाले नंदा और अपराधी मनु शर्मा को पैरोल पर छूट कर मयखानों में डिस्को डांस करते हुए दिखाई देने के समाचार पढ़े हैं। अपराधी स्वयं अपनी सुविधा के अनुसार समर्पण करते हैं। हम लोग यह सब संजय दत्त के मामले में देख ही रहे हैं, कि वे जेल में जाने के लिए छह महीने की मोहलत मांग रहे हैं, और उनके साथ के अन्य अपराधी भी। मोहलत मांगने का हक मुल्जिम को है, क्या अपराधी अपने शिकार को कोई मोहलत देते हैं?
शिकार के हक की रक्षा तो कानून भी नहीं करता। शिकार और उनके दोस्त अहबाब सिर्फ इंतजार करते हैं। अभी गोंडा में 31 वर्ष पहले हुई पुलिस के एसओ केपी सिंह तथा 12 अन्य निर्दोषों की हत्या के अपराधियों को निचली अदालत ने फांसी की सजा सुनायी। अखबार में किंजल सिंह की रोते हुए तस्वीर छपी है, पिता की हत्या के समय वे चार माह की थीं, आज वे एक आइएएस अधिकारी हैं। इन 31 वर्षों के बीच उनकी मां भी गुजर गयीं। (दैनिक जागरण 6 अप्रैल 2013) ऐसे अपराधियों के पास सर्वोच्च न्यायालय तक जाने और वहां भी अपराधी पाये जाने के बाद भी दया पाने का हक है। पीड़ितों के पास शीघ्र इंसाफ पाने का कोई मौलिक अधिकार नहीं।
सर्वोच्च न्यायालय के न्‍यायाधीश डॉ एएस आनंद ने विक्टिम ऑफ क्राइम अनसीन साइडमें लिखा है, ’’विक्टिम (मजलूम) दुर्भाग्य से दंड प्रक्रिया का सर्वाधिक विस्मृत और तिरस्कृत प्राणी है। एंग्लो सेक्‍शन प्रणाली पर आधारित अन्य प्रणालियों की भांति हमारी दंड प्रक्रिया भी अपराधी पर केंद्रित है उसके कृत्य, उसके अधिकार और उसका सुधार। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद विकसित देशों जैसे ब्रिटेन, आस्‍ट्रेलिया, न्यूजीलैंड अमरीका आदि ने अभागे पीड़ितों पर भी ध्यान देना शुरू किया है, जो दरअसल अपराध के सबसे बड़े शिकार होते हैं और जिनकी क्षति पूर्ति किया ही जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र संघ की घोषणा (1985) के बाद अमरीका ने भी विक्टिम ऑफ क्राइम एक्ट बनाया। मुजरिम को जमानत का अधिकार एक अधिकार स्वरूप मिला है, पर पीड़ित को जमानत का विरोध करने का यह अधिकार नहीं। राज्य की इच्छा पर निर्भर है कि वह चाहे तो विरोध करे चाहे न करे। पूरी दंड प्रक्रिया में पीड़ित की भूमिका सिवा एक गवाह के कुछ नहीं, वह भी तब, यदि सरकारी वकील चाहे।’’
मेरा यह आलेख फांसी की सजा के पक्ष में लिखा गया आलेख नहीं है। यह मजलूम के हकों के पक्ष में लिखा गया लेख है। यह आवाज पीड़ित के अधिकार के पक्ष में उठी आवाज है। हमारी दंड प्रक्रिया क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम कहलाती है, जो क्रिमिनल को केंद्र में रखती है उसके अधिकार, उसकी सुविधा, उसकी सुरक्षा, उसकी खुराक, उसका परिवार, उसके परिवार का दुख, दंड का विरोध करने का उसका हक, उसका सुधार। निर्भया कांड के अभियुक्त विनय शर्मा ने अदालत के माध्यम से अपने लिए तिहाड़ जेल में फलों अंडे और दूध से युक्त बेहतर खुराक की मांग की है कि वह परीक्षा में बैठेगा। जिन्होंने बेटी खोयी है वे क्या खा रहे होंगे, क्या उन्हें भी ऐसी मांगें रखने का कानूनी हक है? जो अपराध का शिकार हुए, उस पीड़ित व्यक्ति की पीड़ा न हमारे कानून की जिज्ञासा का विषय है, न हमारी।
आज जब मैं अपने इस पुराने आलेख को पुन: आपके सामने प्रस्तुत कर रही हूं, हमारे आदरणीय बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर का जन्मदिन चौदह अप्रैल है। अखबार में उनके संविधानसभा में दिये गये भाषण का मुख्य अंश छपा है, ’’संविधान सभा के कार्य पर नजर डालते हुए नौ दिसंबर 1946 को हुई उसकी पहली बैठक के बाद अब दो वर्ष ग्यारह महीने और सात दिन हो जाएंगे। संविधान सभा में मेरे आने के पीछे मेरा उद्देश्य अनुसूचित जातियों की रक्षा करने से अधिक कुछ नहीं था। जब प्रारूप समिति ने मुझे उसका अध्यक्ष निर्वाचित किया, तो मेरे लिए यह आश्चर्य से भी परे था। इतना विश्वास करने और सेवा का अवसर देने के लिए मैं अनुग्रहीत हूं। मैं मानता हूं कि कोई संविधान चाहे जितना अच्छा हो, वह बुरा साबित हो सकता है, यदि अनुसरण करने वाले लोग बुरे हों। एक संविधान चाहे कितना बुरा हो, वह अच्छा साबित हो सकता है, यदि उसका पालन करने वाले लोग अच्छे हों। ’’(दैनिक हिंदुस्तान, रविवार, 14 अप्रैल 2013, पृ 16)
हमारे संविधान निर्माता डॉ अंबेडकर की कही हुई उक्त अंतिम पंक्ति कितनी सरल और कितनी साधारण है, पर कितनी सारगर्भित। अच्छे लोग पीड़ित की पीड़ा को देखकर पीड़ित के अधिकार की रक्षा के लिए संविधान का इस्तेमाल करेंगे या संविधान में दी गयी भांति भांति की न्यायिक प्रक्रियाओं का आश्रय लेकर अभियुक्त के अधिकारों की रक्षा करते हुए अपराधियों के पक्ष में जुलूस निकालते रहेंगे। हमारा समाज और संविधान भोले बेकसूर हंस की रक्षा करेगा या कुसूरवार बेरहम शिकारी की?