Tuesday, April 23, 2013

हिन्दू मंदिर में मुस्लिम महिला की पूजा

अहमदाबाद। अहमदाबाद से चालीस किलोमीटर की दूरी पर 'झूलासन' नाम का एक गाँव है।  ये गाँव अंतिरक्ष यात्री सुनीता विलियम्स के पिताजी का पैतृक गाँव है। इस पहचान के अलावा इस गाँव की एक और खासियत है। यहाँ पर एक मंदिर है और शायद यह एक अकेला हिन्दू मंदिर है, जिसमें मुस्लिम महिला की पूजा की जाती है।

कहा जाता है कि 250 साल पहले 'डोला' नाम की एक मुस्लिम महिला ने उपद्रवियों से अपने गाँव को बचाने के लिए उनसे बहुत ही वीरतापूर्वक लड़ाई की और अपने गाँव की रक्षा करते हुए अपनी जान दे दी।  उनका शरीर एक  फू ल में परिवर्तित हो गया और उस फू ल के ऊपर ही इस मंदिर का निर्माण किया गया।

अभी हाल में ही इस गाँव के अमीर निवासियों ने इस मंदिर को और भी भव्य बनाने के लिए चार करोड़ रुपये की राशि इकट्ठा की है। झूलासन केलवानी मंडल के अध्यक्ष रजनीश वाघेला बताते हैं कि इस मंदिर में कोई मूर्ति या कोई तस्वीर नहीं है। एक पत्थर का एक यंत्र (जो ताबीज़ हो सकता है) है और उसके ऊपर साड़ी डालकर पूजा की जाती है। इस मंदिर को 'डॉलर माता' का मंदिर भी कहा जाता है क्योंकि 7000 की जनसंख्या वाले इस गाँव के 1500 निवासी अब अमेरिका के नागरिक हैं। सुनीता विलियम्स जब अन्तरिक्ष यात्रा पर गयीं तो उनकी सुरक्षित वापसी के लिए इस मंदिर में एक अखंड ज्योति जलाई गयी जो चार महीने तक लगातार जलती रही। धर्म के नाम पर जितनी राजनीति होती है और जितनी बहसें, जितने मनमुटाव, ऐसे में एक गाँव में सीधे-सच्चे मन वाले लोगों ने बिना किसी का धर्म देखे उसके कर्मों को सराहा है। उसकी वीरता के लिए उसके बलिदान को याद करते हुए उसकी याद में एक मंदिर ही बना लिया है और अपनी कृतज्ञता उसकी पूजा करके व्यक्त करते हैं।

गाँव से निकलते ही बदल जाते हैं जाति और पेशा!



गाँव एक तेज़ी से बदलती हुई मानवीय बसावट है। शहरों में बैठकर लोग अक्सर गाँव को किसी कालखंड में फं सी हुई नाव की तरह देखते हैं। जिसके नीचे से पानी तो सरकता जा रहा है, मगर नाव वहीं की वहीं है। ऐसा नहीं है। हर स्तर पर गाँव बदल रहे हैं। ये गतिशीलता शहरों की तरह है। देशभर में लाखों लोग हर साल अपना गाँव छोड़ दे रहे हैं। गाँव से बाहर जाते ही उनका रोजग़ार जातिगत या पारंपरिक पेशे की ज़द से बाहर निकल कर बदल जाता है। आज किसी गाँव में वहां रहकर और वहां से बाहर गए लोगों के काम की सूची बनाई जाए तो कमाल की विविधता और अदल-बदल की जानकारी मिलेगी। जिससे एक निष्कर्ष यह भी निकलेगा कि भेदभाव और पेशे के आधार पर जातिगत पैमाने में काफ ी परिवर्तन हुआ है। इसका मतलब यह कत्तई नहीं कि जात-पात या छूआछूत खत्म हो गया। लेकिन ये दोनों तत्व ही गाँव की एकमात्र सच्चाई नहीं हैं।

 मैं जहां रहता हूं, वहां बन रही बड़ी-बड़ी इमारतों में काम करने वाले मज़दूरों को अक्सर देखता रहता हूं। ये सभी अलग-अलग गाँवों या राज्यों से आए लोग हैं। इन सबके बीच पहली बार काम को लेकर समानता बन रही है। जिसका संबंध इनके जातिगत पेशे से बिल्कुल नहीं है। इंदिरापुरम की एक इमारत से सटे कई छोटे-छोटे अस्थायी घर बने हैं जिनमें मज़दूर या उनके परिवार रहते हैं। ये अस्थायी घर बसते हैं और इमारत बनने के बाद उजड़ जाते हैं। उसके करीब से गुजऱते वक्त देखता हूं कि सब एक ही प्रकार की स्टील की थाली में खाना खा रहे होते हैं। चावल और उसके ऊपर आलू की रसदार सब्ज़ी। गाँव में खान-पान का जातिगत अंतर यहां समाप्त हो चुका है। सबका खाना एक जैसा है। एक साथ खाना है। वे दिन गए जब शादी ब्याह में जाति के टोलों के हिसाब से खाने की पंक्ति बनती थी। ये सारे अनुभव हमारी पहचान को नए सिरे से गढ़ रहे हैं या नहीं, इसका अध्ययन होना चाहिए। हो भी रहे होंगे। बड़ी संख्या में लोग इमारती मज़दूर बन रहे हैं। सवर्ण जाति के लोग भी इनमें शामिल हैं। उसी तरह शहरों में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी ने भी जातिगत आधार में फेरबदल का मौका दिया है।

