Saturday, June 08, 2013

हम टैक्स देते हैं ताकि शहर गाँव जैसा लगे!


प्रिय दद्दू,

हमने पिछले दिनों कहीं पढ़ा था दद्दू, कि किसी बड़े ज्ञानी पुरुष ने शोध के बाद ये कहा है कि हिंदुस्तान में बीस तीस साल बाद सिर्फ  शहर ही मिलेंगे, गाँव नहीं मिलेंगे। उन्होंने कहा कि तमान फैक्ट्री, सड़क, नौकरियां सब गाँव तक पहुंच जाएंगी और शहर गाँव को लील लेगा। हमें ये बात सुन के बड़ा डर लगा कि अरे, हमारा गाँव अगर शहर बन गया तो हमारे खेत, हमारी पगडण्डी, हमारे बाग, हमारी नहर, हमारी पुलिया इन सब का क्या होगा?


लेकिन जब हमने और अधिक सोचा तो पाया कि दूर भविष्य में चाहे जो हो, लेकिन आज तो उल्टा हो चूका है दद्दु, भारत का हर बड़ा शहर एक गाँव ही तो है दद्दू!
आज कल हम ऐसे ही एक बड़े शहर के गाँव में हैं। काम ढूंढने आये थे। घर से दूर हैं, परिवार से दूर हैं, खेत खलिहान से दूर हैं, गाय गोरु से दूर हैं, किन्तु फिर भी अगर दिल की बात बताएं तो ये गाँव भी अपने गाँव से कुछ ज्यादा अलग नहीं है।



दद्दू यहां सबसे बढिय़ा हमें यहां की सड़कें लगती हैं। इतने गड्ढे हैं, इतने गड्ढे हैं, कि जब उन पे हम हिचकोले खाते हुए ऑटो में चलते हैं और ऑटो वाला रेडियो पे कोई बढिय़ा सा गीत लगता है, और जब मई की पसीनेदार हवा गाल पे लप्पड़ मारती चलती है और गर्मी के मारे कनपटी बॉईल होने लग जाती है, तब लगता है जैसे हम वापस गाँव पहुंच गए हैं, और अपनी ईंटे वाली खडंज़ा रोड पे किसी गर्मी की दोपहर में हम तीन पहिये की ठेलिया पे ब्रहस्पत की हाट से वापस घर जा रहे हों, रोटी गुड़ खाने। जितनी बार ऑटो रिक्शा किसी गड्ढे के ऊपर से गुजऱता है, हमें लगता है हम गाँव के एक मील और करीब आ गए हैं।

दद्दू, हमें तो कभी-कभी ये लगता है कि सरकार ने देश भर में शहरों की सड़कें इतनी खऱाब समाज के भले के लिए ही बनायीं हैं। ताकि शहर में रहने वाले हिंदुस्तानी भी गाँव को लगातार याद करते रहें। ये फैसला किसी बड़े मंत्री ने किन्ही बड़े-बड़े अधिकारियों के साथ बड़ी सी बैठक में लिया होगा। हम यहां मुंबई गाँव में बैठ कर गर्मी के थपेड़ों का थप्पड़ खाते हुए इस फैसले का अभिवादन और अनुमोदन करते हैं।


प्यारे दद्दू, यहां इस बड़े शहर के गाँव में लोग सड़क पर धीमे-धीमे कब्ज़ा करने में लगे रहते हैं। हमें अक्सर याद आता है कि कैसे गाँव में लोग मेड़ काटने में लगे रहते हैं ताकि खेत और थोडा बड़ा हो जाये। बस समझ लीजिये कि यहां मुंबई गाँव में भी लोग भकाभक मेड़ काटने में लगे रहते हैं। सड़क पे कभी झोपडिय़ां उग आती हैं, कभी घर। दद्दू ये तो हर शहर की कहानी है। और हमें लगता है ये भी समाज के हित में है। शहर को गाँव से जोडती है ये भावना। गाँव में भी मेड़ कटे, शहर में भी मेड़ कटे। मिले सुर मेरा तुम्हारा। है न सरकार की दूर की सोच? हमें लगता है कि अतिक्रमण भी गाँव और शहर को जोड़े रहने का एक बहुत बढिय़ा आईडिया है। ये फैसला भी सरकार ने बड़ा सोच समझ के लिया होग। हम गर्मी के थपेड़ों का थप्पड़ खाते हुए इस फैसले का अभिवादन और अनुमोदन करते हैं।

पीने का पानी यहां भी दद्दू अब मुश्किल से मिलता है। बहुत कमी है, अक्सर बिल्डिंग में पानी बंद हो जाता है, तब दद्दू पानी का इंतज़ार वैसे ही करना पड़ता है, जैसे तब करते थे जब आप कुंए पर जाते थे बाल्टी ले के पानी खींचने। जैसे हमारे यहां कभी लोग बैलगाड़ी पे चलते थे वैसे ही यहां भी लोग सड़कों पे बैलगाड़ी की ही रफ्तार से चलते हैं। इतनी गाडिय़ां हैं कि लगता है जैसे अभी-अभी परेवन का मेला छूटा हो या किसी शैतान बच्चे ने चींटी के बिल में हाथ दे दिया हो। न जाने किस बात का घमंड है शहर वालों को, दद्दू। हमसे ज्यादा बड़ा गाँव तो उनका है।


आपका 
सड़क छाप

Monday, June 03, 2013

स्त्रियां अगर प्रेम से इनकार करती है तो उसे मार डालो!

एसिड अटैक और प्रेम की प्रतिहिंसा

2 जून 2013 – तेजाबी हमले की शिकार प्रीति राठी, पूरे एक महीने, जिंदगी और मौत के बीच जूझते हुए, आखिर मौत से हार गयी। दामिनी की तरह क्या यह लड़की भी भारतीय न्याय व्यवस्था के लिए एक चुनौती, एक सबक बनेगी? हमारी लचर न्याय प्रणाली के चलते अपराधियों की हिम्मत इतनी बढ़ जाती है कि वे किसी से जिंदगी जीने का अधिकार छीन लेते हैं! क्या तेजाबी हमला, हत्या जितना ही संगीन अपराध नहीं है? इस मौत ने हमारे संविधान और न्याय प्रणाली पर एक बार फिर बहुत सारे सवाल खड़े कर दिये हैं। यह आलेख पिछले माह लिखा गया था:
अक्सर जीवन में ऐसे अंतर्विरोध सामने आते हैं कि यह समझ पाना मुश्किल होता है कि इस दुनिया को किस नजरिये से देखा जाए। ये अंतर्विरोध दो दुनियाओं के फर्क को बड़ी बेरहमी से हमारे सामने ले आते हैं और नये सिरे से सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या सारी स्त्रियां पुरुष सत्ता या वर्चस्व की शिकार हैं या उनका एक खास हिस्सा ही इससे पीड़ित है? कहीं स्त्रियां पुरुष उत्पीड़न की सीधे शिकार हैं, तो कहीं वह पुरुष वर्ग की आकांक्षाओं के अनुरूप विमर्श की सामग्री तैयार करती हुई पुरुषवादी एजेंडे को ही मजबूत बनाने की कवायद में लगी है। आज की दो घटनाओं के मद्देनजर इस पर एक बार फिर विचार करने की जरूरत है।

