10जुलाई 2013 भारतवर्ष के लिए कोई दुखदायी या शोकपूर्ण दिवस नहीं था, आखिर होता भी क्यों? भारत के स्वर्णिम राजनीतिक इतिहास के किसी महानायक का निधन नहीं हुआ था, निधन हुआ था उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती के पूर्व विधायक भगौती प्रसाद का, जिनकी मृत्यु सिर्फ इसलिए हो गयी क्योंकि वो अपने इलाज के लिए तीन हजार रुपये नहीं जुटा पाये। एक ऐसे विधायक का, जो चुनाव हारने के बाद चाय बेचकर अपने परिवार का भरण पोषण करते थे। एक ऐसे नेता का, जिसने कभी कोई एनजीओ नहीं खोला, कभी सरकारी नौकरी नहीं की और न ही उसे छोड़कर कोई आंदोलन छेड़ा। कभी किसी मंच पर खड़े होकर ईमानदारी की गाथा नहीं गायी, बल्कि एक ऐसे राजनेता का जो सिर्फ अपने नैतिकता और अभिज्ञानता के आधार पर एक मामूली व्यक्ति की तरह अपना जीवन व्यतीत करता रहा। उसी मामूली व्यक्ति की तरह जो हमारे आज की परिकल्पना में समाज और राजनीति को भ्रष्टाचार मुक्त कराएगा।
भगौती बाबू की मृत्यु दो मापदंडों पर हमारे समाज के ऊपर प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है। पहला यह कि क्या हमारे लिए ईमानदारी का प्रतिरूप वही है, जो मीडिया के द्वारा प्रसारित मंचों हम पर देखते हैं। और दूसरा यह कि क्या हम राजनीतिक प्रतिबद्धता को सिर्फ किताबी गलियारों में देखते हैं या फिर ऐसे संस्मरणों में जिसकी कवायद सिर्फ ख्यालों में की जा सकती है और जैसे ही उसे हकीकत होता हुआ देखते है, तो हम उससे मुंह फेर लेते हैं।
श्रावस्ती की यह दुखदायी घटना एक राजनीतिक खोखलेपन से जूझ रहे समाज को झकझोर देने वाली थी। एक ऐसी राजनीतिक प्रेरणा देने वाली घटना, जिसकी परिकल्पना शायद अन्ना या अरविंद भी न कर पाएं। शायद एक ऐसी विचारधारा को जन्म देने वाली घटना, जिससे आने वाले समय में हर छुटभैय्ये और वैभवशाली नेता को रूबरू होना पड़ता। मीडिया के कुछ संवेदनशील नुमाइंदों ने भरसक प्रयास भी किया मगर असलियत में ऐसा कुछ नहीं हुआ। लगा कि ऐसा सोचना भी अपने आप में एक बेईमानी थी। आखिरकार जब ईमानदारी हमारी खुद की महत्वकांक्षा और नैतिकता का राग अलापते नेताओं और उनके आंदोलनों के भविष्य और प्रबलता से पारिभाषित होती है तो हम ईमानदारी को किसी दिवंगत ईमानदार राजनेता के व्यक्तित्व से कैसे पारिभाषित करें।
भगौती बाबू के देहांत का घटना-कर्म समाज के मूक दर्शक बने रहने की उसी प्रवृत्ति को उजागर करता है, जिसके साये में कुछ राजनीतिक उद्यमी संपूर्ण क्रांति लाने की पराकाष्ठा करते हैं और फिर उसी शासन प्रणाली का पात्र बनकर विलीन हो जाते हैं। इस क्रांतिकारी खेल से सबका भला हो जाता है। अखबारों और टीवी चैनलों को सुर्खियां मिल जाती, मृत्युशय्या पर पड़े पतित राजनीतिक दलों को चुस्त प्रतिद्वंद्वी मिल जाते हैं, और हमारे निष्ठुर समाज को बरगलाने वाले कुछ और नेता।
टीवी, अखबार और इंटरनेट के माध्यम से प्रसारित यह खबर शायद 15 सेकंड के अफसोस पैदा करने वाली व्यथा से ज्यादा नहीं थी। एक पूर्व विधायक की मृत्यु के बाद उसके परिवार को उसके अंतिम संस्कार करने के लिए पड़ोसियों से पैसे उधार लेने पड़े। बहुत बुरा हुआ, मगर आखिर हम कर भी क्या सकते हैं। विधायकजी जिंदा रहते, तो शायद उनका पीठ थपथपा आते, फोन करके कह देते कि सुनकर अच्छा लगा आपके बारे में, ऐसे ही ईमानदारी से चाय बेचते रहिए। मगर अब उनका देहांत हो गया है, उनकी ईमानदारी अतीत हो गयी है। चलिए अब एक नये ईमानदार नेता को खोजने के लिए आंदोलन करते हैं, फेसबुक पर बयानबाजी करते हैं, और उस नये ईमानदार नेता के चुनाव लड़ने के लिए चंदा इकट्टा करते हैं। चलिए अब टीवी पर अगला चैनल बदलते हैं, अखबार का दूसरा पन्ना पलटते हैं, नयी वेबसाइट खोलते हैं।
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