Sunday, December 21, 2014

जिंदगी बादे फना तुझको मिलेगी हसरत!

पिछले कई सालों से अयोध्या फिल्म सोसाइटी द्वारा आयोजित फिल्म फेस्टिवल का समापन हो गया। गौरतलब है कि अवध की गंगा-जमानी तहजीब को समर्पित इस फेस्टिवल में सिनेमा के माध्यम से समाज और राजनीतिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर बहस की जाती है। बता दें कि फेस्टिवल ‘आवाम का सिनेमा’ का उद्घाटन प्रेस क्लब फैजाबाद में किया गया। इस दौरान काकोरी के क्रांतिवीर की जेल डायरी और दुर्लभ दस्तावेजों की प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया। इस अनोखी प्रदर्शनी का उद्घाटन फिल्मकार-लेखिका मधुलिका सिंह के हाथों हुआ। मधुलिका सिंह ने कहा कि, ‘आज सोशल मीडिया के चलते समाज के भीतर जागरूकता पैदा हुई है। नौजवान तो जागरूक हुआ ही है उसके परिणाम से कई तरह के सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलनो का दौर भी शुरू हो गया है। इसका प्रमाण यह है कि पिछले कुछ माह में देश की जनता ने कई घटनाओं को लेकर खुलकर अपना प्रतिरोध जताया। ऐसे समय में फैजाबाद जैसी जगह पर अवाम का सिनेमा के माध्यम से वैसा ही कार्य किया जा रहा है। इसके लिए अवाम का सिनेमा बधाई के काबिल है। ऐसे ही कार्यक्रमों के माध्यम से नयी पीढ़ी शहीदों के विचारों से लैस होती है और समाज को उसका लाभ मिलता है। आने वाले खतरों से निपटने के लिए यह जरूरी भी है।
कार्यक्रम के दौरान मौजूद समाजवादी विचारक अशोक श्रीवास्तव ने कहा कि जिस दासता से मुक्ति के लिए शहीदों ने बलिदान दिया, उसी आजादी पर आज चौतरफा खतरा बढ़ा है। अतुल कुमार सिंह ने कहा कि जिस खतरनाक दौर में देश चल रहा है, उसमें नयी पीढ़ी को शहीद-ए-वतन अशफाक उल्ला खां, भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों के विचारों से परिचित होना जरूरी है।
उद्घाटन समारोह को हरिशचंद्र श्रीवास्तव, जलाल सिद्दीकी, सूर्यकांत पांडेय, सैय्यद निजाम अशरफ, सौमित्र मिश्र, इरम सिद्दीकी, मास्टर अहमद अली आदि वक्ताओं ने भी संबोधित किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता शिल्पी चौधरी ने की, संचालन वरिष्ठ रंगकर्मी सुनील दत्ता ने किया। पूरे कार्यक्रम की खास बात यह रही कि इसी दौरान आजादी के बाद पहली बार शहीद-ए-वतन अशफाक उल्ला खां की डायरी को आम आदमी के बीच प्रदर्शित किया गया। प्रदर्शनी में पहुंचे लोगों ने उनके पन्नों को पढ़कर जाना कि हमारे अमर शहीद समाज की बुराइयों और गुलामी की जंजीरों से निपटने के लिए किस तरह कटिबद्ध थे। कैसे वे अपने जान की परवाह तक नहीं करते थे। प्रदर्शनी में शहीदों से जुड़े दुर्लभ दस्तावेजों को नयी पीढ़ी के बीच ले जाने के प्रयास की काफी सराहना की गयी।
‘अवाम का सिनेमा’ के 8वें अयोध्या फिल्म फेस्टिवल के अहम सदस्यों ने कार्यक्रम के दौरान ही शहीद-ए-वतन अशफाक उल्ला खां के शहादत स्थल का भी दौरा किया। इस दौरान काकोरी के नायक के शहादत स्थल के सामने चौधरी चरण सिंह गेट देखकर लोग आहत भी हुए। इस संबंध में दुखी कार्यकर्ताओं ने वहां से लौटने के बाद राज्य के मुखिया अखिलेश यादव को एक पत्र लिखकर इस बारे में अवगत कराया। अयोध्या फिल्म सोसाइटी ने तीन दिवसीय 8वें प्रतिरोध की संस्कृति ‘अवाम का सिनेमा’ के माध्यम से अपना कड़ा प्रतिरोध जताते हुए तत्काल कारवाई करने की मांग की। ऐसा नहीं किये जाने पर अयोध्या से ही आंदोलन किये जाने की चेतावनी दी गयी।
