♦ रवीश कुमार
महानगरों में आपके रहने का पता एक नयी जाति है। दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों में जाति की पहचान की अपनी एक सीमा होती है। इसलिए कुछ मोहल्ले नये ब्राह्मण की तरह उदित हो गये हैं और इनके नाम ऋग्वेद के किसी मंत्र की तरह पढ़े जाते हैं। पूछने का पूरा लहजा ऐसा होता है कि बताते हुए कोई भी लजा जाए। दक्षिण हमारे वैदिक कर्मकांडीय पंरपरा से एक अशुभ दिशा मानी जाती है। सूरज दक्षिणायन होता है, तो हम शुभ काम नहीं करते। जैसे ही उत्तरायण होता है, हम मकर संक्रांति मनाने लगते हैं। लेकिन मुंबई और दिल्ली में दक्षिण की महत्ता उत्तर से भी अधिक है। दक्षिण मतलब स्टेटस। मतलब नया ब्राह्मण।
जब तक रिपोर्टर था, तब तक तो लोगों को मेरे गाजियाबादी होने से कोई खास दिक्कत नहीं थी। जब से एंकर हो गया हूं, लोग मुझसे मेरा पता इस अंदाज में पूछते हैं कि जैसे मैं कहने ही वाला हूं कि जी जोर बाग वाली कोठी में इन दिनों नहीं रहता। बहुत ज्यादा बड़ी है। सैनिक फार्म में भी भीड़ भाड़ हो गयी है। पंचशील अमीरों के पते में थोड़ा लापता पता है। मतलब ठीक है आप साउथ दिल्ली में है। वो बात नहीं। फ्रैंड्स कालोनी की लुक ओखला और तैमूर नगर के कारण जोर बाग वाली नहीं है, मगर महारानी बाग के कारण थोड़ा झांसा तो मिल ही जाता है। आप कहने को साउथ में हैं, पर सेंट्रल की बात कुछ अलग ही होती है। मैं जी बस अब इन सब से तंग आकर अमृता शेरगिल मार्ग पर रहने लगा हूं। खुशवंत सिंह ने बहुत कहा कि बेटे रवीश तू इतना बड़ा स्टार है, टीवी में आता है, तू न सुजान सिंह पार्क में रहा कर। अब देख खान मार्केट से अमृता शेरगिल मार्ग थोड़ी दूर पर ही है न। सुजान सिंह पार्क बिल्कुल क्लोज। काश ऐसा कह पाता। मैं साउथ और सेंट्रल दिल्ली में रहने वालों पर हंस नहीं रहा। जिन्होंने अपनी कमाई और समय रहते निवेश कर घर बनाया है, उन पर तंज नहीं है। पर उनके इस ब्राह्मणवादी पते से मुझे तकलीफ हो रही है। मुझे हिकारत से क्यों देखते हो भाई।
तो कह रहा था कि लोग पूछने लगे हैं कि आप कहां रहते हैं। जैसे ही गाजियाबाद बोलता हूं, उनके चेहरे पर जो रेखाएं उभरती हैं, उससे तो यही आवाज आती लगती है कि निकालो इसे यहां से। किसे बुला लिया। मैं भी भारी चंठ। बोल देता हूं जी, आनंद विहार के पास गाजीपुर है न, वो कचड़े का पहाड़, उसी के आसपास रहता हूं। मैं क्या करूं कि गाजियाबाद में रहता हूं। अगर मैं टीवी के कारण कुछ लोगों की नजर में कुछ हो गया हूं, तो गाजियाबाद उसमें कैसे वैल्यू सब्सट्रैक्शन (वैल्यू एडिशन का विपरीत) कर देता है। एक मॉल में गया था। मॉल का मैनेजर आगे पीछे करने लगा। चलिए बाहर तक छोड़ आता हूं। मैं कहता रहा कि भाई मुझे घूमने दो। जब वो गेट पर आया, तो मेरी दस साल पुरानी सेंट्रो देखकर निराश हो गया। जैसे इसे बेकार ही एतना भाव दे दिये। वैसे दफ्तर से मिली एक कार और है। रिक्शे पर चलता फिरता किसी को नजर आता हूं, तो लोग ऐसे देखते हैं, जैसे लगता है एनडीटीवी ने दो साल से पैसे नहीं दिये बेचारे को।
तो हजरात मैं गाजियाबाद में रहता हूं। मूल बात है कि औकात भी यहीं रहने की है। इसलिए सवाल मेरी पसंद का भी नहीं है। बाकी एंकरों का नहीं मालूम। आप उनसे पूछ लीजिएगा। लेकिन नाम सही लीजिएगा। बेचारों पर कुछ तो दया कीजिए।
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