Thursday, August 29, 2013

मीडिया संस्थानों में तमाम अस्मिताओं का प्रतिनिधित्व हो!

पत्रकार विनय तरुण की याद में भोपाल में आयोजन
♦ पशुपति शर्मा
म आंखें और उन आंखों से ढलकतीं विनय की यादें। भोपाल के गांधी भवन के मोहनिया बाल गृह में सुबह एक-एक कर साथियों का आना शुरू हो गया। विनय की याद में आयोजित कार्यक्रम को लेकर बने पोस्टर और बैनर मंच पर एक-एक कर टांके गये। इसी दौरान दो टेबल पलट कर उस पर एक-एक चादर डाली गयी। अखलाक ने जो दो पोस्टरनुमा तस्वीरें मुजफ्फरपुर से बनवाकर लायी थीं, उसे दो कोने पर जैसे ही लगाया गया, मंच तैयार हो गया… जहां विनय की यादें एक-एक कर बिखरने लगीं।
पहला अनौपचारिक सत्र विनय स्मरण का रहा। राजू नीरा ने चंद लफ्जों में विनय को याद किया और जैसे ही पुष्पांजलि के लिए साथियों को न्यौता दिया गया, कई आंखें डबडबा गयीं। राजू नीरा ने इस अनौपचारिक सत्र की शुरुआत इस प्रस्ताव के साथ की कि विनय की याद के इस सिलसिले को अब किस दायरे में आगे बढ़ाया जाए। माखनलाल तक ही इसे सीमित रखा जाए या इसमें बाहर के लोगों की ज्यादा से ज्यादा भागीदारी सुनिश्चित की जाए। इसी सिलसिले में राजू ने माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय के एक और सीनियर साथी वेदव्रत गिरि के असामयिक निधन पर शोक जाहिर किया। राजू ने जरूरतमंद और संकटग्रस्त साथियों के लिए एक को-ऑपरेटिव जैसी व्यवस्था विकसित करने की बात भी कही।
मुजफ्फरपुर दैनिक जागरण से जुड़े अखलाक अहमद ने कार्यक्रम में स्थानीय साथियों की कम भागीदारी पर चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि पिछले चार साल से चल रहे इस कार्यक्रम को जारी रखा जाना चाहिए और एक नेशनल नेटवर्क विकसित किया जाना चाहिए। विनय के बहाने अलग-अलग विषयों पर पुस्तिका प्रकाशन पर भी उन्होंने जोर दिया।
बीबीसी से जुड़ीं शेफाली चतुर्वेदी ने लगे हाथ अगला आयोजन दिल्ली में करने का प्रस्ताव रखा, जिस पर करतल ध्वनि से सभी ने हामी भर दी। एक्शन एड के साथ काम कर रहे उमेश चतुर्वेदी ने भी दिल्ली में कार्यक्रम की जिम्मेदारी लेने की तत्परता दिखायी और कार्यक्रम स्थल के तौर पर गांधी शांति प्रतिष्ठान का नाम सुझाया। मुजफ्फरपुर से आये साथी अमरेंद्र तिवारी ने आयोजन का समय एक दिन से बढ़ाकर दो दिन करने की इच्छा जाहिर की। इसके साथ ही उन्होंने बीच-बीच में वर्कशॉप किये जाने की जरूरत भी रेखांकित की।
एनडीटीवी, मुंबई में कार्यरत साथी अनुराग द्वारी के चंद बोलों ने विचार में डूबते-उतराते लोगों को फिर भावुक कर दिया। अनुराग ने जब ये सवाल किया कि फूलों से भी इतनी तकलीफ हो सकती है… तो इसका जवाब आंखें दे रही थीं। भोपाल के साथी अरुण सूर्यवंशी ने पिछली बार के कार्यक्रम में न शामिल हो पाने का अफसोस जाहिर किया और कहा कि ‘टू बी कनेक्टेड’ की स्थिति बनी रहनी चाहिए।