दरअसल 19 दिसंबर 2007 को शहीद-ए-वतन अशफाक उल्ला खां का अपमान करने की साजिश के तहत शहीदी गेट के आगे चौधरी चरण सिंह गेट का निर्माण करा दिया गया था। शहीद-ए-वतन के शहादत-दिवस और 1857 की 150वीं वर्षगांठ पर जिस जगह शहीद अशफाकउल्ला खां का स्मारक होना चाहिए था, वहां पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह गेट बना दिया गया, वह भी महज इसलिए कि चौधरी चरण सिंह के बेटे चौधरी अजित सिंह की पार्टी के तत्कालीन विधानपरिषद सदस्य व मंत्री मुन्ना सिंह अपने राजनीतिक हित साधकर चौधरी अजित सिंह को खुश करना चाहते थे।
उधर, ‘अवाम का सिनेमा’ आयोजन के तीसरे दिन भानु प्रताप वर्मा कालेज हनुमंत नगर, मसौधा के परिसर मे प्रतिरोध की संस्कृति ‘अवाम के सिनेमा’ का समापन के मौके पर प्रधानाचार्य निर्मल कुमार वर्मा ने अपने बयान में कहा कि गांव-देहात में सिनेमा की ऐसी संस्कृति की लगातार पहल होनी चाहिए, जिससे कस्बाई इलाकों की नयी पीढ़ी भी देश-दुनिया से वाकिफ हो।
फिल्म प्रभाग की प्रस्तुति दस्तावेजी फिल्म ‘बेगम अख्तर’ के प्रदर्शन के बाद सिनेमा एक्टिविस्ट शाह आलम ने कहा कि मलिका-ए-गजल बेगम अख्तर अवध में अजनबी बन गयी हैं। मसौधा से चंद कदम दूर भदरसा में जन्मी बेगम को दुनियाभर में गजल की रूह कहा जाता है। रेशमी, उनींदी, जलतरंग सी कोमल और गहरी आवाज की मलिका अख्तरी बाई फैजाबादी उर्फ बेगम अख्तर गजल, ठुमरी और दादरा गायन में देश की सबसे बुलंद आवाजों में एक रही हैं। महज पंद्रह साल की उम्र में ही उन्होंने अपने संगीत कार्यक्रमों से देशव्यापी शोहरत पायी।
शाह आलम ने बताया कि उनकी कला के सम्मान में भारत सरकार ने 1968 में उन्‍हें पद्मश्री और 1975 में पद्मभूषण से नवाजा। आज इस महान शख्सियत और उसकी कला को संजोने के बजाय अपने ही दयार में उन्हें भुला दिया गया। उनकी याद में स्मारक जैसा भी कुछ नहीं और न ही कोई संगीत कॉलेज।
इस दौरान एक बच्चे की मनोदशा और सामाजिक दायित्वों पर सवाल करती फिल्म “कैद” का प्रदर्शन किया गया। हिंदी में बनी यह फिल्म समाज में फैले अंधविश्वास और तंत्र-मंत्र के खिलाफ संदेश देती है। फिल्म प्रदर्शन के बाद रंगकर्मी सुनील दत्ता ने बताया कि “कैद” फिल्म की कहानी प्रसिद्ध लेखक ज्ञान प्रकाश विवेक से उधार ली गयी है। कैद की कहानी संजू नामके एक लड़के पर केंद्रित है, जो अंधेरे और अकेलेपन का ऐसा आदी हो जाता है कि किसी को देखते ही चीखने-चिल्लाने लगता है।
फेस्टिवल के दौरान प्रसिद्ध फिल्म निर्माता-निर्देशक ख्वाजा अहमद अब्बास के जन्मशताब्दी वर्ष में उनकी विश्वविख्यात ‘धरती के लाल’ फिल्म के कुछ अंश दिखाये गये। इस दौरान प्रसिद्ध फिल्म मेकर मणि कौल की फिल्म ‘सतह से उठता आदमी’ के अंश दिखाकर विद्रोही जनवादी कवि मुक्तिबोध को भी याद किया गया।