मई 2013 की सुबह के अखबार के पहले पन्ने की एक खबर पढ़कर मन उचाट हो गया। बांद्रा टर्मिनस पर दिल्ली से गरीब रथ एक्सप्रेस से मुंबई में पहली बार उतरी प्रीति राठी के ऊपर एक व्यक्ति ने एसिड फेंक दिया। हमलावर ने उसके कंधे पर पीछे से हाथ रखा और जैसे ही लड़की ने पीछे घूम कर देखा उसके चेहरे पर एसिड फेंक कर वह भाग गया। इतनी भीड़ वाले इलाके में भी कोई उसे रोक या पकड़ नहीं कर पाया और वह एक जिंदगी बर्बाद कर फरार हो गया। 22 साल की बेहद नाजुक और मासूम सी दिखती लड़की प्रीति राठी ने सैनिक अस्पताल में नर्स की नियुक्ति के लिए पहली बार मुंबई शहर में कदम रखा था। उसके हस्‍तलिखित पत्रों की भाषा जिस तरह से हताशा और चिंता से भरी हुई थी, वह न केवल दिल दहलाने वाली थी बल्कि एक स्त्री के जीवन में आजीविका के समानांतर किसी और विकल्प के गैरजरूरी होने का भी सबूत देती थी। एक लड़की अस्पताल में जीवन और मृत्यु से जूझ रही है, लेकिन जब भी उसे होश आता है तो वह अपनी नौकरी के बचने और छोटी बहनों के सुरक्षित रहने की चिंता व्यक्त करती है, माता पिता को टेंशन न पालने की हिम्‍मत देती है और हत्‍यारे के पकड़े जाने की खबर के बारे में पूछती है।
यह दिल दिमाग को सुन्न कर देने वाली खबर थी। तीन मई को, कुछ ही घंटों बाद दिल्ली से प्रकाशित हिंदी की एक रंगीन महिला पत्रिका की रिपोर्टर का फोन आया। नाम पूछा तो कहा – प्रीति! सुबह की प्रीति राठी अभी एक सदमे की तरह मुझ पर हावी थी। तब तक इस पत्रकार प्रीति ने फोन करके अपने अगले अंक की परिचर्चा पर सवाल पूछा – आपकी उम्र क्या है? मैंने उम्र बतायी – छियासठ। अगला सवाल – क्या आपको मेनोपॉज हो गया है? मैंने अपनी उम्र दोहरायी। बोली – ओह सॉरी, मैंने सुना – छियालीस। हम कुछ सेलेब्रिटीज से पूछ रहे हैं कि मेनोपॉज के बाद औरतों में सेक्स इच्छा कम हो जाती है क्या? सुनकर दिमाग चकरा गया। मैंने उसे कहा – इतनी समस्याओं से जूझ रही हैं औरतें और आपको सेक्स पर बात करना सूझ रहा है, कोई गंभीर मुद्दा नहीं मिला आपको? हंसते हुए जवाब मिला – हमने मार्च अंक में गंभीर मुद्दे भी उठाये थे पर वो कोई पसंद नहीं करता!
हाल ही में बाजार में लांच हुई इस गृहिणीप्रधान महिला पत्रिका को बेचने के लिए हर अंक में सिर्फ सेक्स की ही जरूरत क्यों पड़ती है? कौन सी महिलाएं हैं, जो उत्तर मेनोपोज स्त्री की कामभावना के ज्ञान से अपने दिमाग को तरोताजा बनाये रखना चाहती हैं? क्या महिलाओं का नया पाठक वर्ग अपने समय और उसके सवालों से पूरी तरह कट गया है और वे किसी गंभीर मुद्दे पर प्रकाशित कोई सामग्री नहीं पढ़ते? ये सारे सवाल उस भयावहता की तरफ दिल-दिमाग को बार-बार ले जाते हैं, जो स्त्री के खिलाफ एक फिनोमिना तैयार करते हैं और तब हम पाते हैं कि केवल पुलिस और अदालतें ही नहीं, मीडिया भी बहुत कुछ स्त्री-विरोधी रुझानों से संचालित है। लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहलाने वाला मीडिया इन प्रवृत्तियों से लड़ने और उन पर सवाल खड़ा करने की जगह, स्त्री को एक कमोडिटी की तरह ही पेश कर रहा है।
कुछ महीने पहले पाकिस्तान में तेजाब हमले की शिकार लड़कियों की त्रासदी पर आधारित एक वृत्तचित्र – ‘सेविंग फेस’ चर्चा में था, जिसे ऑस्कर मिला था। तेजाब का हमला हत्या से कमतर अपराध नहीं है। यह एक लड़की को जीवन भर के लिए विरूपित कर उसे हीनभावना से ग्रस्त कर देता है। ऐसी लड़कियों की अनगिनत कहानियां हैं और ये सभी पुरुष-वर्चस्व, पितृसत्ता और भारतीय पिछड़े पूंजीवाद के गर्भ से पैदा हुई हैं। ये कहानियां सिर्फ तथ्य नहीं हैं। ये हमारे समाज की उस बीमारी के कैंसर होते जाने की दास्‍तान हैं, जो संवैधानिक रूप से हमें लोकतंत्र और बराबरी का दर्जा मिलने के बावजूद इतनी गंभीरता से हमारे जीवन को खोखला करती रही हैं कि इसके चलते सोच-संस्कृति और व्यवहार में हम लिंग, जाति, धर्म और क्षेत्र से बाहर एक मनुष्य की तरह सोच ही नहीं पाते। मनुष्य के रूप में हम कायदे से भारतीय भी नहीं हो पाये, विश्व-मानव बनना तो बहुत दूर का सपना है।
स्त्रियों के लिए लगातार भयावह होती जा रही इस दुनिया के बारे में गंभीरता से सोचना आज का सबसे जरूरी सवाल है – ऐसी घटनाओं को बार बार दोहराया क्यों जा रहा है और कानून की सख्ती के बावजूद अपराधी बेलगाम क्यों हुए जा रहे हैं? क्या कारण है बलात्कार और हत्या की हर घटना के देशव्यापी विरोध के बाद हम आशावादी होकर सोचते हैं – अब ऐसी घटना न होगी और अभी सांस ठीक से ले भी नहीं पाते कि एक और घटना हमारी संवेदना के चिथड़े उड़ा देती है।
अपने देश के स्त्री-विरोधी पर्यावरण के वर्तमान से हमें अतीत के दरवाजे तक जाना होगा। एसिड अटैक की अधिकतर घटनाओं के पीछे प्रेम एक बुनियादी कारण होता है। सदियों से प्रेम हर समाज में मौजूद रहा है लेकिन एसिड अटैक का इतने भयानक रूप से प्रचलित प्रतिशोध इससे पहले कभी नहीं था। प्रेम में हजारों दिल टूटते हैं और उनकी उदासी हताशा में बदल जाती है, लेकिन ऐसा हिंस्र वातावरण पहले कभी नहीं था। तब भी नहीं, जब हमारा समाज आज की तुलना में अधिक दकियानूसी और भेदभावपूर्ण माना जाता था। आज स्थितियां बिलकुल विपरीत हो गयी हैं। आज उस समय की प्लेटोनिकता तो दुर्लभ है ही, उसकी जगह दूसरी कुंठाओं ने भी ले ली है। अधिकतर मामलों में प्रेम एकतरफा होता है। दो विपरीत स्थितियों को हम एक साथ देख सकते हैं। सहशिक्षा बढ़ने और जीवन शैली में आधुनिकता का बोलबाला होने के साथ ही हम देख सकते हैं कि आम लड़कियों में जहां अपने जीवन और उसके निर्णयों के प्रति जागरूकता बढ़ी है, उसके ठीक समानांतर लड़कों में उनके वजूद को लेकर एक नकार की भावना पनप रही है। आज जहां लड़कियां हर क्षेत्र में अपनी योग्यता का परचम लहरा रही हैं, वहीं लड़कों के मन उनके प्रति असहिष्णुता और दुर्भावना का एक अनुत्तरित भंडार है। लड़कियां करियर, प्रेम और शादी जैसे मसले पर स्वयं निर्णय लेने और नापसंदगी को जाहिर करने में अपनी झिझक से बाहर आ रही हैं और लड़कों को उनका यही रवैया सबसे नागवार गुजर रहा है। अगर थोड़ा पीछे जाएं तो आज से पच्चीस-तीस साल पहले तक ऐसे अटैक लड़कियों पर नहीं हुआ करते थे, फिर आज ये इस कदर क्यों बढ़ गये हैं? क्योंकि यह असहिष्णुता से उपजा प्रतिकार है, हिंसा है। लड़कों को लड़कियों से “न” सुनने की आदत नहीं है। लड़की होकर इनकार करने की हिम्मत कैसे हुई उसकी? इसे प्रेम निवेदन या सेक्स निवेदन करने वाला लड़का या किसी भी उम्र का मर्द अपनी हेठी समझता है और प्रतिहिंसा के लिए उतावला हो उठता है।