कई ऐसे काम हैं जो गाँव में जाति के हिसाब से करते थे शहर में आप उसे मजदूरी के हिसाब से करते हैं। और यह बदलाव सिर्फ  शहरों में नहीं हो रहा है। गाँवों में भी हो रहा है। पेंग्विन प्रकाशन से एक दिलचस्प किताब आई है। दर-दर गंगे। हर-हर गंगे का मंत्र जप कर हम गंगा के साथ क्या कर रहे हैं इसकी कहानी है। अभय मिश्र और पंकज रामेंदु नाम के दो युवकों ने गंगोत्री से गंगासागर तक की यात्रा कर गंगा की व्यथा कथा लिखी है। इस किताब में उत्तर प्रदेश के गढ़मुक्तेश्वर का जिक्र है। गंगा पर लिखी यह एक बेहतरीन किताब है। अभय और पंकज लिख रहे हैं कि 'गंगा में जैसे-जैसे पानी कम होता गया वैसे-वैसे लोगों में क्षुद्र मानसिकता पनपती गई। जिन पुरोहितों को नाव में बैठा कर मल्लाह यहां आए हुए लोगों को मोक्ष दिलवाने में मदद किया करते थे बीते दस सालों में उन्हीं पुरोहितों को पीछे छोड़ मलकू सहित कई दूसरी जातियों ने अपनी दादागिरी से यहां पंडागीरी शुरू कर दी है। कुछ पेट की आग से पुरोहित बन गए तो कुछ को लालच ने झुलसाया।'

मैं अभय और पंकज की इस बात से सहमत नहीं हूं कि जो भी हुआ वो क्षुद्र मानसिकता के तहत हुआ। समाज में अल-अलग दौर में इसी तरह से पेशे बदलते रहे हैं और पेशे के साथ जातियां बदलती रही हैं। जऱा कल्पना कीजिए पुरोहिती का काम करते करते मल्लाहों की चार पांच पीढ़ी निकल जाएंगी तो वे खुद को ब्राह्मण या केवट ब्राह्मण कहेंगे या नहीं। क्या हमारी जातियों में कई इसी तरह से पहले नहीं गढ़ी गई हैं। एक बदलाव यह भी देखिए कि हम जिस पर आश्रित रहते हैं उसके कमज़ोर पड़ते ही पेशे किस तरह से बदल जाते हैं। गंगा सूख गई तो गंगा पर आश्रितों के पेशे बदल गए। गाँव में रोजग़ार के अवसर कम हुए तो गाँववालों ने शहर में जाकर जाति के हिसाब से काम नहीं ढूंढ़ा। कई लोग कहते हैं कि शादी का न्योता देने के लिए नाऊ नहीं मिल रहे हैं। लेकिन यह भी तो पता कीजिए कि वे नाई या नाऊ इनदिनों कहां हैं और क्या कर रहे हैं। क्या पता इनमें से कोई दिल्ली या मुंबई जैसे शहरों में कर्मकांड में पारंगत होकर पुरोहिती का काम कर रहा हो। या फि र ठेले पर आम और अंगूर लादे बेच रहा हो।

अब सवाल यह है कि क्या जाति भी बदल रही है। अलग-अलग संदर्भों में यह भी हो रहा है। मल्लाह का पुरोहित होना सिर्फ  पेशे का अदल-बदल नहीं जातियों की भी अदला-बदली है। गाँवों में खेतिहर मज़दूरों में औरतों की बढ़ती संख्या अलग तरीके से पारंपरिक ढांचे को तोड़ रही है। औरतों का अपने घर के पास यह अनुभव जल्द ही उन्हें दुनिया के बाकी हिस्सों में ले जाने के लिए प्रेरित करेगा। जैसे बंगाल और झारखंड से बड़ी संख्या में औरतें दिल्ली, मुंबई बंगलुरू के घरों में काम करने के लिए निकल रही हैं। इन राज्यों और समाजों में श्रम में औरतों को पहले से एक बराबरी हासिल है। जैसे ही पलायन का यह दूसरा दौर उत्तर भारत के गाँवों से शुरू होगा ग्रामीण सामाजिक संबंध दूसरे तरीके से बदलेंगे। तकनीकी का आगमन होगा और खेती और किसानी करने वाले कोई और होंगे। इसलिए हमारे समय के इस दौर को इस चश्मे से न देखें कि कुछ नहीं हो रहा है। हमारे संबंध तेजी से बदल रहे हैं। गाँव उससे भी तेज़ गति से।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

ठेले पर क्लीनिक, चार मरीज और सिर्फ एक टेढ़ी सुई!


ठेले पर क्लीनिक, चार मरीज और सिर्फ एक टेढ़ी सुई!

शाहपुर (लखनऊ)। नीले रंग का फ्रॉक पहने एक बच्ची तेज बुखार की वजह से बेसुध पड़ी थी। डॉक्टर का इंतजार करते हुए बच्ची की 9 साल की बड़ी बहन ने उसके माथे पर सफेद रंग का गीला कपड़ा रखा हुआ था। कुछ ही देर में डॉक्टर साहब वहां आए और बुखार से तप रही बच्ची को इंजेक्शन लगा दिया।

यह नज़ारा किसी हॉस्पिटल का नहीं है। बच्ची भी किसी बिस्तर या स्ट्रेचर पर नहीं बल्कि एक लकड़ी की तिपहिया ठेलिया पर लेटी थी। जिसपर अपना सामान लादकर डॉक्टर साहब बाजार के दिन अपनी दुकान लगाने आते हैं।

लखनऊ के दक्षिण में महज 25 किमी की दूरी पर एक गॉँव है शाहपुर। जिसके चौराहे पर हर बृहस्पतिवार और रविवार की शाम को लगने वाली बाजार में सब्जी और कपड़ों के साथ ही, डॉक्टरों की भी मंडी लगती है।