Saturday, August 16, 2014

बात काम की हो, जात की नहीं!


दिल्ली के सफ़ दरजंग अस्पताल के बाहर एक प्राइवेट शौचालय बना है। काफी साफ .सुथरा और दर्शनीय है। कुछ साल पहले इस शौचालय के दरबान से मुलाक़ात हुई थी। उत्तर प्रदेश के रहने वाले ये जनाब जाति से ठाकुर थे और बीए पास भी। आठ हज़ार रुपये की नौकरी को जाति के लिए कैसे लात मार देते। पूछने पर कहा कि गाँव में किसी को नहीं बताया है और दिल्ली जैसे बड़े शहर में किसी को पता भी नहीं चलता कि मैं क्या काम कर रहा हूं। गाँव में शर्म आती है बताने में और दिल्ली में इससे मेरा घर चल जाता है। उसकी यह बात हमेशा के लिए याद रह गई।

देश के गाँवों से निकले लाखों की संख्या में लोग सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करने देश के अलग.अलग शहरों में जा रहे हैं। बड़ी संख्या में लोग एक नया अनुभव हासिल कर रहे हैंए जिनकी तरफ़  अभी ध्यान नहीं दिया गया है। शुरू से ही गार्ड की दुनिया में दिलचस्पी होने के कारण मैं जानकारियां जुटाते रहता हूं। रंग-बिरंगी वर्दियों में तैनात ये लोग लाखों करोड़ों की इमारतोंए बैंकए एटीएम, अस्पताल, शॉपिंग मॉल से लेकर घर और मोहल्ले तक की सुरक्षा कर रहे हैं। आज देश में कई सुरक्षा कंपनियां हैं। जिनमें पचास लाख से ज़्यादा लोग सिक्योरिटी गार्ड बने हुए हैं। इनमें से कई इतने पढ़े.लिखे हैं कि अपनी मेहनत से उसी कंपनी में गार्ड से मैनेजर भी बन जाते हैं।

सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी ने पलायन कर आए लोगों को काफी सहारा दिया है। अपने अनुभव और बातचीत के आधार पर यह धारणा बनती हुई लगती हैं कि इनमें ज़्यादातर ऊंची जाति के लोग हैं। हालांकि कंपनियों के पास जाति के आधार पर कोई जानकारी नहीं हैए मगर अब दलित और अन्य पिछड़े वर्ग के लड़के-लड़कियां भी इस पेशे को अपना रहे हैं। इस पेशे से जुड़ी एक कंपनी में काम करने वाले मेरे अधिकारी मित्र ने बताया कि ऐसा लगता है कि बिहार से जो लोग गार्ड बने हैं उनमें राजपूत और भूमिहार ज़्यादा हैं। उनकी इस बात पर एक पुराना इंटरव्यू याद आ गया। दिल्ली के हमदर्द विश्वविद्यालय के सामने की बस्ती में सिक्योरिटी गार्ड की वर्दी   बनती हैंए वहां मैं टीवी की    रिपोर्ट की शूटिंग के लिए गया था। तब एक सज्जन से मुलाक़ात हुई थी। उन्होंने बताया कि वे जाति से भूमिहार हैं। लालू यादव के राज में  काम मिलना ख़त्म हो गया तो और गऱीब होते चले गए। गाँव में सब उन्हें बाबू साहब कह कर पुकारते थे और सलामी देते थे। हमसे मिट्टी उठाने या नाली साफ़  करने का काम नहीं हो सकता। होटल में बर्तन साफ़  नहीं कर सकता। कम से कम गार्ड की वर्दी मिलिट्री जैसी लगती है। इज़्ज़त है इसमें। यह एक ऐसा काम है जिसे अब हर जाति के लोग करते हैं।

महानगरों में तरह.तरह के रोजग़ार पनपते रहते हैं। ये नए काम जाति के आधार पर बने बनाए काम से अलग होते हैं, फि र भी इनके भीतर जाति अपना रंग कैसे बदलती है यह जानना कितना दिलचस्प है। एकांत में चुपचाप खड़े रहने वाले ये गार्ड पूरे दिन किस मनोस्थिति में खड़े रहते हैं, हमें समझने की कोशिश करनी चाहिए। कई जगहों पर तो इन्हें शौचालय की उचित व्यवस्था भी नहीं मिलती है। अपने मोबाइल में ये रामायणए रागिनीए आल्हा.ऊदलए भोजपुरी गाने डाउनलोड कर सुनते मिलते हैं। एक अनजान जगह की चौकीदारी में अपनी भाषा संस्कृति के साथ जीते हैं।