भारत में आम जनता पर सिनेमा का कितना प्रभाव रहा है और किस तरह सिनेमा आम वर्ग की मानसिकता का निर्माण करता है, इसे भूलना नहीं चाहिए। नब्बे का दशक उदारीकरण और मुक्त बाजार का दौर रहा। इस दशक की शुरुआत में हॉलीवुड में कुछ ऐसी फिल्में आती हैं, जिसमें एक डरी हुई औरत हमारे भीतर उत्तेजना और सनसनी फैलाती है। “स्लीपिंग विथ द एनिमी” में जूलिया रॉबर्ट्रस का चरित्र हिंदी सिनेमा को इतना रास आया कि इस प्रवृत्ति‍ पर कई अनुगामी फिल्मों की कतार लग गयी और उनमें से अधिकांश ने बॉक्स ऑफिस पर झंडे गाड़े। इन सभी फिल्मों में उत्सर्ग और त्याग, समर्पण और विसर्जन की भावनाओं की जगह अधिकार, कब्जा जताना और हासिल करना बुनियादी विशेषताएं थीं। इस एंटी हीरो ने खलनायक के सारे दुर्गुणों के प्रति स्वीकार्यता और समर्थन का माहौल बनाया। शाहरुख खान की कई फिल्मों – बाजीगर, डर, अंजाम, अग्निसाक्षी आदि ने प्रेम को हिंसा में बदलने वाले जार्गन का विस्तार किया और एक खलनायक की सारी बुराइयों के बावजूद दर्शकों की पूरी सहानुभूति को बटोरा। बेशक अंत में उसे मरते हुए दिखाया गया, पर उसकी मौत ने दर्शकों के मन में टीस पैदा की। मौत को भी महिमामंडित किया गया। दिल एक मंदिर और देवदास जैसी फिल्मों के भावनात्मक प्रेम की यहां कोई जगह नहीं थी। फिल्मों से भारतीय मानस का एक बड़ा वर्ग प्रभावित होता है और वह हुआ। युवा पीढ़ी के जीवन में ये खलनायकी प्रवृत्ति‍यां बगैर किसी अपराध बोध के शामिल हो गयीं। उसके लिए किसी तर्क की जरूरत नहीं थी। अगर शाहरुख खान जूही चावला को दहशत के चरम पर पहुंचाकर अपने प्रेम की ऊंचाई और गहराई का परिचय देता है और हिंसक होने के बावजूद नायक से ज्यादा तालियां और सहानुभूति बटोर कर ले जाता है, तो आम प्रेमी ऐसा क्यों नहीं कर सकता। टी शर्ट पर “आइ हैव किलर इंस्टिंक्ट” और “कीप काम एंड रेप देम” जैसे नेगेटिव जुमले फहराने वालों की जमात में इजाफा हुआ। “वी लव आवर वेजाइना” के जवाब में “वी सपोर्ट योर वेजाइना” की जमात उभर कर सामने आयी।
यह जानना भी जरूरी है कि स्त्री के संबंध में हमारा सामाजिक पर्यावरण कैसा है और उसमें लोकतंत्र की सभी संस्थाएं, विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका स्त्री के प्रति व्यवहार की कैसी नजीर पेश कर रही हैं? इससे हमारे युवा किस तरह की सीख ले रहे हैं? इसे हम कुछ सामान्य उदाहरणों के माध्यम से समझ सकते हैं। कार्यस्थल पर यौन-शोषण और दुर्व्यवहार भारत में एक जाना-पहचाना मामला है। आमतौर पर स्त्रियां इससे बचती हुई अपनी आजीविका को बचाने की जुगत में लगी हैं। अमूमन वे या तो चुप्पी साध लेती हैं या समझौता करते हुए वहां बनी रहती हैं। लेकिन जो इस मामले के खिलाफ खड़ी होती हैं और इसे बाहर ले जाने का साहस करती हैं, उन्हें सबसे अधिक खामियाजा सामाजिक रूप से भोगना पड़ता है। चरित्र-हत्या और कुप्रचार के सहारे उन्हें इतना कमजोर कर दिया जाता है कि वे अक्सर अपनी लड़ाई अधूरी छोड़ देती हैं या बीच में ही थक कर बैठ जाती हैं। इसका सबसे नकारात्मक असर यह है कि जन-सामान्य, स्त्री के प्रति हुए अन्याय के खिलाफ खड़े होने की जगह, अपनी धारणा में उसे ‘चालू’ मान लेता है। यही धारणा लगातार विकसित होती रहती है जो अपने जघन्य रूप में स्त्री के प्रति अपराध को रोजमर्रा की एक सामान्य सी घटना बना देती है।
ऐसी स्थिति में पत्रकारिता अपना दायित्व निभा रही है या सबकुछ बाजार की भेंट चढ़ गया है। मांग पूर्ति के नाम पर कुछ भी परोसा जा रहा है। जैसे छोटे परदे पर सास बहू और विवाहेतर संबंधों और कुटिल स्त्रियों के महिमामंडित चरित्र दिखाकर यह कहा जाता है कि टीआरपी की मांग यही है, वैसे ही ये महिला पत्रिकाएं अपनी साठ पन्नों की पत्रिका में छह पन्ने भी स्त्री की त्रासदी के प्रति घरेलू गृहिणियों को जागरूक बनाने के लिए यह कहकर नहीं देतीं कि घरेलू औरतों की इन सबमें कहां कोई दिलचस्पी है। स्त्रियों के लिए ऐसी भयावह स्थितियों के बीच, हमारी रंगीन महिला पत्रिकाएं अपना नैतिक दायित्व भूलकर कब तक सेक्सी दिखने के तौर तरीके ही बाजार के नाम पर उस समाज के बीच परोसती रहेंगी, जहां हर दिन बच्चियों पर बलात्कार और युवा लड़कियों पर तेजाबी हमले हो रहे हैं। इन दो दुनियाओं में इतनी बड़ी खाई क्यों है और इसे पाटने का क्या कोई रास्ता है?
पुलिस थानों और अदालतों में स्त्री के संबंध में संवेदनहीन रवैया मौजूद होना आम बात है। अपराधी वहां अपने पैसे और प्रभाव के बल पर पुलिस और क़ानून को अपने प्रति सहृदय बनाने की कोशिश करता है और अक्सर स्त्री को झूठी साबित कर दिया जाता है। हमारी युवा पीढ़ी में पैसे और प्रभाव का बोलबाला बढ़ा है। बेशक यह सब ऊपर से नीचे लगातार प्रसारण करता रहता है। लिहाजा कानून का उसे डर नहीं। जहां हर चीज पैसे से खरीदी जा सकती हो, वहां पुलिस, न्याय व्यवस्था सब कुछ अपनी मुट्ठी में नजर आता है, फिर डर किसका? कई समृद्ध, रसूख वाले पूंजीपति या राजनेताओं के अपराध के मामलों को जिस तरह पैसे के बूते दबा दिया जाता है और गवाहों को खरीद लिया जाता है, उसके बाद इस वर्ग की मनमानी और बढ़ जाती है।
इन घटनाओं की क्रमवार शृंखला से निजात पाने के लिए जनता का एक बड़ा वर्ग कड़े कानून की मांग कर रहा है लेकिन हमें इस विषय पर गंभीरता से विचार करना होगा कि अगर हमारी राजनीति और अर्थव्यवस्था सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर हरसंभव पशुता को ही बढ़ावा दे रही है तो मात्र कानून इस प्रवृत्ति से छुटकारा नहीं दिला सकता। हमें उस बिंदु तक पहुंचना होगा जहां से ये सारी चीजें संचालित और नियंत्रि‍त हो रही हैं। अगर सत्ता के करीबी वर्ग में जड़ जमा चुकी गड़बड़ियां, नीचे और हाशियाई वर्गों में फैलेंगी तो उसका परिणाम भयावह होगा ही। निश्चित ही लड़कियां हर कहीं इन स्थितियों की सबसे आसान शिकार (सॉफ्ट टारगेट) हैं।
हत्‍या के सभी औजारों में सबसे सस्‍ता, घातक और आसानी से उपलब्‍ध हथियार है – एसिड। तीस रुपये में एक बोतल मिल जाती है और आम तौर पर ऐसे तेजाबी हमला झेलने वालों की जिंदगी की भयावहता और बाकी की त्रासद जिंदगी के लिए लगातार हीनभावना, घुटन में जीने के बावजूद हमला करने वाले को हत्‍यारे की श्रेणी में नहीं रखा जाता। ज्‍यादा से ज्‍यादा दस साल की सजा और दस लाख जुर्माने का प्रावधान है, जबकि तेजाबी हमले से विरूपित चेहरे की प्‍लास्टिक सर्जरी का खर्च तीस लाख से ज्‍यादा होता है। सबसे पहले जरूरी है कि एसिड की खुली बिक्री पर फौरन प्रतिबंध लगाया जाए। किसी भी लड़की को दैहिक, मानसिक और सामाजिक यातना से ताउम्र जूझने के लिए बाध्‍य करने वाले इस अपराध को क्रूरतम अपराध की श्रेणी में ही रखा जाना चाहिए। बांग्‍लादेश में सन 2002 में Acid Control Act 2002 और Acid Crime Prevention Acts 2002 के तहत एसिड की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने के बाद तेजाबी हमलों का प्रतिशत एक चौथाई रह गया है। हमारे देश की न्‍याय व्‍यवस्‍था, इन तेजाबी हमलों और इसके साथ अपना सब कुछ गंवाती लड़कियों के कितने आंकडों के बाद एक सख्‍त कदम उठाने की दिशा में कदम बढ़ाएगी?