बाजार के दिन यहां चार-पांच लोग अपनी छोटी-सी मेज पर सस्ती दवाईयों की कुछ बोतलें और पैकेटें सजा कर बैठते हैं और लोगों का इलाज करते हैं। अपने-आप को डॉक्टर कहने वाले इन लोगों में से कुछ तो अगल-बगल गॉँव के ही हैं। इन्होंने ना तो कोई डिग्री ली है और न ही ट्रेनिंग। फिर भी गॉँव वाले अपनी बीमारी लिए इन्हीं के पास आते हैं। कारण पूछने पर शाहपुर निवासी, 38 साल के पवन कुमार कहते हैं, च्च्सरकारी अस्पताल यहां से 10 किमी दूर है और वो भी वहां कोई मिलता नहीं। अब हमको बिटिया के बुखार की दवाई लेनी है। इनसे न लें तो कहां जाएं।ज्ज् पवन ने जिस अस्पताल का जिक्र किया, वो शाहपुर से 10 किमी की दूरी पर स्थित इटौंजा कस्बे में है।

दरअसल सरकारी मानकों के अनुसार दो प्राथमिक केन्द्रों के बीच की दूरी 10 किमी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। जिसे मानते हुए प्रशासन ने शाहपुर के 10 किमी के दायरे में आने वाले क्षेत्र, जैसे कुम्हरावां, महोना और गोधना में स्वास्थ्य केंद्र बनवाए हैं। पर संसाधनों की कमी के चलते ये अस्पताल ज्यादातर बंद ही रहते हैं।

राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य योजना (एनआरएचएम) की एक रिपोर्ट के मुताबिक यूपी में 5823 स्वास्थ्य उप-केन्द्रों और 700 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की कमी है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि प्रदेश के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों के लिए सोलह सौ से ज्यादा डॉक्टरों की कमी है। अस्पतालों में नर्सों और टेक्नीशियनों की बहाली करने की भी जरूरत है।

इस बारे में जब गॉँव कनेक्शन संवाददाता ने लखनऊ के सीएमओ डॉ. एसएनएस यादव से फोन पर बात करने की कोशिश की तो उन्होंने कहा, च्च्भाई अब ऐसे तो हम नहीं बता पाएंगे, आप हमें और डीएम को लेटर लिखकर दीजिए तब देखेंगे इस मामले में।ज्ज्

बाजार में बैठने वाले डॉक्टरों में से एक हैं श्रीराम। जिस गॉँव की बाजार में अपनी डॉक्टर की दुकान लगाते हैं, वहां के पूर्व प्रधान भी रह चुके हैं। इस नाते सब इन्हें दद्दू बुलाते हैं।

बाजार के कोने में बड़े से पेड़ के नीचे, सफेद रंग की प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठे श्रीराम को लोगों ने चारों तरफ से घेरा हुआ है। उनके आगे दवाईयों की मेज पर एक टेढ़ी सूई वाला इंजेक्शन रखा हुआ है जो पिछले आधे घंटे में चार लोगों की मर्ज का इलाज कर चुका है।

उसी भीड़ में से लाल साड़ी पहने हुई, फू लमती (29) नाम की महिला अपना हाथ दिखाते हुए श्रीराम से पूछती हैं, च्च्दद्दू मेरी उंगली दर्द करती है?ज्ज् फुट भर की दूरी से ही देखकर श्रीराम जोर से बोले, च्च्पांच इंजेक्शन लगेंगे, और कोई दवा नहीं है इसकी। बताओ?ज्ज् थोड़ा झिझकते हुए फू लमती फि र पूछती हैं, च्च्कौन सी बीमारी है यह?ज्ज् श्रीराम बोले, च्च्खून का दौडऩा कम है। इलाज नहीं हुआ तो कहो पहले हाथ में जकडऩ हो, फि र पूरे शरीर में।ज्ज्

श्रीराम की ही तरह बाजार में एक और डॉक्टर हैं प्रेम चन्द्र। इनके गले में आला है और आंखें ग्राहक तलाश रही हैं। तभी एक महिला अपने पति के साथ आती हैं। महिला की उम्र ज्यादा नहीं है, लेकिन कमजोरी और बीमारी की वजह से उसके गले से आवाज मुश्किल से ही निकल पा रही थी। इसीलिए बगल में बैठा महिला का पति बीमारी के बारे में बताता है। जांच-पड़ताल के बाद डॉक्टर साहब कहते हैं, च्च्इन्हें तो टॉयफायड है।ज्ज् फि र उन्हें बिना किसी नाम-नम्बर की एक पर्ची, दवाईयां लिखकर थमा दी जाती है। बदले में अच्छी-खासी फीस ऐंठ ली जाती है। कमोबेश यही हाल बाजार में बैठे बाकी के झोलाछाप डॉक्टरों की मेजों पर भी था।

अशिक्षा और स्वास्थ्य केन्द्र जैसी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में गॉँव वालों के पास इन फर्जी डॉक्टरों के पास जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता, जिसका ये लोग भरपूर फायदा उठाते हैं।

अपनी सफाई में श्रीराम कहते हैं, च्च्हम कोई हार्ड ऐन्टिबायोटिक नहीं रखते हैं। हमारे यहां मरीज सही भले ही न हो पर उसको रिएक्शन नहीं होता। और कोई सीरियस केस होता है तो उसको शहर रेफर कर देते हैं।ज्ज् डॉक्टरी की मान्यता के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं, च्च्साल तो याद नहीं पर वही कुछ 2008 या 2009 में स्वरोजगार योजना के अन्र्तगत, स्वास्थ्य कार्यकर्ता की टे्रनिंग ली थी।ज्ज्

जिन साहब को अपने ट्रेनिंग का साल तक नहीं याद उनके हाथ में मरीजों की पूरी जिंदगी है। अपनी पैरवी करते हुए आखिर में श्रीराम कहते हैं, च्च्सही कौन है आजकल यहां से लेकर बख्शी का तालाब तक सब हमारी तरह चोर ही मिलेंगे आपको।ज्ज्

Thursday, April 18, 2013

Ab Tere Bin Ji lenge Hum ~ Aashqui [ HQ ]

क्या हुआ जो एक दिल टूट गया अब तेरे बिन जी लेंगे हम ज़हर ज़िन्दगी का 
पि लेंगे हम !!