नई दुनिया, इंदौर में कार्यरत सचिन श्रीवास्तव ने विनय के नाम पर किसी फोरम के गठन को लेकर आपत्तियां जाहिर कीं। उन्होंने कहा कि व्यक्ति आधारित संस्थाएं कब तक और कितनी दूर तक चल पाती हैं, इसका इतिहास अच्छा नहीं रहा है। वहीं दैनिक जागरण, भोपाल के खेल प्रभारी शशि शेखर ने इन सबसे से परे विनय के सरल-सहज स्वभाव को जिंदा रखने को ही आयोजन की सार्थकता बताया। सहारा न्यूज चैनल के एंकर संदीप ने फेसबुक पर एक पेज बनाकर साथियों को जोड़े रखने की बात कही और उन्होंने ये जिम्मा खुद अपने कंधों पर ले लिया। पशुपति शर्मा ने विनय के नाम पर हो रहे आयोजनों को मौजूदा स्वरूप में ही जारी रखने की इच्छा जाहिर की। उन्होंने कहा कि अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सचिव जैसी व्यवस्थाएं कई बार काम आगे बढ़ाने की बजाय अड़चनें पैदा करने लगती हैं। दस्तक के रोल मॉडल की तरह ही विनय स्मरण कार्यक्रम भी यूं ही जारी रखा जाए तो बेहतर होगा।
बिहार में प्रभात खबर के साथ लंबे वक्त से काम रहे अखिलेश्वर पांडेय ने एक ईमानदार आदमी की सतत मौजूदगी को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आज भी प्रभात खबर के साथी विनय को याद कर भावुक हो उठते हैं। उनसे काम में जुटे रहने और जिम्मेदारियां ओढ़ लेने की प्रेरणा लेते हैं।
न्यू सोशलिस्ट इनीशिएटिव, दिल्ली के साथी सुभाष गाताडे ने विनय की याद में इस तरह के कार्यक्रम को एक जरूरी पहल बताया। इसके साथ ही औपचारिक संगठन से बचने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि विनय के लेखों के संकलन के बारे में गंभीरता से सोचा जाना चाहिए।
माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग के प्रोफेसर पुष्पेंद्र पाल सिंह ने एक रोचक प्रसंग से अपनी बात शुरू की। विनय के निधन के बाद दोस्तों ने जिस शिद्दत से उसे याद किया, उसने कई लोगों को प्रभावित किया। उन्होंने बताया कि कैसे अभिलाष खांडेलकर ने उनसे फोन कर पूछा कि आखिर ये विनय कौन है, क्या बात थी इस युवा पत्रकार में कि उसे साथी इतने भावुक होकर याद कर रहे हैं। पुष्पेंद्र पाल सिंह ने कहा कि इस आयोजन की सबसे बड़ी बात ये है कि ये ईमानदारी, अच्छाई और सादगी में लोगों के विश्वास को पुख्ता करता है। ये आस्था बलवती होती है कि समाज में अच्छे लोग हैं, तो उनका सम्मान भी है। पहला सत्र साथियों को आगे बढ़ते रहने के पीपी सिंह के इसी संदेश के साथ संपन्न हो गया।
दूसरा सत्र, करीब ढाई बजे “ये फैसले का वक्त है, आ कदम मिला” के बोल के साथ शुरू हुआ। मुजफ्फरपुर के सांस्कृतिक संगठन गांव ज्वार के साथी सुनील और अखलाक ने ये गीत गया। इसके बाद शेफाली चतुर्वेदी ने सचिन श्रीवास्तव की कविता ‘अफसोस विनय अफसोस’ का वाचन किया। पशुपति शर्मा ने आरंभिक उद्बोधन में मोहनिया बाल गृह में अपने मोहनिया को याद करने की बात कही। विनय तरुण का स्वभाव ही ऐसा है कि वो कभी मोहनिया बन कर सामने आ जाता है, तो कभी आनंद के राजेश खन्ना की तरह लोगों को हंसता-हंसाता आंखों के सामने तैरने लगता है। विनय की याद में ये कार्यक्रम उसकी सादगी, उसकी सहजता, उसकी ईमानदारी, उसकी दृढ़ता का उत्सव है।
