Thursday, April 11, 2013

हो मेरा काम ग़रीबों की हिमायत करना!


 हो मेरे दम से ही मेरे वतन की ज़ीनत
जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत
ज़िंदगी हो मेरी परवान की सूरत यारब
इल्म की शम्मा को हो मुझसे मोहब्बत यारब
हो मेरा काम ग़रीबों की हिमायत करना
दर्दमंदों से ज़ईफ़ों से मोहब्बत करना
मेरे अल्लाह बुराई से बचाना मुझको
नेक जो राह हो उस रह पे चलाना मुझको

मालूम नहीं आज इस गाने को क्यों बार बार सुनता चला गया । आपको भी सुनना चाहिए । इन दिनों राहुल गांधी और नरेंद्र दामोदर मोदी अपने अपने भारत का सपना बेचने निकले हैं। दोनों के सपने ख्वाब कम कोरे भाषण ज़्यादा लगते हैं। ये कैसा ख़्वाब है जिसमें सब अपने अपने भारत के नाम पर तमाम सपनों को कुचल रहे हैं। इतनी शाब्दिक हिंसा के साथ कोई भारत का ख़्वाब कैसे देख सकता है। काबुलीवाला की तरह ये दोनों अभी कई बाज़ारों में निकलेंगे। इनके भाषणों में भारत का अतीत और उसके नायक विचित्र तरीके से आते हैं और इनके काम में सीनाज़ोरी के साथ भुला दिये जाते हैं। तुर्रा ये कि इनके भारत ने जैसे कुछ किया ही न हो। जैसे इन्हीं दो के आगमन का इंतज़ार है कुछ होने के लिए। एक ऐसे भारत की तस्वीर खींची जा रही है जहां हकीकत का ऐसा अतिरेक है कि आप चाहें भी तो यकीन नहीं कर सकते कि सचमुच हम किसी अतीत में अटके हुए वतन हैं। केंद्र से लेकर राज्यों के बीच कई सरकारों से गुज़रते हुए इस मुल्क ने काफी कुछ हासिल किया है। उसके बड़े ही गौरवक्षण हैं। भारत को दांव पर लगाकर अपने सत्ता स्वपनों को हासिल करने के लिए घुड़सवार छोड़ देने से भारत नहीं मिल जाता। बुद्ध को समझ लेने से आज का भारत नहीं मिल जाता। इनके भाषणों का भारत नारेबाज़ी से ज़्यादा कुछ नहीं। सब स्लोगन है। कुछ रोचक है तो कुछ ताली कमाऊं हैं। दलीलों के अपने अपने गुट हैं। इन्हीं में जो जीतेगा दिल्ली से हुकूमत की सत्ता उसके हाथ में होगी। ये इतिहास की एक सामान्य घटना है जो लोकतंत्र के कारण हर पांच साल पर स्वत घट जाती है। लेकिन आप इनके भाषणों को सुनिये। मिलान कीजिए। देखिये कि सत्ता की भूख कितनी है और भारत के लिए त्याग कितना है। कैसे ये दोनों एक दूसरे के भाषणों के संदर्भों को उड़ा लेते हैं, उन्हें भावनात्मक रूप देकर अपने कार्यकर्ताओं के बीच ताली बजवा लेते हैं। यही दो दावेदार हैं जो निकले हैं आपके वोट के लिए। भारत के लिए कोई नहीं निकलता। सत्ता ही वो भारत है जिसे हर राजनीतिक दल हासिल करना चाहता है। आजकल दल नहीं उनके नेता हासिल करना चाहते हैं। राजनीति का एक दिलचस्प दौर शुरू हो चुका है। तल्ख़ियों और पटखनियों के बीच भारत एक सपने के रूप में आज भी वहीं टंगा है जहां से इस खूबसूरत प्राथर्ना की आवाज़ आ रही है।
ज़िंदगी शम्मा की सूरत हो खुदाया मेरी
लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी

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