Monday, April 15, 2013

बराबरी की दुनिया परिवार के भीतर से बने तो बेहतर!


साल 2013 के साथ महिलाओं की तरक्की का अध्याय तकरीबन अभी शुरू होता महसूस हो रहा था, और इस महिला दिवस के अलग मायने सेट करके सभी ने इस दिन के लिए तैयारी शुरू भी कर दी थी। दिल्ली गैंग रेप घटना के बाद जो सड़कों पर हुजूम उमड़ा, उससे यह साफ लगने लगा था कि मानो यह समाज ऐसी खौफनाक घटना के दोबारा न होने का वादा कर रहा हो। लेकिन एक के बाद एक अखबारों की सुर्खियों ने मानो गलतफहमी दूर कर देने का काम किया। छोटी बच्ची से दुष्कर्म, पंजाब में पुलिसवालों द्वारा एक युवती की बेरहमी से पिटाई के न्यूज चैनलों पर लगातार चलते वीडियो इस बात की गवाही दे रहे हैं कि भले ही अब सड़कों पर महिलाओं के हक में आवाज बुलंद होना शुरू हो गयी है लेकिन पुरुषवादी सत्ता को उखाड़ फेंकना अब भी बहुत दूर की बात है। क्योंकि जब तक समाज की इस जड़ पर जोरदार हमला नहीं होगा, तब तक किसी भी तरह के परिवर्तन की कामना करना हवा में तीर चलाने के ही बराबर साबित होगा। याद रहे भले ही सुरक्षा या कानून व्यवस्था का मामला उठाकर सरकार और पुलिस पर आरोप लगा दिये जाएं लेकिन याद रहे वह महिला जो पुलिस वालों के पास छेड़छाड़ की शिकायत करने आयी थी, उसे पीटने वाले वर्दीधारी भी इसी समाज का हिस्सा हैं। और उनका पालन पोषण और यहां तक कि ‘नैतिक शिक्षा‘ की जिम्मेदारी भी इसी समाज की है। इसलिए खाली पुलिस प्रशासन पर आरोप लगाना ठीक नहीं क्योंकि वे इस समाज का हिस्सा हैं।
liberated womenबात की गंभीरता समझने के लिए यह भी काफी होना चाहिए कि देश में गिरते लिंगानुपात को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी चिंता जतायी है। जब भी महिलाओं की दुर्दशा का प्रश्न उठाया जाता है तो अव्वल तो बोरिंग टॉपिक पर कौन अपने कान देता है। और अगर बात शुरू हो ही जाए तो तरह तरह के तर्क दिये जाते हैं कि महिलाएं आगे बढ़ तो रहीं हैं, आज उन्हें पढ़ने-लिखने, अपना करियर तक चुनने की आजादी है। माना कि है लेकिन आज भी जब शादी के लिए रिश्ते देखे जाते हैं, तो ‘जरूरत से ज्यादा पढ़ी लिखी‘ लड़कियों को अधिकतर रिजेक्ट कर दिया जाता है। फिर कहा जाता है कि लड़कियां तरक्की कर रही हैं, मन से अपनी जिंदगी जीने को स्वतंत्र हैं, लेकिन फिर वही बात आ जाती है कि ऐसी लड़कियों के लिए आदरणीय पुरुषवादी समाज ने किस किस तरह के नाम बनाये हैं, शायद बताने की जरूरत नहीं।
