Thursday, February 28, 2013

हमेशा याद आती हैं वो दो बेवकूफ औरतें!



साल 2008 में अहमदाबाद धमाकों के बाद लेखक द्वारा लिखा गया यह लेख हैदराबाद बम धमाकों के संदर्भ में पुन:प्रकाशित किया जा रहा है।

मेरे दोस्त कहते हैं मैं अक्सर महिलाओं के खयाल में रहता हूं, सच कहते हैं।

देखो ना, जाने कब फटा था अहमदाबाद में बम, जाने कब आयी थी बिहार में बाढ़, फि र भी दो औरतों को अपने साथ लिए घूम रहा हूं,पीछा ही नहीं छोड़तीं कमबख्त।

एक तो मर भी चुकी है। फ ल के ठेले के पास खड़ी थी, पीली साड़ी पहन कर, अमरूद ले रही थी, दाहिने हाथ में प्लास्टिक की थैली थी,बाएं हाथ में कुछ छोटे नोट दबा रखे थे। ठेले पर सेब भी थे, अनार भी, लेकिन अमरूद सस्ता होता है न।

अमरूद लिया नहीं, कि बम फ ट गया धड़ाम से। गिर पड़ी मुई,पीठ के बल, उसी अहमदाबाद के बाज़ार में, आतंकवादी नेकिसी छोटे से कमरे में बैठ के जो बनाया था, उस बम से निकले पतले-पतले लोहे के टुकड़ेउसके बदन को चीर गए। फ ल वाला भी मर गया बेकार में, रुपैय्या-रुपैय्या भाव-ताव करता था,अब पता चला आटे दाल का भाव। और वो पीली साड़ी वाली औरत, कौन जाने उसके मुंह से कुछनिकला होगा कि नहीं, 'ओ' बोली होगी क्या? सर जब ज़मीन से लड़ा तो धमक लगी होगी क्या?या तब तक मर गयी होगी? थैली से अमरूद बिखर गए, फैल गए दूर-दूर तक।

अक्सर सोचता हूं उसके बारे में। कौन पीछे उसकी राह देखता होगा उस शाम, किस गाँव कीकितनी घोर गरीबी छोड़ कर उसका परिवार शहर आया होगा, ताकि कजऱ् से फांसी न लगानीपड़े। किस से कह कर आयी होगी 'बस अभी आयी बेटा, अमरूद लाने जा रही हूं' कौन नाराज़ होताहोगा, 'इत्ती देर हो गई, अमरूद लाने में, इत्ती देर लगती है क्या'? सच है, अमरूद लाने में इत्ती देरकहां लगती है? हां, मरने में  थोड़ा वक्त ज़रूर लग जाता है। धीमी-धीमी मौत मरते हैं ना इसमुल्क के करोड़ों लोग।

अहमदाबाद के उस बाज़ार से सैकड़ों मील दूर, बिहार के मधेपुरा जिले के लखीपुरा गाँव में रहती है दूसरी औरत मरी नहीं है अभी, हां मरने चली थी उस रोज़। गाँव आयीरक्षा नाव वापस जाने को थी, खाना बांट कर नेशनल डिज़ास्टर रेस्पोंस फ ोर्स के कमांडेंट डैनियल अधिकारी के पास खाने का आखिऱी थैला बचा था, और सारा गाँवभूखा था। जैसे ही थैला हवा मैं उछला, वो पागल औरत पानी में कूद गयी, पेट जो भरना था परिवार का। मर सकती थी, लेकिन भूख से मरने से तो ज़्यादा इज्ज़तदारहोती ये मौत।

थैली उसके हाथ में आयी कि एक और आदमी कूद गया पानी में, लड़ते रहे वो कितनी देर तक, मुझे इस कहानी का अंत नहीं मालूम, पता नहीं उस पागल औरत के घरउस दिन रोटी बनी या नहीं, क्या पता अब तक जिंदा भी है या मर गई, अगली नाव की राह देखते-देखते। अक्सर दिल्ली में लाल बत्ती होने पर, गाड़ी में बैठे-बैठे भीखमांगने वाले बच्चों को देख कर सोचता था, अगर उन दो औरतों के बच्चे कभी भटकते हुए आमने-सामने मिल गए तो पता है क्या बोलेंगे एक दूसरे से?

'माँ को कभी घर से मत निकलने देना।'

सार्वजनिक बहसों से बुज़ुर्ग ग़ायब ही हो गए!