अब बारी सुभाष गाताडे की थी, जिन्हें अस्मिताओं का संघर्ष और पत्रकारिता पर अपनी बात रखनी थी। गाताडे ने विनय की याद में आयोजित इस व्याख्यान पर साथियों को साधुवाद दिया। उन्होंने कहा – ये बड़ी बात है कि साथियों ने विनय के न होने के गम को सयापे में नहीं बदला बल्कि संकल्पशक्ति में तब्दील किया है। ऐसे दौर में जब पत्रकारिता कमीशनखोरी में तब्दील हो गयी हो, अपनी भूमिका तलाशने की ऐसी कोशिशें काफी ताकत देने वाली है।
Vinay Tarun Memorial Lecture
उन्होंने कहा कि अस्मिताओं के संघर्ष का सवाल आज ज्यादा मौजूं है। 80-90 के दशक में दलित और स्त्री अस्मिता का उभार हुआ। हिंदी पट्टी के सबसे बड़े सूबे में मायावती अस्मिताओं के इस संघर्ष के बाद सत्ता पर काबिज हुईं। 90 के दशक में हिंदू अस्मिता का उभार हुआ। और अब आज के दौर में जब हम गुजरात दंगे बनाम विकास की बहस में उलझे हैं, अस्मिताओं से जुड़े ऐसे कई सवाल बार-बार सिर उठाते हैं।
पत्रकारिता के ढांचे का जिक्र करते हुए सुभाष गाताडे ने कहा कि यहां अभी भी पुरुष वर्चस्व कायम है। पत्रकारिता संस्थानों में तमाम अस्मिताओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। इस सिलसिले में उन्होंने 2006 में हुए एक सर्वे का जिक्र किया। 35 चैनलों के 300 सीनियर मीडियाकर्मियों का विश्लेषण प्रतिनिधित्व के लिहाज से बेहद गैर-लोकतांत्रिक नजर आया। 71 फीसदी पदों पर हिंदू उच्च जाति का कब्जा था।
हस्तक्षेप के तौर पर देविंदर कौर उप्पल ने भी कमजोर और सशक्त की लड़ाई में हमेशा कमजोर के साथ खड़े रहने की प्रतिबद्धता पर जोर दिया। बिहार से आये पत्रकार साथी श्याम लाल ने नक्सली लिंक के शक में प्रताड़ित किये जाने की ‘व्यथाकथा’ शेयर की।
अध्यक्षीय उद्बोधन में वरिष्ठ पत्रकार लज्जा शंकर हरदेनिया ने मीडिया घरानों की मोनोपॉली खत्म करने को एक बड़ी चुनौती बताया। उन्होंने इस बात पर अफसोस जाहिर किया कि पत्रकारों को सबसे कम फ्रीडम न्यूज रूम में हासिल होता है। पत्रकार संगठनों के अभाव में हक की लड़ाई जारी रखना भले ही मुश्किल हो गया हो लेकिन हरदेनियाजी ने हर पत्रकार को वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट को समझने और उसे पढ़ने की नसीहत दी। कई मायने में निजी पूंजी से बेहतर सरकारी पूंजी है। उन्होंने स्मरण से किसी पुराने उद्धरण का जिक्र किया कि यदि पत्रकार अपने आर्थिक हालात को लेकर चिंतित रहने लगे तो फिर देश का भविष्य अंधकारमय होना तय है।
अहा जिंदगी के संपादक आलोक श्रीवास्तव की व्यवस्तताओं की वजह से व्याख्यान का एक और सत्र तो मुमकिन नहीं हो पाया लेकिन पहले से तय कार्यक्रम के मुताबिक शाम कविताओं के नाम रही। आलोक श्रीवास्तव, कुमार अंबुज और रवींद्र स्वप्निल प्रजापति ने अपनी कुछ चुनींदा कविताओं का पाठ किया। इसके साथ ही राजू नीरा, सचिन श्रीवास्तव ने कविताएं पढ़ीं और नदीम खान ने कुछ शेर गुनगुनाये।
शाम ढलते-ढलते विनय की याद में गुजरे एक दिन पर भी धुंधलका छाने लगा… साथी अपने घर को लौट चले।

Tuesday, August 27, 2013

राजनीति में ईमानदारी देखनी हो तो उनकी मृत्‍यु देखिए!