तो कुल मिलाकर मंथन की आवश्यकता इस बात को लेकर है कि आखिर नारी के किस रूप की तरक्की हो रही है, हमारे समाज में। आज यह बार बार सबको बताने की जरूरत पड़ती है किस तरह हमारे देश की लड़ाई में महिलाओं ने बराबर अंग्रेजों की लाठियां, गोलियां खायीं, रणभूमि में लड़ीं। और कुछ नहीं तो बार बार इतिहास बताने वाले इतिहास से ही सबक लेते तो भी था। आज भी दूर दराज के गावों में महिलाएं कभी शराब के ठेके हटवाने के लिए तो कभी पाकृतिक संपदाओं को बचाने के लिए पूरी तरह प्रयासरत हैं, लेकिन न मीडिया न ही आम लोग किसी का भी उनकी बहादुरी पर ध्यान नहीं गया। मगर विडंबना देखिए एक पोर्न स्टार जो एक दिन भारत आती है, तो वह इंटरनेट पर सबसे ज्यादा सर्च की जाने वाली महिला बन जाती है, हिंदी फिल्मों में इतना बड़ा ब्रेक ऐसे मिल जाता है जिसे पाने के लिए एक असल कलाकार की जिंदगी निकल जाती है। जहां आज भी आफिस में आमदनी को लेकर महिलाओं के साथ भेदभाव की बातें सामने आती हैं, वहीं एक आइटम नंबर करने वाली एक्ट्रेस करोड़ों के हिसाब से पैसे बटोरती है। यहां घड़ी की सुई की तरह बात घूम कर फिर वहीं आ गयी। इस पूरे सिलसिले में आपके उस भाषण का क्या, जिसमें आपने कहा था कि लड़कियां पढ़ने लिखने को, करिअर चुनने को स्वतंत्र हैं, क्योंकि आपके इस समाज में मेहनत करने वाली, समाज के लिए भलाई करने वाली औरतों की तो कोई जगह नजर ही नहीं आती।
जाहिर है समय और जरूरत‘ के हिसाब से पुरूष ने नारी के जिस रूप की कल्पना की उसी रूप की तरक्की स्वभाविक मानी गयी। गर्लफ्रेंड बनानी हो तो शहरी लड़की, जिसकी हर अदा में स्टाइल हो और स्टेटस सिंबल के हिसाब से एकदम परफेक्ट, लेकिन बस उससे शादी नहीं क्योंकि ऐसी लड़की को अपने मां बाप के सामने किस मुंह से लेकर जाएगा आदर्शवादी लड़का आखिर वह घर का एक जिम्मेदार लड़का है, इसलिए ऐसी लड़की केवल गर्लफ्रेंड बनने लायक बस उससे आगे शादी नहीं। फिर शादी की यदि बात आ जाए तो शादी के लिए हाउस वाइफ होनी चाहिए, आखिर घर बार देखना भी तो है। थके हारे घर पहुंचो तो कोई होना चाहिए कि बना हुआ खाना मिल जाए। यहां जिन जिन बातों का उल्लेख हुआ, वे भले ही एक बार को अजीब लगे लेकिन झूठ नहीं यह बात सभी जानते हैं।
जाहिर है कि यह समाज अब भी नारी के किस रूप की कल्पना करता है वह सामने है यहां हर कोई आज सरकार से कभी पुलिस प्रशासन से अपने हक को मांग रहा है। लेकिन असल बात यह है कि आपका हक इसी समाजिक व्यवस्था से मिलना है। और उसके लिए जरूरी है कि समाज की छोटी यूनिट परिवार से इसकी शुरुआत की जाए। जहां महिला पुरुष दोनों को बराबरी का दर्जा हो।
स्वामी विवेकानंद ने इस देश की तरक्की में ठहराव का एक कारण महिलाओं के प्रति अत्याचार बताया। समय बीत गया लेकिन महिलाओं के प्रति दोयम दर्जे की भावना पर लगाम नहीं लग पायी। समाज में आ रही अव्यवस्था को कम से कम अब इस समज को समझना होगा, और यह तब होगा जब हम नारी को उसके काम के लिए उसको प्रोत्साहन देने के साथ साथ उसकी बहादुरी और समाज के प्रति कर्मठता को सलाम करेंगे और निजी जिंदगी में भी उसकी कद्र करेंगे। तभी सही मायने में महिला दिवस मुकम्मल माना जाएगा।