Saturday, June 01, 2013

दिमाग़ और समझ से ही जीवन नहीं चला करता

सिर्फ़ पैसे के लिए कोई भी काम करना मेरा दिमाग सही नहीं मानता।...आर्थिक जुगाड़ खुद का है नहीं अब रक।...मेरा दिमाग, मेरी समझ सब मुझे वैसे काम करने से रोकते हैं जहां साम्राज्यवाद हो। क्षेत्र ही नहीं समझ आता मुझे।...

अर्थ के बगैर कैसा आर्थिक जुगाड़। इस अंतर्विरोध से तो पार पाना ही होगा कि हमें इस व्यवस्था में रहते हुए ही इसके परिवर्तन का ताना-बाना बुनना पड़ता है।
हर कोई अच्छी तरह जानता है कि सिर्फ़ दिमाग़ और समझ से ही जीवन नहीं चला करता। जीवन तात्कालिक परिस्थितियों के दायरे में जीवनोपयोगी आवश्यकताओं की पूर्ति से चला करता है, और दिमाग़ तथा समझ इन परिस्थितियों को और अधिक बेहतर बनाते जाने को प्रयत्नशील रहते हैं। पहली स्थिति हो सकता है दिमाग़ और समझ के माकूल नहीं हो, परंतु दूसरी स्थिति के लिए आधार है, उसके मूल में हैं। इसीलिए इसको छोड़ा या लांघा नहीं जा सकता, इसके साथ भी अपने दिमाग़ की चिरपरिचित संघर्षशीलता के साथ ही जूझना होगा।
मुद्रा, पैसा आधारभूत रूप से, श्रम उत्पादों की विनिमय क्षमताओं के प्रतीक हैं। ये संचित श्रम का ही एक रूप हैं। यानि हम सामाजिक श्रम विभाजन की एक व्यवस्था में, अपना एक निश्चित श्रम-योगदान करते हैं और बदले में अपने जीवनोपयोगी श्रम-उत्पादों का विनिमय कर सकने के लिए कुछ मुद्रा, पैसा पाते हैं।
व्यवस्थाओं का सारा गणित इसी सामाजिक उत्पादन और उसके वितरण के तरीकों पर टिका हुआ रहता है। अभी यह प्रक्रिया ठीक नहीं है, श्रम-योगदान के अवसर सभी को उपलब्ध नहीं है, उसके श्रम-अवदान की तुलना में मिलने वाला मुद्रा प्रतिदान सही अनुपात में नहीं है, किसी को जरूरत भर भी नहीं मिल पा रहा और कुछ हड़पने की अश्लीलताओं में हैं, अभी एक बड़ी श्रम-शक्ति को समाज की आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उत्पादन में लगाने की बजाए मात्र कुछ समूह-वर्ग विशेषों की सुख-सुविधाओं के उत्पादन में झौंका हुआ है, आदि-आदि।
अभी यह ग़लत है, फिर भी आखिर तो मानव-समाज की जीवनीय आवश्यकताओं की पूर्ति इसी से हो रही है। श्रम-अवदान से उत्पन्न पूंजी का बड़ा हिस्सा अभी बुर्जुआ वर्ग द्वारा हड़पा जा रहा है, पर जो भी हिस्सा समाज के एक बडे हिस्से के हाथ में आता है, उनका जीवन इसी से चल रहा है। दिमाग और समझ वाले मानव-श्रेष्ठों को वितरण में न्याय पैदा करने की जरूरत महसूस होती है, इस प्रक्रिया को बेहतर बनाने की आकांक्षाएं होती है, पर यह थोडे ही ना है कि इसे खत्म ही कर देना है, रोक देना है, इससे बचना है, दूर हो जाना है।
ठीक है हमारी पक्षधरताएं शोषित पक्ष के साथ जुड रही हैं, तो हम अपने श्रम-अवदान के लिए, जीवनोपयोगी पूर्ति लायक ही प्रतिदान चुनें, उसे अश्लील स्तर तक ना ले जाएं। परंतु सामाजिक श्रम-विभाजन की व्यवस्था में हमें अपना समुचित योगदान तो देना ही होगा, ताकि उत्पादन प्रक्रिया से जुड-कर हम अपने लिए आवश्यक साधन जुटा पाएं, और साथ ही अपनी पक्षधरता वाले वर्ग के लिए उस छोटे से हिस्से की आपूर्ति में भी योगदान कर पाएं जो कि इस शोषण-प्रक्रिया से गुजरकर उनके हिस्से तक पहुंच पाती है।
कहने का मतलब यह है कि हो सकता है हमारे योगदान के एक बड़ा हिस्सा पूंजीपति और साम्राज्यवादियों की जेब में जा रहा है, परंतु एक छोटा हिस्सा ही सही, हमारी और हम जैसों की आवश्यकताओं की पूर्ति में भी काम आ रहा है। इसलिए जिस भी तरह का जुगाड़ हो पा रहा है करिए, अगर चुनाव के विकल्प मौजूद हैं तो अधिक बेहतर यानि कम खराब विकल्प चुनिएं, सामाजिक उत्पादन और सेवाओं में अपना योगदान दीजिए, और इस प्रक्रिया का अंग बनकर, शोषकों के तबकों के आधार कमजोर कीजिए, उनकी कब्र खोदने के संघर्ष में जुडिए।
नौकरियां, चाहें सरकार के जरिए हों या निजी पूंजिपतियों के ज़रिए, उत्पादन अंतत समाज के काम ही आना है। शिक्षक को सरकार लगाए या निजी व्यक्ति, उसे पढ़ाना तो इसी समाज के बच्चों को है। कहीं ना कहीं, अंत में जाकर हर प्रक्रिया समाज की आवश्यकताओं से जुड़ती है। अभी की व्यवस्था में जैसी भी परिस्थितियां हैं, जिस भी तरह के रोजगार के अवसर हैं, समाज इन्हीं के हिसाब से अपनी उत्तरजीविता सुनिश्चित करता है। हम भी इसी समाज के अंग हैं, और इसकी इन प्रक्रियाओं से अपने-आपको विलग नहीं रख सकते। हमारी यही भागीदारी हमें संघर्ष की प्रक्रियाओं से जुड़ने और चलाते रह पाने की उर्जा प्रदान करती है। सामाजिक उत्पादन की इस प्रक्रिया से विलगाव अंततः इसे न्यायपूर्ण करने के संघर्षों से विलगाव ही है। हमारे द्वारा अपने व्यक्तिगत आदर्शों और मान्यताओं को, समाज से ऊपर मान लेना भी एक तरह का बौद्धिक-विलास, एक तरह से अपने अहम की पराकाष्ठा ही है जो किसी भी तरह से समाजोपयोगी नहीं हो सकती।

Saturday, May 11, 2013

आम आदमी की सुनो ललकार !


