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Wednesday, January 07, 2015

हां, हम सब हरामजादे हैं

पिछले महीने, दिल्ली में, केंद्रीय मंत्री निरंजन ज्योति ने ‘रामजादे’ बनाम ‘हरामजादे’ वाला चर्चित घोर सांप्रदायिक वक्तव्य अपने एक भाषण में दिया था, उससे कितनों की ‘भावनाएं आहत हुईं’ इसका हिसाब कौन रखेगा? 

इसी पे मैंने एक कविता लिखा है उम्मीद करता हूँ आप सभी को पसंद आएगी।

आप सभी की कॉमेंट चाहूँगा।

हां, हम सब हरामजादे हैं

पुरखों की कसम खाकर कहता हूं –
कि हम सब हरामजादे हैं
आर्य, शक, हूण, मंगोल, मुगल, अंग्रेज,
द्रविड़, आदिवासी, गिरिजन, सुर-असुर
जाने किस-किस का रक्त
प्रवाहित हो रहा है हमारी शिराओं में
उसी मिश्रित रक्त से संचरित है हमारी काया
हां, हम सब वर्णसंकर हैं

पंच तत्वों को साक्षी मानकर कहता हूं –
कि हम सब हरामजादे हैं!
गंगा, यमुना, ब्रम्हपुत्र, कावेरी से लेकर
वोल्गा, नील, दजला, फरात और थेम्स तक
असंख्य नदियों का पानी हिलोरें मारता है हमारी कोशिकाओं में
उन्हीं से बने हैं हम कर्मठ, सतत संघर्षशील

सत्यनिष्ठा की शपथ लेकर कहता हूं –
कि हम सब हरामजादे हैं!
जाने कितनी संस्कृतियों को हमने आत्मसात किया है
कितनी सभ्यताओं ने हमारे हृदय को सींचा है
हजारों वर्षों की लंबी यात्रा में
जाने कितनों ने छिड़के हैं बीज हमारी देह में
हमें बनाये रखा है निरंतर उर्वरा

इस देश की थाती सिर-माथे रखते हुए कहता हूं
कि हम सब हरामजादे हैं!
बुद्ध, महावीर, चार्वाक, आर्यभट्ट, कालिदास
कबीर, गालिब, मार्क्स, गांधी, अंबेडकर
हम सबके मानस-पुत्र हैं
तुम सबसे अधिक स्वस्थ एवं पवित्र हैं

इस देश की आत्मा की सौगंध खाकर कहता हूं –
कि हम सब हरामजादे हैं!
हम एक बाप की संतान नहीं
हममें शुद्ध रक्त नहीं मिलेगा
हमारे नाक-नक्श, कद-काठी, बात-बोली,
रहन-सहन, खान-पान, गान-ज्ञान
सबके सब गवाही देंगे
हमारा डीएन परीक्षण करवा कर देख लो
गुणसूत्रों में मिलेंगे अकाट्य प्रमाण
रख दोगे तुम कुतर्कों के धनुष-बाण

मैं एतद् द्वारा घोषणा करता हूं –
कि हम सब हरामजादे हैं
हम जन्मे हैं कई बार कई कोख से
हमें नहीं पता हम किसकी संतान हैं
इतना जानते हैं पर
जिसके होने का कोई प्रमाण नहीं
हम उस राम के वंशज नहीं
माफ करना रामभक्तों
हम रामजादे नहीं!

हे शुद्ध रक्तवादियो,
हे पवित्र संस्कृतिवादियो
हे ज्ञानियों-अज्ञानियो
हे साधु-साध्वियो
सुनो, सुनो, सुनो!
हर आम ओ खास सुनो!
नर, मुनि, देवी, देवता
सब सुनो!
हम अनंत प्रसवों से गुजरे
इस महादेश की जारज औलाद हैं
इसलिए डंके की चोट पर कहता हूं
हम सब हरामजादे हैं!
हां, हम सब हरामजादे हैं!

Tuesday, January 06, 2015

देश की जमींन अब अमीरों की,रईसो की!