मैं गाजियाबाद में रहता हूं, आपको कोई दिक्‍कत है?


♦ रवीश कुमार
हानगरों में आपके रहने का पता एक नयी जाति है। दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों में जाति की पहचान की अपनी एक सीमा होती है। इसलिए कुछ मोहल्ले नये ब्राह्मण की तरह उदित हो गये हैं और इनके नाम ऋग्वेद के किसी मंत्र की तरह पढ़े जाते हैं। पूछने का पूरा लहजा ऐसा होता है कि बताते हुए कोई भी लजा जाए। दक्षिण हमारे वैदिक कर्मकांडीय पंरपरा से एक अशुभ दिशा मानी जाती है। सूरज दक्षिणायन होता है, तो हम शुभ काम नहीं करते। जैसे ही उत्तरायण होता है, हम मकर संक्रांति मनाने लगते हैं। लेकिन मुंबई और दिल्ली में दक्षिण की महत्ता उत्तर से भी अधिक है। दक्षिण मतलब स्टेटस। मतलब नया ब्राह्मण।
जब तक रिपोर्टर था, तब तक तो लोगों को मेरे गाजियाबादी होने से कोई खास दिक्कत नहीं थी। जब से एंकर हो गया हूं, लोग मुझसे मेरा पता इस अंदाज में पूछते हैं कि जैसे मैं कहने ही वाला हूं कि जी जोर बाग वाली कोठी में इन दिनों नहीं रहता। बहुत ज्यादा बड़ी है। सैनिक फार्म में भी भीड़ भाड़ हो गयी है। पंचशील अमीरों के पते में थोड़ा लापता पता है। मतलब ठीक है आप साउथ दिल्ली में है। वो बात नहीं। फ्रैंड्स कालोनी की लुक ओखला और तैमूर नगर के कारण जोर बाग वाली नहीं है, मगर महारानी बाग के कारण थोड़ा झांसा तो मिल ही जाता है। आप कहने को साउथ में हैं, पर सेंट्रल की बात कुछ अलग ही होती है। मैं जी बस अब इन सब से तंग आकर अमृता शेरगिल मार्ग पर रहने लगा हूं। खुशवंत सिंह ने बहुत कहा कि बेटे रवीश तू इतना बड़ा स्टार है, टीवी में आता है, तू न सुजान सिंह पार्क में रहा कर। अब देख खान मार्केट से अमृता शेरगिल मार्ग थोड़ी दूर पर ही है न। सुजान सिंह पार्क बिल्कुल क्लोज। काश ऐसा कह पाता। मैं साउथ और सेंट्रल दिल्ली में रहने वालों पर हंस नहीं रहा। जिन्होंने अपनी कमाई और समय रहते निवेश कर घर बनाया है, उन पर तंज नहीं है। पर उनके इस ब्राह्मणवादी पते से मुझे तकलीफ हो रही है। मुझे हिकारत से क्यों देखते हो भाई।
तो कह रहा था कि लोग पूछने लगे हैं कि आप कहां रहते हैं। जैसे ही गाजियाबाद बोलता हूं, उनके चेहरे पर जो रेखाएं उभरती हैं, उससे तो यही आवाज आती लगती है कि निकालो इसे यहां से। किसे बुला लिया। मैं भी भारी चंठ। बोल देता हूं जी, आनंद विहार के पास गाजीपुर है न, वो कचड़े का पहाड़, उसी के आसपास रहता हूं। मैं क्या करूं कि गाजियाबाद में रहता हूं। अगर मैं टीवी के कारण कुछ लोगों की नजर में कुछ हो गया हूं, तो गाजियाबाद उसमें कैसे वैल्यू सब्सट्रैक्शन (वैल्यू एडिशन का विपरीत) कर देता है। एक मॉल में गया था। मॉल का मैनेजर आगे पीछे करने लगा। चलिए बाहर तक छोड़ आता हूं। मैं कहता रहा कि भाई मुझे घूमने दो। जब वो गेट पर आया, तो मेरी दस साल पुरानी सेंट्रो देखकर निराश हो गया। जैसे इसे बेकार ही एतना भाव दे दिये। वैसे दफ्तर से मिली एक कार और है। रिक्शे पर चलता फिरता किसी को नजर आता हूं, तो लोग ऐसे देखते हैं, जैसे लगता है एनडीटीवी ने दो साल से पैसे नहीं दिये बेचारे को।
Apartmentकहने का मतलब है कि आपकी स्वाभाविकता आपके हाथ में नहीं रहती। प्राइम टाइम का एंकर न हो गया, फालतू में बवाल सर पर आ गया है। तभी कहूं कि हमारे कई हमपेशा एंकर ऐसे टेढ़े क्यों चलते हैं। शायद वो लोगों की उठती-गिरती नजरों से थोड़े झुक से जाते होंगे। मुझे याद है, हमारी एक हमपेशा एंकर ने कहा था कि मैं फ्रैंड्स कालोनी रहती हूं। डी ब्लाक। फ्रैंड्स कालोनी के बारे में थोड़ा आइडिया मुझे था। कुछ दोस्त वहां रहते हैं। जब बारीकी से पूछने लगा तो ओखला की एक कालोनी का नाम बताने लगीं। बड़ा दुख हुआ। आप अपनी असलियत को लेकर इतने शर्मसार हैं, तो जाने कितने झूठ रचते होंगे दिन भर। इसलिए जो लोग मुझे देख रहे हैं, उनसे यही गुजारिश है कि हम लोग बाकी लोगों की तरह मामूली लोग होते हैं। स्टार तो बिल्कुल ही नहीं। हम भी कर्मचारी हैं। काम ही ऐसा है कि सौ-पचास लोग पहचान लेते हैं। जैसे शहर के चौराहे पर कोई होर्डिंग टंगी होती है, उसी तरह से हम टीवी में टंगे होते हैं। मैंने कई एंकरों की चाल देखी है। जैसे पावर ड्रेसिंग होती है, वैसे ही पावर वॉक होती है। ऐसे झटकते हैं, जैसे अमित जी जा रहे हों। उनकी निगाहें हरदम नापती रहती हैं कि सामने से आ रहा पहचानता है कि नहीं। जैसे ही कोई पहचान लेता है उनके चेहरे पर राहत देखिए। और जब पहचानने वाला उन्हें पहचान कर दूसरे एंकर और चैनल का नाम लेता है, तो उस एंकर के चेहरे पर आफत देखिए!
तो हजरात मैं गाजियाबाद में रहता हूं। मूल बात है कि औकात भी यहीं रहने की है। इसलिए सवाल मेरी पसंद का भी नहीं है। बाकी एंकरों का नहीं मालूम। आप उनसे पूछ लीजिएगा। लेकिन नाम सही लीजिएगा। बेचारों पर कुछ तो दया कीजिए।
ravish kumar(रवीश कुमार। टीवी का एक सजग चेहरा। एनडीटीवी इंडिया के कार्यकारी संपादक। इतिहास के छात्र रहे। कविताएं और कहानियां भी लिखते हैं। 

Thursday, April 11, 2013

हो मेरा काम ग़रीबों की हिमायत करना!


 हो मेरे दम से ही मेरे वतन की ज़ीनत
जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत
ज़िंदगी हो मेरी परवान की सूरत यारब
इल्म की शम्मा को हो मुझसे मोहब्बत यारब
हो मेरा काम ग़रीबों की हिमायत करना
दर्दमंदों से ज़ईफ़ों से मोहब्बत करना
मेरे अल्लाह बुराई से बचाना मुझको
नेक जो राह हो उस रह पे चलाना मुझको