आम आदमी की सुनो ललकार 
खो चुकी है अस्तित्व ये सरकार 
अब न सहेंगे अब न झुकेंगे
यही है आम आदमी की पुकार 
बहन-बेटियों की बहुत खो चुके इज्ज़त 
अब बर्दाश्‍त न होगी ये सरकार 
आम आदमी की सुनो ललकार 
बहुत बहा चुकी उलटी गंगा ये सरकार 
अब आम आदमी करेगा
भ्रष्‍टाचारियों का संहार  
कोयला बेचा, 2जी बेचा, चारा खा गए चारागर 
अब न सहेंगे अब ना झुकेंगे
यही है आम आदमी की पुकार 
उखाड़ फेंक देंगे यह देश की दुश्‍मन सरकार 
फिर आम आदमी की होगी सरकार 
हज़ारो घोटाले करके भी भरा न जिसका पेट
ऐसी है हमारी सरकार 
निर्लज्‍ज अपंगता की है उदाहरण ये सरकार 
आम आदमी कैसे करे बर्दास्त ऐसी सरकार 
हमें चाहिए अपना राज यानी चाहिए स्‍वराज 
आम आदमी की है यही पुकार 
छोड़ भी दो अब तो ये गद्दी सरकार
नहीं चाहिए अब तुम्हारे  झूठे परोपकार 
अब नौजवानों की पीढी ही चलाएगी सरकार 


देश बेचने के मूड में हो तुम तो सरकार 
आम आदमी नहीं करेगा बर्दास्त अब और अत्याचार 
समय रहते सुन लो ओ गूंगी बहरी सरकार 
अब  न सहेंगे अत्याचार  
अब न सहेंगे बलात्कार 
अब न सहेंगे भ्रष्‍टाचार  
अब है आम आदमी की यही पुकार  
आम आदमी की सुन लो ललकार 
जय जवान 
जय किसान 
जय विज्ञान 
हो नारी उत्‍थान  
रचनाकार मुल्कराज सिंह

Tuesday, April 23, 2013

हिन्दू मंदिर में मुस्लिम महिला की पूजा

अहमदाबाद। अहमदाबाद से चालीस किलोमीटर की दूरी पर 'झूलासन' नाम का एक गाँव है।  ये गाँव अंतिरक्ष यात्री सुनीता विलियम्स के पिताजी का पैतृक गाँव है। इस पहचान के अलावा इस गाँव की एक और खासियत है। यहाँ पर एक मंदिर है और शायद यह एक अकेला हिन्दू मंदिर है, जिसमें मुस्लिम महिला की पूजा की जाती है।

कहा जाता है कि 250 साल पहले 'डोला' नाम की एक मुस्लिम महिला ने उपद्रवियों से अपने गाँव को बचाने के लिए उनसे बहुत ही वीरतापूर्वक लड़ाई की और अपने गाँव की रक्षा करते हुए अपनी जान दे दी।  उनका शरीर एक  फू ल में परिवर्तित हो गया और उस फू ल के ऊपर ही इस मंदिर का निर्माण किया गया।

अभी हाल में ही इस गाँव के अमीर निवासियों ने इस मंदिर को और भी भव्य बनाने के लिए चार करोड़ रुपये की राशि इकट्ठा की है। झूलासन केलवानी मंडल के अध्यक्ष रजनीश वाघेला बताते हैं कि इस मंदिर में कोई मूर्ति या कोई तस्वीर नहीं है। एक पत्थर का एक यंत्र (जो ताबीज़ हो सकता है) है और उसके ऊपर साड़ी डालकर पूजा की जाती है। इस मंदिर को 'डॉलर माता' का मंदिर भी कहा जाता है क्योंकि 7000 की जनसंख्या वाले इस गाँव के 1500 निवासी अब अमेरिका के नागरिक हैं। सुनीता विलियम्स जब अन्तरिक्ष यात्रा पर गयीं तो उनकी सुरक्षित वापसी के लिए इस मंदिर में एक अखंड ज्योति जलाई गयी जो चार महीने तक लगातार जलती रही। धर्म के नाम पर जितनी राजनीति होती है और जितनी बहसें, जितने मनमुटाव, ऐसे में एक गाँव में सीधे-सच्चे मन वाले लोगों ने बिना किसी का धर्म देखे उसके कर्मों को सराहा है। उसकी वीरता के लिए उसके बलिदान को याद करते हुए उसकी याद में एक मंदिर ही बना लिया है और अपनी कृतज्ञता उसकी पूजा करके व्यक्त करते हैं।

गाँव से निकलते ही बदल जाते हैं जाति और पेशा!



गाँव एक तेज़ी से बदलती हुई मानवीय बसावट है। शहरों में बैठकर लोग अक्सर गाँव को किसी कालखंड में फं सी हुई नाव की तरह देखते हैं। जिसके नीचे से पानी तो सरकता जा रहा है, मगर नाव वहीं की वहीं है। ऐसा नहीं है। हर स्तर पर गाँव बदल रहे हैं। ये गतिशीलता शहरों की तरह है। देशभर में लाखों लोग हर साल अपना गाँव छोड़ दे रहे हैं। गाँव से बाहर जाते ही उनका रोजग़ार जातिगत या पारंपरिक पेशे की ज़द से बाहर निकल कर बदल जाता है। आज किसी गाँव में वहां रहकर और वहां से बाहर गए लोगों के काम की सूची बनाई जाए तो कमाल की विविधता और अदल-बदल की जानकारी मिलेगी। जिससे एक निष्कर्ष यह भी निकलेगा कि भेदभाव और पेशे के आधार पर जातिगत पैमाने में काफ ी परिवर्तन हुआ है। इसका मतलब यह कत्तई नहीं कि जात-पात या छूआछूत खत्म हो गया। लेकिन ये दोनों तत्व ही गाँव की एकमात्र सच्चाई नहीं हैं।

 मैं जहां रहता हूं, वहां बन रही बड़ी-बड़ी इमारतों में काम करने वाले मज़दूरों को अक्सर देखता रहता हूं। ये सभी अलग-अलग गाँवों या राज्यों से आए लोग हैं। इन सबके बीच पहली बार काम को लेकर समानता बन रही है। जिसका संबंध इनके जातिगत पेशे से बिल्कुल नहीं है। इंदिरापुरम की एक इमारत से सटे कई छोटे-छोटे अस्थायी घर बने हैं जिनमें मज़दूर या उनके परिवार रहते हैं। ये अस्थायी घर बसते हैं और इमारत बनने के बाद उजड़ जाते हैं। उसके करीब से गुजऱते वक्त देखता हूं कि सब एक ही प्रकार की स्टील की थाली में खाना खा रहे होते हैं। चावल और उसके ऊपर आलू की रसदार सब्ज़ी। गाँव में खान-पान का जातिगत अंतर यहां समाप्त हो चुका है। सबका खाना एक जैसा है। एक साथ खाना है। वे दिन गए जब शादी ब्याह में जाति के टोलों के हिसाब से खाने की पंक्ति बनती थी। ये सारे अनुभव हमारी पहचान को नए सिरे से गढ़ रहे हैं या नहीं, इसका अध्ययन होना चाहिए। हो भी रहे होंगे। बड़ी संख्या में लोग इमारती मज़दूर बन रहे हैं। सवर्ण जाति के लोग भी इनमें शामिल हैं। उसी तरह शहरों में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी ने भी जातिगत आधार में फेरबदल का मौका दिया है।

कई ऐसे काम हैं जो गाँव में जाति के हिसाब से करते थे शहर में आप उसे मजदूरी के हिसाब से करते हैं। और यह बदलाव सिर्फ  शहरों में नहीं हो रहा है। गाँवों में भी हो रहा है। पेंग्विन प्रकाशन से एक दिलचस्प किताब आई है। दर-दर गंगे। हर-हर गंगे का मंत्र जप कर हम गंगा के साथ क्या कर रहे हैं इसकी कहानी है। अभय मिश्र और पंकज रामेंदु नाम के दो युवकों ने गंगोत्री से गंगासागर तक की यात्रा कर गंगा की व्यथा कथा लिखी है। इस किताब में उत्तर प्रदेश के गढ़मुक्तेश्वर का जिक्र है। गंगा पर लिखी यह एक बेहतरीन किताब है। अभय और पंकज लिख रहे हैं कि 'गंगा में जैसे-जैसे पानी कम होता गया वैसे-वैसे लोगों में क्षुद्र मानसिकता पनपती गई। जिन पुरोहितों को नाव में बैठा कर मल्लाह यहां आए हुए लोगों को मोक्ष दिलवाने में मदद किया करते थे बीते दस सालों में उन्हीं पुरोहितों को पीछे छोड़ मलकू सहित कई दूसरी जातियों ने अपनी दादागिरी से यहां पंडागीरी शुरू कर दी है। कुछ पेट की आग से पुरोहित बन गए तो कुछ को लालच ने झुलसाया।'