एक बात और है। बिहारए यूपी के लोग दिल्ली आकर ही गार्ड बनना चाहते हैं। दिल्ली में इन दो राज्यों के अलावा हरियाणा और राजस्थान के गाँवों से आये लोग मिल जाते हैं। दिल्ली में न्यूनतम मज़दूरी की दर इसके आसपास के राज्यों से  ज़्यादा है इसलिए लोग यहां  काम करना पसंद करते हैं। दिल्ली में न्यूनतम मज़दूरी के हिसाब से 26 दिन का वेतन 7265 रुपये बन जाता हैं जो यूपी के4700 रुपये से ज़्यादा है। इसलिए यूपी में गार्ड मिलने में आसानी नहीं होती। सब दिल्ली आ जाते हैं। उड़ीसा में हैदराबाद से कम न्यूनतम मज़दूरी  है इसलिए हैदराबाद में बड़ी संख्या में उडिय़ा सिक्योरिटी गार्ड मिलेंगे। गार्ड की इस नई नौकरी में कई कि़स्से हैं। एक अख़बार में पढ़ा  कि इटावा मैनपुरी में बंदूक़ के लाइसेंस की बहुत मारामारी और सिफारिशें चलती हैं। पता किया  तो इनमें से कई दिल्ली में सिक्योरिटी गार्ड बनने के लिए लाइसेंस लेते हैं। बंदूक़ वाले गार्ड का वेतन और भाव थोड़ा ज़्यादा होता है।

एक अनोखा कि़स्सा है वर्दी का। जब वो पहली बार वर्दी पहनते हैं तो सेना और सिपाही के जवान वाले गर्व भाव से भर जाते हैं लेकिन जल्दी ही उनका यह भाव ख़त्म हो जाता है। लोग अक्सर गार्ड को गाली दे देते हैं। उनका सम्मान नहीं करते। जिन नियमों के पालन के लिए उनकी तैनाती होती है उसका सम्मान नहीं करते। यहां तक कि गेट में रखे रजिस्टर को भी ठीक से नहीं भरते।

मुझे नहीं मालूम कि जब सेना का जवान गाँव लौटता होगा तो उसका किस तरह से सम्मान होता होगा और जब ये नए ज़माने को सिक्योरिटी गार्ड गाँव लौटते होंगे तो क्या उनका वैसा  सम्मान होता होगा। कोई बात नहींए जब बात रोजग़ार की हो तो बात काम की होना चाहिए। उसके जात की नहीं।
;ये लेखक के अपने विचार हैंद्ध