मालूम नहीं आज इस गाने को क्यों बार बार सुनता चला गया । आपको भी सुनना चाहिए । इन दिनों राहुल गांधी और नरेंद्र दामोदर मोदी अपने अपने भारत का सपना बेचने निकले हैं। दोनों के सपने ख्वाब कम कोरे भाषण ज़्यादा लगते हैं। ये कैसा ख़्वाब है जिसमें सब अपने अपने भारत के नाम पर तमाम सपनों को कुचल रहे हैं। इतनी शाब्दिक हिंसा के साथ कोई भारत का ख़्वाब कैसे देख सकता है। काबुलीवाला की तरह ये दोनों अभी कई बाज़ारों में निकलेंगे। इनके भाषणों में भारत का अतीत और उसके नायक विचित्र तरीके से आते हैं और इनके काम में सीनाज़ोरी के साथ भुला दिये जाते हैं। तुर्रा ये कि इनके भारत ने जैसे कुछ किया ही न हो। जैसे इन्हीं दो के आगमन का इंतज़ार है कुछ होने के लिए। एक ऐसे भारत की तस्वीर खींची जा रही है जहां हकीकत का ऐसा अतिरेक है कि आप चाहें भी तो यकीन नहीं कर सकते कि सचमुच हम किसी अतीत में अटके हुए वतन हैं। केंद्र से लेकर राज्यों के बीच कई सरकारों से गुज़रते हुए इस मुल्क ने काफी कुछ हासिल किया है। उसके बड़े ही गौरवक्षण हैं। भारत को दांव पर लगाकर अपने सत्ता स्वपनों को हासिल करने के लिए घुड़सवार छोड़ देने से भारत नहीं मिल जाता। बुद्ध को समझ लेने से आज का भारत नहीं मिल जाता। इनके भाषणों का भारत नारेबाज़ी से ज़्यादा कुछ नहीं। सब स्लोगन है। कुछ रोचक है तो कुछ ताली कमाऊं हैं। दलीलों के अपने अपने गुट हैं। इन्हीं में जो जीतेगा दिल्ली से हुकूमत की सत्ता उसके हाथ में होगी। ये इतिहास की एक सामान्य घटना है जो लोकतंत्र के कारण हर पांच साल पर स्वत घट जाती है। लेकिन आप इनके भाषणों को सुनिये। मिलान कीजिए। देखिये कि सत्ता की भूख कितनी है और भारत के लिए त्याग कितना है। कैसे ये दोनों एक दूसरे के भाषणों के संदर्भों को उड़ा लेते हैं, उन्हें भावनात्मक रूप देकर अपने कार्यकर्ताओं के बीच ताली बजवा लेते हैं। यही दो दावेदार हैं जो निकले हैं आपके वोट के लिए। भारत के लिए कोई नहीं निकलता। सत्ता ही वो भारत है जिसे हर राजनीतिक दल हासिल करना चाहता है। आजकल दल नहीं उनके नेता हासिल करना चाहते हैं। राजनीति का एक दिलचस्प दौर शुरू हो चुका है। तल्ख़ियों और पटखनियों के बीच भारत एक सपने के रूप में आज भी वहीं टंगा है जहां से इस खूबसूरत प्राथर्ना की आवाज़ आ रही है।
ज़िंदगी शम्मा की सूरत हो खुदाया मेरी
लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी

मोदी का भाषण-मोदी का राशन!


 बिना भाषण के राजनीति का राशन नहीं चलता। लेकिन हाल के दिनों में नरेंद्र मोदी ने भाषण को कुछ इस तरह से महत्वपूर्ण बना दिया है कि उनके कथनों की एक एक पंक्ति की समीक्षा होने लगती है। ये शुरूआत संगठित रूप से मोदी के इंटरनेट पर मौजूद चंद समर्थकों ने ही की है। जैसे ही नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी भाषण देते हैं एक किस्म का मैच छिड़ जाता है। जीताने हराने की शैली में बातों की मीमांसा की जाने लगती है। हाल के दिनों में नरेंद्र मोदी ने दिल्ली और कोलकाता में चार या पांच बार भाषण दिये हैं। वो जहां जाते हैं गुजरात में अपने विकास कार्यों को लेकर भारत के बारे में एक सपना रचते हैं। देश के स्तर पर स्वपन देखने की राजनीतिक प्रवृत्ति भौगोलिक खंडों के राष्ट्र राज्यों में उदय होने के साथ चली आ रही है। शासक खुद को युगदृष्टा के रूप में पेश करना चाहता है। न भी करे तो उसकी बात को इस नज़र से भी देखा ही जाता है। इसके लिए हर नेता अपने पसंद से किसी कालखंड का चुनाव करता है और उसे गया गुज़रा या स्वर्णिम बताते हुए तथ्यों और मिथकों को मिलाकर ऐसी तस्वीर खींचता है कि आपको अपना वर्तमान भी अजनबी जैसा लगने लगता है।

नरेंद्र मोदी के भाषणों की शैली की बहुत चर्चा होती है। सार्वजनिक जीवन में अच्छे वक्ता की शैली भी देखी जाती है। लेकिन राजनीति का इतिहास बताता है कि सिर्फ शानदार शैली वाले नेताओं ने नहीं बल्कि साधारण कद काठी और शैली वाले नेताओं ने भी गहरा प्रभाव डाला है। इसलिए शैली पर ज़ोर देने से समस्या यह होती है कि लालू प्रसाद यादव की शैली याद आ जाती है। वो अपनी शैली के कारण ही बिहार की सत्ता में पंद्रह साल काबिज़ रहे और नवीन पटनायकशीला दीक्षित या शिवराज सिंह चौहान अपनी भाषण शैली के साधारण होते हुए भी जनता के बीच विकास के चुनावी पैमाने पर पसंद किये जाते रहे हैं। मनमोहन सिंह की भाषण शैली तो राजनेता की लगती ही नहीं है। इन सबके बीच नरेंद्र मोदी एक खास शैली का खाका बनाये रखते हुए मंच लूट ले जाते हैं। शैली में मीडिया और मंच के नीचे मौजूद श्रोता की दिलचस्पी ज्यादा रहती है लेकिन नेता खासकर नरेंद्र मोदी जैसे नेता को मालूम रहता है कि लोग उन्हें गौर से सुन रहे हैं इसलिए उनकी नज़र सिर्फ शैली पर नहीं बातों पर भी है।