10जुलाई 2013 भारतवर्ष के लिए कोई दुखदायी या शोकपूर्ण दिवस नहीं था, आखिर होता भी क्यों? भारत के स्वर्णिम राजनीतिक इतिहास के किसी महानायक का निधन नहीं हुआ था, निधन हुआ था उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती के पूर्व विधायक भगौती प्रसाद का, जिनकी मृत्यु सिर्फ इसलिए हो गयी क्‍योंकि वो अपने इलाज के लिए तीन हजार रुपये नहीं जुटा पाये। एक ऐसे विधायक का, जो चुनाव हारने के बाद चाय बेचकर अपने परिवार का भरण पोषण करते थे। एक ऐसे नेता का, जिसने कभी कोई एनजीओ नहीं खोला, कभी सरकारी नौकरी नहीं की और न ही उसे छोड़कर कोई आंदोलन छेड़ा। कभी किसी मंच पर खड़े होकर ईमानदारी की गाथा नहीं गायी, बल्कि एक ऐसे राजनेता का जो सिर्फ अपने नैतिकता और अभिज्ञानता के आधार पर एक मामूली व्यक्ति की तरह अपना जीवन व्यतीत करता रहा। उसी मामूली व्यक्ति की तरह जो हमारे आज की परिकल्पना में समाज और राजनीति को भ्रष्‍टाचार मुक्त कराएगा।
भगौती बाबू की मृत्यु दो मापदंडों पर हमारे समाज के ऊपर प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है। पहला यह कि क्या हमारे लिए ईमानदारी का प्रतिरूप वही है, जो मीडिया के द्वारा प्रसारित मंचों हम पर देखते हैं। और दूसरा यह कि क्या हम राजनीतिक प्रतिबद्धता को सिर्फ किताबी गलियारों में देखते हैं या फिर ऐसे संस्मरणों में जिसकी कवायद सिर्फ ख्यालों में की जा सकती है और जैसे ही उसे हकीकत होता हुआ देखते है, तो हम उससे मुंह फेर लेते हैं।
श्रावस्ती की यह दुखदायी घटना एक राजनीतिक खोखलेपन से जूझ रहे समाज को झकझोर देने वाली थी। एक ऐसी राजनीतिक प्रेरणा देने वाली घटना, जिसकी परिकल्पना शायद अन्ना या अरविंद भी न कर पाएं। शायद एक ऐसी विचारधारा को जन्म देने वाली घटना, जिससे आने वाले समय में हर छुटभैय्ये और वैभवशाली नेता को रूबरू होना पड़ता। मीडिया के कुछ संवेदनशील नुमाइंदों ने भरसक प्रयास भी किया मगर असलियत में ऐसा कुछ नहीं हुआ। लगा कि ऐसा सोचना भी अपने आप में एक बेईमानी थी। आखिरकार जब ईमानदारी हमारी खुद की महत्वकांक्षा और नैतिकता का राग अलापते नेताओं और उनके आंदोलनों के भविष्य और प्रबलता से पारिभाषित होती है तो हम ईमानदारी को किसी दिवंगत ईमानदार राजनेता के व्यक्तित्व से कैसे पारिभाषित करें।
भगौती बाबू के देहांत का घटना-कर्म समाज के मूक दर्शक बने रहने की उसी प्रवृत्ति को उजागर करता है, जिसके साये में कुछ राजनीतिक उद्यमी संपूर्ण क्रांति लाने की पराकाष्‍ठा करते हैं और फिर उसी शासन प्रणाली का पात्र बनकर विलीन हो जाते हैं। इस क्रांतिकारी खेल से सबका भला हो जाता है। अखबारों और टीवी चैनलों को सुर्खियां मिल जाती, मृत्‍युशय्या पर पड़े पतित राजनीतिक दलों को चुस्त प्रतिद्वंद्वी मिल जाते हैं, और हमारे निष्ठुर समाज को बरगलाने वाले कुछ और नेता।
टीवी, अखबार और इंटरनेट के माध्यम से प्रसारित यह खबर शायद 15 सेकंड के अफसोस पैदा करने वाली व्यथा से ज्यादा नहीं थी। एक पूर्व विधायक की मृत्यु के बाद उसके परिवार को उसके अंतिम संस्कार करने के लिए पड़ोसियों से पैसे उधार लेने पड़े। बहुत बुरा हुआ, मगर आखिर हम कर भी क्या सकते हैं। विधायकजी जिंदा रहते, तो शायद उनका पीठ थपथपा आते, फोन करके कह देते कि सुनकर अच्छा लगा आपके बारे में, ऐसे ही ईमानदारी से चाय बेचते रहिए। मगर अब उनका देहांत हो गया है, उनकी ईमानदारी अतीत हो गयी है। चलिए अब एक नये ईमानदार नेता को खोजने के लिए आंदोलन करते हैं, फेसबुक पर बयानबाजी करते हैं, और उस नये ईमानदार नेता के चुनाव लड़ने के लिए चंदा इकट्टा करते हैं। चलिए अब टीवी पर अगला चैनल बदलते हैं, अखबार का दूसरा पन्ना पलटते हैं, नयी वेबसाइट खोलते हैं।