Sunday, March 02, 2014

बच्‍चे एक दिन यमलोक पर धावा बोलेंगे…

ज से सौ साल पहले वह कलकत्ता से पानी के जहाज में बैठ कर एक अनजान सफर पर निकली थी। उस सफर में उसके साथ कोई अपना न था। वह अकेली थी। वह गर्भवती थी। ‘द क्लाइड’ नाम के उस जहाज पर जो उसके हमसफर थे, उन्हें भी मंजिल का पता न था। साथ में कुछ बहुत जरूरी चीजों के गट्ठर थे और एक उम्मीद थी कि जहां जा रहे हैं, वहां भला-सा कोई रोजगार होगा और कुछ समय बाद कुछ कमा कर वापस लौट आएंगे। ऐसे जहाजों की रवानगी का सिलसिला 1834 से शुरू हुआ था और 1920 तक चलता रहा था। जो गये वे लौटे नहीं। जहां-जहां गये, वहीं के होकर रह गये। जिन गांवों और रिश्तों को पीछे छोड़ गये थे, वे भी उनको भूलते गये। लेकिन उनकी और उनकी संतानों की यादों में, व्यवहार में, संस्कार में अपना ‘देस’, अपनी ‘माटी’, अपनी ‘नदियां’, अपने ‘तीरथ’ और अपने ‘देवता-पितर’ बने रहे, बचे रहे। सरकारों और कंपनियों की दस्तावेजों में इन्हें ‘कूली’ की संज्ञा दी गयी, बोलचाल में वे ‘गिरमिट’ या ‘गिरमिटिया’ कहे गये। पुराने रिश्ते सात समंदरों में धुलते-घुलते गये। एक जहाज में आये गिरमिटों ने नया रिश्ता गढ़ा और एक-दूसरे को जहाजी का संबोधन दिया। गोरी सभ्यता गुलामी को नये-नये नाम देती रही, जिंदगी आजादी के सपने गढ़ती रही, जीती रही। खैर…
उस अकेली गर्भवती स्त्री को जहाज तीन महीने की यात्रा के बाद ब्रिटिश गुयाना लेकर पहुंचा। उसकी गोद में अब उसका बच्चा था, जो यात्रा की तकलीफों के कारण समय से पहले ही इस दुनिया में आ गया था। शक्कर बनाने के लिए उपजाये जा रहे गन्ने के खेत में उसने मजदूरी शुरू कर दी। समय बदला, सदी बदली। सुजरिया की संतानें एक दूसरी यात्रा करते हुए एक अन्य महादेश जा पहुंचीं। उन्हीं संतानों में से एक गायत्रा बहादुर अब अमरीका में जानी-मानी पत्रकार और लेखिका हैं। सौ साल बाद बहादुर एक यात्रा पर निकलती हैं, अपनी परनानी सुजरिया का पता करने। उनके पास उसकी एक तस्वीर थी। यह यात्रा गायत्रा को कई देशों-द्वीपों से गुजारते हुए बिहार के छपरा जिले के एक कस्बे एकमा के नजदीक बसे गांव भूरहुपुर लाती है, जहां से 27 साल की सुजरिया और उसके गर्भ में पल रहे चार माह के बच्चे की यात्रा 1903 में शुरू हुई थी। अपनी परनानी सुजरिया का पता खोजती गायत्रा इस यात्रा में हजारों सुजरियों से मिलती है, जिनमें तेजतर्रार विधवा जानकी है जो जहाज पर कार्यरत ब्रिटिश चिकित्सक से शादी कर लेती है और आठ साल की वह बच्ची भी है, जिसका पिता बिस्कुट के बदले उससे वेश्यावृत्ति कराने पर मजबूर करता है।
शास्त्रीय इतिहास गुलामों को जगह नहीं देता। गुलाम शास्त्र नहीं लिखते। उनकी स्मृतियां गीतों-रिवाजों में पनाह लेती हैं, कथाओं में तब्दील हो जाती हैं। गुलाम औरतें इस ‘लोक’ में भी हाशिये पर रहती हैं। धीरे-धीरे उनका इतिहास जानना कठिन ही नहीं, असंभव होता जाता है। ऐसी ही कुछ असंभावनाओं को गायत्रा अपनी किताब ‘कूली वूमन – द ओडिसी ऑफ इंडेंचर’ में तलाशने की कोशिश करती हैं। इस किताब में परिवार है, पत्रकारिता है, अभिलेखों और स्मृतियों में दबा इतिहास है, गोरी सभ्यता के औपनिवेशिक दंभ और दमन के विरुद्ध अभियोग-पत्र है। सबसे बढ़ कर यह उन पुरखों के प्रति श्रद्धा है, जिन्होंने भयानक परिस्थितियों में जीवन की आस नहीं छोड़ी। यह किताब अशोक वाजपेयी की एक कविता का साकार है :
बच्चे एक दिन यमलोक पर धावा बोलेंगे
और छुड़ा ले आएंगे
सब पुरखों को
वापस पृथ्वी पर,
और फिर आंखें फाड़े
विस्मय से सुनते रहेंगे
एक अनंत कहानी
सदियों तक।
गायत्रा बहादुर इस किताब में अपनी सांस्कृतिक पहचान की तलाश भी करती हैं। वे किसी तटस्थ इतिहासकार या पत्रकार की तरह सवालों के जवाब-भर पाने की कवायद नहीं करतीं बल्कि ऐसे सवाल भी पूछती हैं जिनके जवाब नहीं मिल सकते और जो नितांत निजी सवाल हैं। वे कहती हैं कि वे इस इतिहास को उलटते-पलटते हुए निरपेक्ष नहीं हैं और न हो सकती हैं। आखिर वे इस इतिहास की पैदाइश हैं, जिसकी नायिका सुजरिया है, जो अपनी बेटियों को ‘फिल्म-स्टार’ की तरह लगती थी। इसी इतिहास के धुंधलके में बहादुर अपनी उत्तर-औपनिवेशिक सांस्कृतिक पहचान को रेखांकित करने की कोशिश करती है, जो नव-उपनिवेशवाद और आजाद गिरमिटिया समुदायों की सुजरियों और गायत्राओं के वर्त्तमान से भी बनती है। शनिवार दिल्ली के मे डे कैफे में गायत्रा बहादुर इस किताब पर बातचीत करेंगीं। मेरा अनुरोध है कि यह किताब पढ़ी जाए और गायत्रा को सुना जाए। यह भी सोचा जाए हिंदी और भोजपुरी के नाम पर गिरमिटियों के यहां साल-दर-साल जाकर भोज उड़ाने जाने वाले हमारे लिखने-पढ़ने वाले कभी उस सूनेपन को क्यों नहीं टटोलते, जो अरकाटियों के फरेब से बिदेसिया हुए जहाजियों की अनुपस्थिति से बना है! यह भी सोचा जाए कि क्या हम ऐसे निष्ठुर समाज हैं कि अपनों को सदा के लिए खो देना भी हमें नहीं कचोटता!