मैं अभय और पंकज की इस बात से सहमत नहीं हूं कि जो भी हुआ वो क्षुद्र मानसिकता के तहत हुआ। समाज में अल-अलग दौर में इसी तरह से पेशे बदलते रहे हैं और पेशे के साथ जातियां बदलती रही हैं। जऱा कल्पना कीजिए पुरोहिती का काम करते करते मल्लाहों की चार पांच पीढ़ी निकल जाएंगी तो वे खुद को ब्राह्मण या केवट ब्राह्मण कहेंगे या नहीं। क्या हमारी जातियों में कई इसी तरह से पहले नहीं गढ़ी गई हैं। एक बदलाव यह भी देखिए कि हम जिस पर आश्रित रहते हैं उसके कमज़ोर पड़ते ही पेशे किस तरह से बदल जाते हैं। गंगा सूख गई तो गंगा पर आश्रितों के पेशे बदल गए। गाँव में रोजग़ार के अवसर कम हुए तो गाँववालों ने शहर में जाकर जाति के हिसाब से काम नहीं ढूंढ़ा। कई लोग कहते हैं कि शादी का न्योता देने के लिए नाऊ नहीं मिल रहे हैं। लेकिन यह भी तो पता कीजिए कि वे नाई या नाऊ इनदिनों कहां हैं और क्या कर रहे हैं। क्या पता इनमें से कोई दिल्ली या मुंबई जैसे शहरों में कर्मकांड में पारंगत होकर पुरोहिती का काम कर रहा हो। या फि र ठेले पर आम और अंगूर लादे बेच रहा हो।

अब सवाल यह है कि क्या जाति भी बदल रही है। अलग-अलग संदर्भों में यह भी हो रहा है। मल्लाह का पुरोहित होना सिर्फ  पेशे का अदल-बदल नहीं जातियों की भी अदला-बदली है। गाँवों में खेतिहर मज़दूरों में औरतों की बढ़ती संख्या अलग तरीके से पारंपरिक ढांचे को तोड़ रही है। औरतों का अपने घर के पास यह अनुभव जल्द ही उन्हें दुनिया के बाकी हिस्सों में ले जाने के लिए प्रेरित करेगा। जैसे बंगाल और झारखंड से बड़ी संख्या में औरतें दिल्ली, मुंबई बंगलुरू के घरों में काम करने के लिए निकल रही हैं। इन राज्यों और समाजों में श्रम में औरतों को पहले से एक बराबरी हासिल है। जैसे ही पलायन का यह दूसरा दौर उत्तर भारत के गाँवों से शुरू होगा ग्रामीण सामाजिक संबंध दूसरे तरीके से बदलेंगे। तकनीकी का आगमन होगा और खेती और किसानी करने वाले कोई और होंगे। इसलिए हमारे समय के इस दौर को इस चश्मे से न देखें कि कुछ नहीं हो रहा है। हमारे संबंध तेजी से बदल रहे हैं। गाँव उससे भी तेज़ गति से।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

ठेले पर क्लीनिक, चार मरीज और सिर्फ एक टेढ़ी सुई!


ठेले पर क्लीनिक, चार मरीज और सिर्फ एक टेढ़ी सुई!

शाहपुर (लखनऊ)। नीले रंग का फ्रॉक पहने एक बच्ची तेज बुखार की वजह से बेसुध पड़ी थी। डॉक्टर का इंतजार करते हुए बच्ची की 9 साल की बड़ी बहन ने उसके माथे पर सफेद रंग का गीला कपड़ा रखा हुआ था। कुछ ही देर में डॉक्टर साहब वहां आए और बुखार से तप रही बच्ची को इंजेक्शन लगा दिया।

यह नज़ारा किसी हॉस्पिटल का नहीं है। बच्ची भी किसी बिस्तर या स्ट्रेचर पर नहीं बल्कि एक लकड़ी की तिपहिया ठेलिया पर लेटी थी। जिसपर अपना सामान लादकर डॉक्टर साहब बाजार के दिन अपनी दुकान लगाने आते हैं।

लखनऊ के दक्षिण में महज 25 किमी की दूरी पर एक गॉँव है शाहपुर। जिसके चौराहे पर हर बृहस्पतिवार और रविवार की शाम को लगने वाली बाजार में सब्जी और कपड़ों के साथ ही, डॉक्टरों की भी मंडी लगती है।

बाजार के दिन यहां चार-पांच लोग अपनी छोटी-सी मेज पर सस्ती दवाईयों की कुछ बोतलें और पैकेटें सजा कर बैठते हैं और लोगों का इलाज करते हैं। अपने-आप को डॉक्टर कहने वाले इन लोगों में से कुछ तो अगल-बगल गॉँव के ही हैं। इन्होंने ना तो कोई डिग्री ली है और न ही ट्रेनिंग। फिर भी गॉँव वाले अपनी बीमारी लिए इन्हीं के पास आते हैं। कारण पूछने पर शाहपुर निवासी, 38 साल के पवन कुमार कहते हैं, च्च्सरकारी अस्पताल यहां से 10 किमी दूर है और वो भी वहां कोई मिलता नहीं। अब हमको बिटिया के बुखार की दवाई लेनी है। इनसे न लें तो कहां जाएं।ज्ज् पवन ने जिस अस्पताल का जिक्र किया, वो शाहपुर से 10 किमी की दूरी पर स्थित इटौंजा कस्बे में है।

दरअसल सरकारी मानकों के अनुसार दो प्राथमिक केन्द्रों के बीच की दूरी 10 किमी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। जिसे मानते हुए प्रशासन ने शाहपुर के 10 किमी के दायरे में आने वाले क्षेत्र, जैसे कुम्हरावां, महोना और गोधना में स्वास्थ्य केंद्र बनवाए हैं। पर संसाधनों की कमी के चलते ये अस्पताल ज्यादातर बंद ही रहते हैं।

राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य योजना (एनआरएचएम) की एक रिपोर्ट के मुताबिक यूपी में 5823 स्वास्थ्य उप-केन्द्रों और 700 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की कमी है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि प्रदेश के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों के लिए सोलह सौ से ज्यादा डॉक्टरों की कमी है। अस्पतालों में नर्सों और टेक्नीशियनों की बहाली करने की भी जरूरत है।

इस बारे में जब गॉँव कनेक्शन संवाददाता ने लखनऊ के सीएमओ डॉ. एसएनएस यादव से फोन पर बात करने की कोशिश की तो उन्होंने कहा, च्च्भाई अब ऐसे तो हम नहीं बता पाएंगे, आप हमें और डीएम को लेटर लिखकर दीजिए तब देखेंगे इस मामले में।ज्ज्

बाजार में बैठने वाले डॉक्टरों में से एक हैं श्रीराम। जिस गॉँव की बाजार में अपनी डॉक्टर की दुकान लगाते हैं, वहां के पूर्व प्रधान भी रह चुके हैं। इस नाते सब इन्हें दद्दू बुलाते हैं।

बाजार के कोने में बड़े से पेड़ के नीचे, सफेद रंग की प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठे श्रीराम को लोगों ने चारों तरफ से घेरा हुआ है। उनके आगे दवाईयों की मेज पर एक टेढ़ी सूई वाला इंजेक्शन रखा हुआ है जो पिछले आधे घंटे में चार लोगों की मर्ज का इलाज कर चुका है।

उसी भीड़ में से लाल साड़ी पहने हुई, फू लमती (29) नाम की महिला अपना हाथ दिखाते हुए श्रीराम से पूछती हैं, च्च्दद्दू मेरी उंगली दर्द करती है?ज्ज् फुट भर की दूरी से ही देखकर श्रीराम जोर से बोले, च्च्पांच इंजेक्शन लगेंगे, और कोई दवा नहीं है इसकी। बताओ?ज्ज् थोड़ा झिझकते हुए फू लमती फि र पूछती हैं, च्च्कौन सी बीमारी है यह?ज्ज् श्रीराम बोले, च्च्खून का दौडऩा कम है। इलाज नहीं हुआ तो कहो पहले हाथ में जकडऩ हो, फि र पूरे शरीर में।ज्ज्