नरेंद्र मोदी के भाषणों में स्पष्टता इसलिए है कि प्रशासन और उपलब्धियों का लंबा अनुभव है । वे भरोसे के साथ अपने काम का प्रदर्शन करते हैं। भारत के बारे में क्या सोचते हैं वे खुलकर सामने रखते हैं। तभी उनकी बातों की आलोचना और सराहना घनघोर तरीके से होती है। उनके हाल के चार पांच भाषणों को बार बार पढ़ने के बाद यह लिख रहा हूं कि वे अपने पसंद का कालखंड चुनते हैं और उनका महिमंडन करते हैं या धज्जियां उड़ा देते हैं। पिछले कई भाषणों में उन्होंने कहा है कि गुजरात एक ऐसा प्रदेश है जहां किसानों को मिट्टी की जांच के लिए हेल्थ कार्ड दिया गया है। निश्चित रूप से उन्हें सिर्फ गुजरात के बारे में बात करने का हक है लेकिन यह जताने का भाव नहीं होना चाहिए कि हेल्थ कार्ड सिर्फ गुजरात में दिया गया है। मिट्टी जांच के लिए हेल्थ कार्ड गुजरात के अलावा पंजाबहरियाणा,कर्नाटक,उत्तर प्रदेश बिहार और आंध्र प्रदेश में भी दिये गए हैं। जब वो गुजरात के पर्यटन सेक्टर में डबल डिजिट ग्रोथ की बात करते हैं तो ऐसा लगता है कि गुजरात ने बड़ा बदलाव किया है। तुलनात्मक रूप से किया होगा मगर २०११ के केंद्रीय आंकड़े के अनुसार आज भी मध्यप्रदेश में घरेलु पर्यटक गुजरात से ज्यादा आते हैं। मध्यप्रदेश और बिहार ने भी पर्यटन के क्षेत्र में डबल डिजिट ग्रोथ हासिल किया है। सबसे ज्यादा यूपी और आंध्र प्रदेश में पंद्रह करोड़ लोग जाते हैं। गुजरात में दो करोड़ से कुछ ज्यादा घरेलु पर्यटक गए हैं। सवाल है कि आप अपनी उपलब्धियों की पैकेजिंग कैसे करते हैं। आंकड़ों का आधार क्या है। क्या हम इस तरह से नेताओं के भाषण को देखते समझते हैं। यह सवाल खुद से पूछना चाहिए।

गौर से देखेंगे तो राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी की बातें कई जगहों पर मिलती जुलती लगती हैं। जैसे राहुल गांधी कहते हैं कि एक अरब आवाज़ को सिस्टम में जगह देनी है। ऐसा सिस्टम बनाना है जिसमें व्यक्ति की अहमियत न रहे और सिस्टम इस तरह से चले कि सबको न्याय मिले। नरेंद्र मोदी भी फिक्की की महिला उद्योगपतियों से कहते हैं कि पचास फीसदी आबादी को आर्थिक विकास की प्रक्रिया से जोड़ने के बारे में सोचना होगा। राहुल गांधी की तरह वे भी गुजरात की औरतों की कामयाबी के किस्से चुनते हैं। इस ईमानदारी से स्वीकार करते हुए कि इन किस्सों में गुजरात सरकार का कोई योगदान नहीं है वे बताने का प्रयास करते हैं कि आम आदमी संभावनाओं के इंतज़ार में नहीं है बल्कि वो इस्तमाल करने लगा है। ज़रूरत है तो एक सिस्टम बनाकर उसे धक्का देने की।

मोदी एक मामले में साहसिक नेता है। पार्टी के भीतर ही इतने विरोध के बावजूद वो दिल्ली आने की सभी कोशिशों में कामयाब हो जाते हैं। पार्टी के बाकी नेता जहां चुप हैं वहां वे खुलकर खुद को प्रोजेक्ट करते हैं। प्रधानमंत्री का दावेदार नहीं कहते लेकिन तब तक वे चुप क्यों रहे। इसका मतलब है कि वे सत्ता के लिए आतुर हैं। उन्होंने जो सोचा है उसे करने के लिए सत्ता ही चाहिए ये प्रदर्शित करने में जरा भी संकोच नहीं करते हैं। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के हाल के बयान के संदर्भ में मोदी को देखा जाना चाहिए। शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि अच्छे कामों को प्रचार की ज़रूरत नहीं है। प्रधानमंत्री पद की बात करने से बीजेपी का मज़ाक उड़ रहा है। शिवराज सिंह चौहान से पूछा गया कि वे ट्विटर पर आए हैं क्या उनके समर्थक भी अब प्रचार में जुट जायेंगे तो शिवराज तुरंत कहते हैं कि मेरे समर्थक क्या होते हैं। जो भी समर्थक हैं वो बीजेपी के हैं और मैं उनमें से एक हूं। शिवराज सिंह चौहान अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी के प्रति अपने सम्मान को विनम्रता से ज़ाहिर करने में संकोच नहीं करते लेकिन मोदी की शैली में मैं मैं और मेरा गुजरात ज्यादा प्रमुख हो जाता है। एक ही पार्टी के दो प्रमुख नेताओं की शैली में इतना अंतर है।

फैसला जनता को करना है। उसके पास बहुत सारे विकल्प हैं। मोदी खुद को एक विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं। खूब बोल रहे हैं। दांव पर लगाने वाले को ही पता चलता है कि वो जीता या हारा। मगर राजनीति में चुप रहकर काम करने वाले नेताओं की कामयाबी के किस्से अभी सुनाये नहीं गए हैं। ज़रा इन्हें भी सुनने की तैयारी कीजिए। लोकसभा चुनावों के नजदीक आते ही हर भाषण दूसरे पर भारी पड़ेगा। व्यक्तिवाद या विचारवाद इसकी लड़ाई नरेंद्र मोदी ने छेड़ दी है। फैसला आना बाकी है।