उद्घाटन समारोह को हरिशचंद्र श्रीवास्तव, जलाल सिद्दीकी, सूर्यकांत पांडेय, सैय्यद निजाम अशरफ, सौमित्र मिश्र, इरम सिद्दीकी, मास्टर अहमद अली आदि वक्ताओं ने भी संबोधित किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता शिल्पी चौधरी ने की, संचालन वरिष्ठ रंगकर्मी सुनील दत्ता ने किया। पूरे कार्यक्रम की खास बात यह रही कि इसी दौरान आजादी के बाद पहली बार शहीद-ए-वतन अशफाक उल्ला खां की डायरी को आम आदमी के बीच प्रदर्शित किया गया। प्रदर्शनी में पहुंचे लोगों ने उनके पन्नों को पढ़कर जाना कि हमारे अमर शहीद समाज की बुराइयों और गुलामी की जंजीरों से निपटने के लिए किस तरह कटिबद्ध थे। कैसे वे अपने जान की परवाह तक नहीं करते थे। प्रदर्शनी में शहीदों से जुड़े दुर्लभ दस्तावेजों को नयी पीढ़ी के बीच ले जाने के प्रयास की काफी सराहना की गयी।
दरअसल 19 दिसंबर 2007 को शहीद-ए-वतन अशफाक उल्ला खां का अपमान करने की साजिश के तहत शहीदी गेट के आगे चौधरी चरण सिंह गेट का निर्माण करा दिया गया था। शहीद-ए-वतन के शहादत-दिवस और 1857 की 150वीं वर्षगांठ पर जिस जगह शहीद अशफाकउल्ला खां का स्मारक होना चाहिए था, वहां पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह गेट बना दिया गया, वह भी महज इसलिए कि चौधरी चरण सिंह के बेटे चौधरी अजित सिंह की पार्टी के तत्कालीन विधानपरिषद सदस्य व मंत्री मुन्ना सिंह अपने राजनीतिक हित साधकर चौधरी अजित सिंह को खुश करना चाहते थे।
उधर, ‘अवाम का सिनेमा’ आयोजन के तीसरे दिन भानु प्रताप वर्मा कालेज हनुमंत नगर, मसौधा के परिसर मे प्रतिरोध की संस्कृति ‘अवाम के सिनेमा’ का समापन के मौके पर प्रधानाचार्य निर्मल कुमार वर्मा ने अपने बयान में कहा कि गांव-देहात में सिनेमा की ऐसी संस्कृति की लगातार पहल होनी चाहिए, जिससे कस्बाई इलाकों की नयी पीढ़ी भी देश-दुनिया से वाकिफ हो।
फिल्म प्रभाग की प्रस्तुति दस्तावेजी फिल्म ‘बेगम अख्तर’ के प्रदर्शन के बाद सिनेमा एक्टिविस्ट शाह आलम ने कहा कि मलिका-ए-गजल बेगम अख्तर अवध में अजनबी बन गयी हैं। मसौधा से चंद कदम दूर भदरसा में जन्मी बेगम को दुनियाभर में गजल की रूह कहा जाता है। रेशमी, उनींदी, जलतरंग सी कोमल और गहरी आवाज की मलिका अख्तरी बाई फैजाबादी उर्फ बेगम अख्तर गजल, ठुमरी और दादरा गायन में देश की सबसे बुलंद आवाजों में एक रही हैं। महज पंद्रह साल की उम्र में ही उन्होंने अपने संगीत कार्यक्रमों से देशव्यापी शोहरत पायी।
शाह आलम ने बताया कि उनकी कला के सम्मान में भारत सरकार ने 1968 में उन्हें पद्मश्री और 1975 में पद्मभूषण से नवाजा। आज इस महान शख्सियत और उसकी कला को संजोने के बजाय अपने ही दयार में उन्हें भुला दिया गया। उनकी याद में स्मारक जैसा भी कुछ नहीं और न ही कोई संगीत कॉलेज।
इस दौरान एक बच्चे की मनोदशा और सामाजिक दायित्वों पर सवाल करती फिल्म “कैद” का प्रदर्शन किया गया। हिंदी में बनी यह फिल्म समाज में फैले अंधविश्वास और तंत्र-मंत्र के खिलाफ संदेश देती है। फिल्म प्रदर्शन के बाद रंगकर्मी सुनील दत्ता ने बताया कि “कैद” फिल्म की कहानी प्रसिद्ध लेखक ज्ञान प्रकाश विवेक से उधार ली गयी है। कैद की कहानी संजू नामके एक लड़के पर केंद्रित है, जो अंधेरे और अकेलेपन का ऐसा आदी हो जाता है कि किसी को देखते ही चीखने-चिल्लाने लगता है।
फेस्टिवल के दौरान प्रसिद्ध फिल्म निर्माता-निर्देशक ख्वाजा अहमद अब्बास के जन्मशताब्दी वर्ष में उनकी विश्वविख्यात ‘धरती के लाल’ फिल्म के कुछ अंश दिखाये गये। इस दौरान प्रसिद्ध फिल्म मेकर मणि कौल की फिल्म ‘सतह से उठता आदमी’ के अंश दिखाकर विद्रोही जनवादी कवि मुक्तिबोध को भी याद किया गया।