श्रीराम की ही तरह बाजार में एक और डॉक्टर हैं प्रेम चन्द्र। इनके गले में आला है और आंखें ग्राहक तलाश रही हैं। तभी एक महिला अपने पति के साथ आती हैं। महिला की उम्र ज्यादा नहीं है, लेकिन कमजोरी और बीमारी की वजह से उसके गले से आवाज मुश्किल से ही निकल पा रही थी। इसीलिए बगल में बैठा महिला का पति बीमारी के बारे में बताता है। जांच-पड़ताल के बाद डॉक्टर साहब कहते हैं, च्च्इन्हें तो टॉयफायड है।ज्ज् फि र उन्हें बिना किसी नाम-नम्बर की एक पर्ची, दवाईयां लिखकर थमा दी जाती है। बदले में अच्छी-खासी फीस ऐंठ ली जाती है। कमोबेश यही हाल बाजार में बैठे बाकी के झोलाछाप डॉक्टरों की मेजों पर भी था।

अशिक्षा और स्वास्थ्य केन्द्र जैसी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में गॉँव वालों के पास इन फर्जी डॉक्टरों के पास जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता, जिसका ये लोग भरपूर फायदा उठाते हैं।

अपनी सफाई में श्रीराम कहते हैं, च्च्हम कोई हार्ड ऐन्टिबायोटिक नहीं रखते हैं। हमारे यहां मरीज सही भले ही न हो पर उसको रिएक्शन नहीं होता। और कोई सीरियस केस होता है तो उसको शहर रेफर कर देते हैं।ज्ज् डॉक्टरी की मान्यता के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं, च्च्साल तो याद नहीं पर वही कुछ 2008 या 2009 में स्वरोजगार योजना के अन्र्तगत, स्वास्थ्य कार्यकर्ता की टे्रनिंग ली थी।ज्ज्

जिन साहब को अपने ट्रेनिंग का साल तक नहीं याद उनके हाथ में मरीजों की पूरी जिंदगी है। अपनी पैरवी करते हुए आखिर में श्रीराम कहते हैं, च्च्सही कौन है आजकल यहां से लेकर बख्शी का तालाब तक सब हमारी तरह चोर ही मिलेंगे आपको।ज्ज्

Thursday, April 18, 2013

Ab Tere Bin Ji lenge Hum ~ Aashqui [ HQ ]

क्या हुआ जो एक दिल टूट गया अब तेरे बिन जी लेंगे हम ज़हर ज़िन्दगी का 
पि लेंगे हम !!

Monday, April 15, 2013

बराबरी की दुनिया परिवार के भीतर से बने तो बेहतर!


साल 2013 के साथ महिलाओं की तरक्की का अध्याय तकरीबन अभी शुरू होता महसूस हो रहा था, और इस महिला दिवस के अलग मायने सेट करके सभी ने इस दिन के लिए तैयारी शुरू भी कर दी थी। दिल्ली गैंग रेप घटना के बाद जो सड़कों पर हुजूम उमड़ा, उससे यह साफ लगने लगा था कि मानो यह समाज ऐसी खौफनाक घटना के दोबारा न होने का वादा कर रहा हो। लेकिन एक के बाद एक अखबारों की सुर्खियों ने मानो गलतफहमी दूर कर देने का काम किया। छोटी बच्ची से दुष्कर्म, पंजाब में पुलिसवालों द्वारा एक युवती की बेरहमी से पिटाई के न्यूज चैनलों पर लगातार चलते वीडियो इस बात की गवाही दे रहे हैं कि भले ही अब सड़कों पर महिलाओं के हक में आवाज बुलंद होना शुरू हो गयी है लेकिन पुरुषवादी सत्ता को उखाड़ फेंकना अब भी बहुत दूर की बात है। क्योंकि जब तक समाज की इस जड़ पर जोरदार हमला नहीं होगा, तब तक किसी भी तरह के परिवर्तन की कामना करना हवा में तीर चलाने के ही बराबर साबित होगा। याद रहे भले ही सुरक्षा या कानून व्यवस्था का मामला उठाकर सरकार और पुलिस पर आरोप लगा दिये जाएं लेकिन याद रहे वह महिला जो पुलिस वालों के पास छेड़छाड़ की शिकायत करने आयी थी, उसे पीटने वाले वर्दीधारी भी इसी समाज का हिस्सा हैं। और उनका पालन पोषण और यहां तक कि ‘नैतिक शिक्षा‘ की जिम्मेदारी भी इसी समाज की है। इसलिए खाली पुलिस प्रशासन पर आरोप लगाना ठीक नहीं क्योंकि वे इस समाज का हिस्सा हैं।
liberated womenबात की गंभीरता समझने के लिए यह भी काफी होना चाहिए कि देश में गिरते लिंगानुपात को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी चिंता जतायी है। जब भी महिलाओं की दुर्दशा का प्रश्न उठाया जाता है तो अव्वल तो बोरिंग टॉपिक पर कौन अपने कान देता है। और अगर बात शुरू हो ही जाए तो तरह तरह के तर्क दिये जाते हैं कि महिलाएं आगे बढ़ तो रहीं हैं, आज उन्हें पढ़ने-लिखने, अपना करियर तक चुनने की आजादी है। माना कि है लेकिन आज भी जब शादी के लिए रिश्ते देखे जाते हैं, तो ‘जरूरत से ज्यादा पढ़ी लिखी‘ लड़कियों को अधिकतर रिजेक्ट कर दिया जाता है। फिर कहा जाता है कि लड़कियां तरक्की कर रही हैं, मन से अपनी जिंदगी जीने को स्वतंत्र हैं, लेकिन फिर वही बात आ जाती है कि ऐसी लड़कियों के लिए आदरणीय पुरुषवादी समाज ने किस किस तरह के नाम बनाये हैं, शायद बताने की जरूरत नहीं।
तो कुल मिलाकर मंथन की आवश्यकता इस बात को लेकर है कि आखिर नारी के किस रूप की तरक्की हो रही है, हमारे समाज में। आज यह बार बार सबको बताने की जरूरत पड़ती है किस तरह हमारे देश की लड़ाई में महिलाओं ने बराबर अंग्रेजों की लाठियां, गोलियां खायीं, रणभूमि में लड़ीं। और कुछ नहीं तो बार बार इतिहास बताने वाले इतिहास से ही सबक लेते तो भी था। आज भी दूर दराज के गावों में महिलाएं कभी शराब के ठेके हटवाने के लिए तो कभी पाकृतिक संपदाओं को बचाने के लिए पूरी तरह प्रयासरत हैं, लेकिन न मीडिया न ही आम लोग किसी का भी उनकी बहादुरी पर ध्यान नहीं गया। मगर विडंबना देखिए एक पोर्न स्टार जो एक दिन भारत आती है, तो वह इंटरनेट पर सबसे ज्यादा सर्च की जाने वाली महिला बन जाती है, हिंदी फिल्मों में इतना बड़ा ब्रेक ऐसे मिल जाता है जिसे पाने के लिए एक असल कलाकार की जिंदगी निकल जाती है। जहां आज भी आफिस में आमदनी को लेकर महिलाओं के साथ भेदभाव की बातें सामने आती हैं, वहीं एक आइटम नंबर करने वाली एक्ट्रेस करोड़ों के हिसाब से पैसे बटोरती है। यहां घड़ी की सुई की तरह बात घूम कर फिर वहीं आ गयी। इस पूरे सिलसिले में आपके उस भाषण का क्या, जिसमें आपने कहा था कि लड़कियां पढ़ने लिखने को, करिअर चुनने को स्वतंत्र हैं, क्योंकि आपके इस समाज में मेहनत करने वाली, समाज के लिए भलाई करने वाली औरतों की तो कोई जगह नजर ही नहीं आती।
जाहिर है समय और जरूरत‘ के हिसाब से पुरूष ने नारी के जिस रूप की कल्पना की उसी रूप की तरक्की स्वभाविक मानी गयी। गर्लफ्रेंड बनानी हो तो शहरी लड़की, जिसकी हर अदा में स्टाइल हो और स्टेटस सिंबल के हिसाब से एकदम परफेक्ट, लेकिन बस उससे शादी नहीं क्योंकि ऐसी लड़की को अपने मां बाप के सामने किस मुंह से लेकर जाएगा आदर्शवादी लड़का आखिर वह घर का एक जिम्मेदार लड़का है, इसलिए ऐसी लड़की केवल गर्लफ्रेंड बनने लायक बस उससे आगे शादी नहीं। फिर शादी की यदि बात आ जाए तो शादी के लिए हाउस वाइफ होनी चाहिए, आखिर घर बार देखना भी तो है। थके हारे घर पहुंचो तो कोई होना चाहिए कि बना हुआ खाना मिल जाए। यहां जिन जिन बातों का उल्लेख हुआ, वे भले ही एक बार को अजीब लगे लेकिन झूठ नहीं यह बात सभी जानते हैं।
जाहिर है कि यह समाज अब भी नारी के किस रूप की कल्पना करता है वह सामने है यहां हर कोई आज सरकार से कभी पुलिस प्रशासन से अपने हक को मांग रहा है। लेकिन असल बात यह है कि आपका हक इसी समाजिक व्यवस्था से मिलना है। और उसके लिए जरूरी है कि समाज की छोटी यूनिट परिवार से इसकी शुरुआत की जाए। जहां महिला पुरुष दोनों को बराबरी का दर्जा हो।
स्वामी विवेकानंद ने इस देश की तरक्की में ठहराव का एक कारण महिलाओं के प्रति अत्याचार बताया। समय बीत गया लेकिन महिलाओं के प्रति दोयम दर्जे की भावना पर लगाम नहीं लग पायी। समाज में आ रही अव्यवस्था को कम से कम अब इस समज को समझना होगा, और यह तब होगा जब हम नारी को उसके काम के लिए उसको प्रोत्साहन देने के साथ साथ उसकी बहादुरी और समाज के प्रति कर्मठता को सलाम करेंगे और निजी जिंदगी में भी उसकी कद्र करेंगे। तभी सही मायने में महिला दिवस मुकम्मल माना जाएगा।