लोकसभा में बुजुर्गों की सामाजिक सुरक्षा पर बहस चल रही थी। यह चर्चा हैदराबाद बम धमाकों के कारण हर तरह की ख़बरों से गायबथी। मैं भी अचानक लोकसभा टीवी पर चर्चा सुनने लगा। कांग्रेस के जय प्रकाश अग्रवाल ने निजी विधेयक पेश किया था। जिसे सुनने केलिए कम ही सांसद मौजूद थे। मगर जो बोल रहे थे अपनी-अपनी जानकारियों से लैस थे। उन भाषणों के साथ मैं भी उन दृश्यों सेगुजऱने लगा कि गाँव के घरों में बुज़ुर्गों की क्या हालत है। यह वो जरूरी मुद्दा है जिसे सुनने के लिए पूरे सदन को मौज़ूद होना चाहिए था।खैर अच्छी बात ये रही कि जितने भी सांसदों ने बोला उन सबने ख़ाली कुर्सियों की कमी पूरी कर दी। इतनी कि दो घंटे की चर्चा को एकऔर घंटे के लिए बढ़ाना पड़ा। हमारी राजनीति ऐसे मुद्दों से नहीं चलती, इसीलिए बड़े नेता हैदराबाद बम धमाकों पर नाहक तू-तू मैं-मैंकर रहे थे।

हमारे देश में करीब आठ करोड़ वरिष्ठ नागरिक हैं। अव्वल तो वरिष्ठ नागरिकों की उम्र सीमा में ही राज्यों से लेकर विभागों में अंतर है।कहीं साठ साल की उम्र में वरिष्ठ नागरिक की मान्यता है, तो कहीं पैंसठ साल। सांसद मांग कर रहे थे कि वरिष्ठ नागरिकों के लिए उम्रका एक ही पैमाना होना चाहिए। जयप्रकाश अग्रवाल ने अपने निजी विधेयक में सुझाव दिया है कि जि़लास्तर पर बुज़ुर्गों के लिएबेहतरीन आश्रय का निर्माण किया जाए। कांग्रेस के सांसद लाल सिंह ने जोरदार तरीके से कहा कि बुज़ुर्गों को सामाजिक सुरक्षा देते वक्तएपीएल और बीपीएल की श्रेणी समाप्त कर दी जाए। लाल सिंह भावुक होकर बोल रहे थे कि अगर हम बुज़ुर्गों का ख्याल नहीं रख सकतेतो लानत है हमारे फ लना मंत्री और सरकार होने पर।

आप जानते हैं कि सरकार ने वृद्धावस्था पेंशन के लिए उम्र साठ साल कर दी है और पेंशन की राशि दो सौ रुपये महीने से बढ़ाकर तीन सौ रुपये कर दी है। अस्सी साल सेऊपर के बुज़ुर्गों को पाँच सौ रुपये मासिक पेंशन दी जाती है। क्या यह राशि मज़ाक नहीं है। जेडीयू के सांसद मंगनी लाल मंडल ने कहा कि राज्यों को छूट है कि केंद्र कीतय राशि में वे अपना अंश जोड़ सकते हैं पर इसके बाद भी कहीं भी छह सौ रुपये से ज़्यादा पेंशन नहीं है। यह अंतर क्यों होना चाहिए। सबको समान पेंशन मिलनीचाहिए। कांग्रेस सांसद लाल सिंह ने कहा कि पेंशन की राशि दो सौ नहीं दो हजार या पांच हजार होनी चाहिए।

इस बहस में कई दलों के नेता शामिल थे। कोई राजनीति नहीं कर रहा था मगर एक दूसरे का सहयोग ही कर रहे थे, ताकि सरकार बुज़ुर्गों के लिए व्यवस्था कर सके।बीजू जनता दल के सांसद ने बुज़ुर्गों की सेवा के लिए जिलों में नर्सों की उपलब्धता पर ज़ोर दिया। उनकी बीमारियों की चर्चा की और कहा कि स्वास्थ्य पर ध्यान दियाजाना चाहिए। मंगनी लाल मंडल ने कहा कि ऐसी व्यवस्था हो कि सबको पेंशन मिले। प्रधान सूचित करे कि हमारे गाँव में कोई वंचित नहीं है। वक्त आ गया है किसरकार बुज़ुर्गों की जि़म्मेदारी ले।

समाज और समय बदल गया है। लोग नौकरियों के लिए स्थान बदलने को मज़बूर हो रहे हैं। ऐसे में बुज़ुर्ग घर में अकेले हो गए हैं। जयप्रकाश अग्रवाल ने अपने बिल मेंकहा है कि परिवार में ही बुज़ुर्ग की उपेक्षा हो रही है। इसे स्वीकार करना चाहिए। उनकी वित्तीय और सामाजिक सुरक्षा होनी चाहिए। बसपा के सांसद विजय बहादुर सिंह नेएक कि़स्सा सुनाया, 'नेपोलियन अपने जनरलों में बुज़ुर्गों को भी रखता था ताकि उनके अनुभव का लाभ उठाया जा सके।Ó विजय बहादुर सिंह ने एक अच्छा सुझावदिया कि खटिया पर लादकर पेंशनियां लोगों को तहसील क्यों ले जाया जाता है। क्या हर तीन महीने पर तहसील का अफ़ सर बुज़ुर्गों के पास जाकर तस्दीक़ नहीं करसकते। ये सांसद उस धारणा को भी चुनौती दे रहे थे कि आजकल हर बात में युवा-युवा हो रहा है। सार्वजनिक बहसों से बुज़ुर्ग ग़ायब कर दिए गए हैं। इन सांसदों ने कहाकि मीडिया को भी ऐसे मुद्दे के प्रति जागरुकता फैलाने में भूमिका अदा करनी चाहिए। इसके तुरंत बाद मैं कई चैनलों पर गया। अफ़ सोस ये ख़बर कहीं नहीं थी।

  (ये लेखक के अपने विचार हैं)