मैं गाजियाबाद में रहता हूं, आपको कोई दिक्‍कत है?


♦ रवीश कुमार
महानगरों में आपके रहने का पता एक नयी जाति है। दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों में जाति की पहचान की अपनी एक सीमा होती है। इसलिए कुछ मोहल्ले नये ब्राह्मण की तरह उदित हो गये हैं और इनके नाम ऋग्वेद के किसी मंत्र की तरह पढ़े जाते हैं। पूछने का पूरा लहजा ऐसा होता है कि बताते हुए कोई भी लजा जाए। दक्षिण हमारे वैदिक कर्मकांडीय पंरपरा से एक अशुभ दिशा मानी जाती है। सूरज दक्षिणायन होता है, तो हम शुभ काम नहीं करते। जैसे ही उत्तरायण होता है, हम मकर संक्रांति मनाने लगते हैं। लेकिन मुंबई और दिल्ली में दक्षिण की महत्ता उत्तर से भी अधिक है। दक्षिण मतलब स्टेटस। मतलब नया ब्राह्मण।
जब तक रिपोर्टर था, तब तक तो लोगों को मेरे गाजियाबादी होने से कोई खास दिक्कत नहीं थी। जब से एंकर हो गया हूं, लोग मुझसे मेरा पता इस अंदाज में पूछते हैं कि जैसे मैं कहने ही वाला हूं कि जी जोर बाग वाली कोठी में इन दिनों नहीं रहता। बहुत ज्यादा बड़ी है। सैनिक फार्म में भी भीड़ भाड़ हो गयी है। पंचशील अमीरों के पते में थोड़ा लापता पता है। मतलब ठीक है आप साउथ दिल्ली में है। वो बात नहीं। फ्रैंड्स कालोनी की लुक ओखला और तैमूर नगर के कारण जोर बाग वाली नहीं है, मगर महारानी बाग के कारण थोड़ा झांसा तो मिल ही जाता है। आप कहने को साउथ में हैं, पर सेंट्रल की बात कुछ अलग ही होती है। मैं जी बस अब इन सब से तंग आकर अमृता शेरगिल मार्ग पर रहने लगा हूं। खुशवंत सिंह ने बहुत कहा कि बेटे रवीश तू इतना बड़ा स्टार है, टीवी में आता है, तू न सुजान सिंह पार्क में रहा कर। अब देख खान मार्केट से अमृता शेरगिल मार्ग थोड़ी दूर पर ही है न। सुजान सिंह पार्क बिल्कुल क्लोज। काश ऐसा कह पाता। मैं साउथ और सेंट्रल दिल्ली में रहने वालों पर हंस नहीं रहा। जिन्होंने अपनी कमाई और समय रहते निवेश कर घर बनाया है, उन पर तंज नहीं है। पर उनके इस ब्राह्मणवादी पते से मुझे तकलीफ हो रही है। मुझे हिकारत से क्यों देखते हो भाई।
तो कह रहा था कि लोग पूछने लगे हैं कि आप कहां रहते हैं। जैसे ही गाजियाबाद बोलता हूं, उनके चेहरे पर जो रेखाएं उभरती हैं, उससे तो यही आवाज आती लगती है कि निकालो इसे यहां से। किसे बुला लिया। मैं भी भारी चंठ। बोल देता हूं जी, आनंद विहार के पास गाजीपुर है न, वो कचड़े का पहाड़, उसी के आसपास रहता हूं। मैं क्या करूं कि गाजियाबाद में रहता हूं। अगर मैं टीवी के कारण कुछ लोगों की नजर में कुछ हो गया हूं, तो गाजियाबाद उसमें कैसे वैल्यू सब्सट्रैक्शन (वैल्यू एडिशन का विपरीत) कर देता है। एक मॉल में गया था। मॉल का मैनेजर आगे पीछे करने लगा। चलिए बाहर तक छोड़ आता हूं। मैं कहता रहा कि भाई मुझे घूमने दो। जब वो गेट पर आया, तो मेरी दस साल पुरानी सेंट्रो देखकर निराश हो गया। जैसे इसे बेकार ही एतना भाव दे दिये। वैसे दफ्तर से मिली एक कार और है। रिक्शे पर चलता फिरता किसी को नजर आता हूं, तो लोग ऐसे देखते हैं, जैसे लगता है एनडीटीवी ने दो साल से पैसे नहीं दिये बेचारे को।
Apartmentकहने का मतलब है कि आपकी स्वाभाविकता आपके हाथ में नहीं रहती। प्राइम टाइम का एंकर न हो गया, फालतू में बवाल सर पर आ गया है। तभी कहूं कि हमारे कई हमपेशा एंकर ऐसे टेढ़े क्यों चलते हैं। शायद वो लोगों की उठती-गिरती नजरों से थोड़े झुक से जाते होंगे। मुझे याद है, हमारी एक हमपेशा एंकर ने कहा था कि मैं फ्रैंड्स कालोनी रहती हूं। डी ब्लाक। फ्रैंड्स कालोनी के बारे में थोड़ा आइडिया मुझे था। कुछ दोस्त वहां रहते हैं। जब बारीकी से पूछने लगा तो ओखला की एक कालोनी का नाम बताने लगीं। बड़ा दुख हुआ। आप अपनी असलियत को लेकर इतने शर्मसार हैं, तो जाने कितने झूठ रचते होंगे दिन भर। इसलिए जो लोग मुझे देख रहे हैं, उनसे यही गुजारिश है कि हम लोग बाकी लोगों की तरह मामूली लोग होते हैं। स्टार तो बिल्कुल ही नहीं। हम भी कर्मचारी हैं। काम ही ऐसा है कि सौ-पचास लोग पहचान लेते हैं। जैसे शहर के चौराहे पर कोई होर्डिंग टंगी होती है, उसी तरह से हम टीवी में टंगे होते हैं। मैंने कई एंकरों की चाल देखी है। जैसे पावर ड्रेसिंग होती है, वैसे ही पावर वॉक होती है। ऐसे झटकते हैं, जैसे अमित जी जा रहे हों। उनकी निगाहें हरदम नापती रहती हैं कि सामने से आ रहा पहचानता है कि नहीं। जैसे ही कोई पहचान लेता है उनके चेहरे पर राहत देखिए। और जब पहचानने वाला उन्हें पहचान कर दूसरे एंकर और चैनल का नाम लेता है, तो उस एंकर के चेहरे पर आफत देखिए!
तो हजरात मैं गाजियाबाद में रहता हूं। मूल बात है कि औकात भी यहीं रहने की है। इसलिए सवाल मेरी पसंद का भी नहीं है। बाकी एंकरों का नहीं मालूम। आप उनसे पूछ लीजिएगा। लेकिन नाम सही लीजिएगा। बेचारों पर कुछ तो दया कीजिए।
ravish kumar(रवीश कुमार। टीवी का एक सजग चेहरा। एनडीटीवी इंडिया के कार्यकारी संपादक। इतिहास के छात्र रहे। कविताएं और कहानियां भी लिखते हैं।