आम आदमी पार्टी ने चार जनवरी को अपने दिल्ली डायलोग के जरिये भूमि-अधिग्रहण अध्यादेश का विरोध किया था। सरकार के असंवेदनशील अध्यादेश पर आम आदमी पार्टी ने कड़ी आपत्ति जतायी और आज देश के कोने-कोने से कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किया। हर जिला मुख्यालय पर पार्टी सदस्यों ने प्रधानमंत्री के नाम प्रतिवेदन दिया। कार्यकर्ताओं ने ये मांग की है कि केंद्र सरकार किसान विरोधी अपने इस अध्यादेश को वापस ले और भूमि अधिग्रहण कानून को न्यायसंगत बनाये। विरोध प्रदर्शन का ये सिलसिला आगे भी जारी रहेगा और कई राज्यों में इस अध्यादेश के खिलाफ पार्टी कार्यकर्ता सड़क पर आएंगे।

मोदी सरकार ने कानून में संशोधन करके पांच श्रेणियों की परियोजनाओं को कई तरह की छूट दे दी है। ये पांच श्रेणियां हैं: रक्षा, औद्योगिक कॉरिडोर, ग्रामीण क्षेत्रों में ढांचागत निर्माण, सस्ते मकान एवं निम्न ग़रीब वर्ग के लिए आवास योजना और पीपीपी मॉडल के तहत बनने वाली सामाजिक ढांचागत परियोजनाएं जहां की भूमि सरकार की ओर से दी जानी हो।

किसी भी परियोजना को अब इन पांच में से किसी न किसी श्रेणी में डालकर अधिग्रहण को कानूनन जायज ठहराया जा सकेगा।

अब सरकार बिना जमीन मालिकों के सहमति के भी अधिग्रहण कर सकती है। अब सरकार के लिए ये जरूरी नहीं होगा कि वो जमीन का कब्जा लेने से पहले वहां के समाज पर पड़ रहे इसके प्रभाव का आकलन करे। पांच साल तक मुआवजा न मिलने या सरकार द्वारा जमीन पर कब्जा न लेने की सूरत में जमीन पर वापस अपना दावा करने का अधिकार था। सरकार ने अध्यादेश के जरिये लोगों का ये अधिकार भी छीन लिया है।

अब निजी कंपनी के अलावा प्रोप्राइटरशिप, पार्टनरशिप या किसी एनजीओ के लिए भी सरकार जमीन ले सकती है। “रक्षा” शब्द की परिभाषा बदलकर “राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए कोई भी परियोजना” और “रक्षा उत्पाद” को शामिल कर लिया गया है। इनमें से कोई भी “ढांचागत निर्माण परियोजना” या “निजी परियोजना” हो सकती है। अब अगर कोई भूमि अधिग्रहण अधिकारी कुछ गलती भी करता है, तो हम बिना सरकार के इजाजत के उसे अदालत में नहीं ले जा सकते।

2013 का अधिनियम पारित होने से पहले बीजेपी समेत सभी दलों ने इस पर व्यापक चर्चा करके अपनी राय दी थी। यहां तक कि जिस संसदीय समिति ने इसे पारित किया, उसकी अध्यक्षा सुमित्रा महाजन थीं, जो आजकल लोकसभा की अध्यक्षा हैं। राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज जैसे कई भाजपा नेताओं ने तब किसान-हित की बड़ी बड़ी बातें की थी। बिल पर वोट करने वाले 235 सांसदों में से 216 ने इसका समर्थन किया था। आम आदमी पार्टी जानना चाहती है कि क्यूं ऐसे व्यापक समर्थन के बाद बने कानून को सरकार ने एक झटके में अध्यादेश के जरिये खारिज कर दिया? ऐसा करना अनैतिक ही नहीं, लोकतांत्रिक प्रक्रियायों के प्रति वर्तमान सरकार की कमजोर प्रतिबद्धता का भी परिचायक है।

आम आदमी पार्टी सरकार के अध्यादेश लाने के निर्णय को ही असंवैधानिक मानती है। संविधान में अध्यादेश लाने का प्रावधान दो सत्रों के बीच किसी आपात स्थिति के लिए किया गया है। आज ऐसी कौन सी आपातकालीन परिस्थिति है? किसानो, आदिवासियों और आम लोगों की कीमत पर किन चुनिंदा पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए मोदी सरकार को ऐसा कदम उठाना पड़ा? अध्यादेश पर हस्ताक्षर करने से पहले राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी ने भी यह जानना चाहा है कि आखिर मोदी सरकार को ऐसी कौन सी जल्दबाजी है?

पिछला भूमि अधिग्रहण कानून एक जनवरी 2014 को लागू तो हो गया, लेकिन कई राज्यों की विधानसभाओं में नियम नहीं बन पाने के कारण पूरी तरह से क्रियान्वित नहीं हो पाया था। आम आदमी पार्टी जानना चाहती है कि कैसे, एक वर्ष से भी कम समय में, इस कानून को जांचे बगैर, सरकार ने अधिनियम की व्यवहारिकता का आकलन भी लगा लिया और संशोधन की आवश्यकता समझ ली?

सच्चाई तो यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तय कर लिया है कि वो कुछ गिने-चुने पूंजीपतियों और व्यापारी घरानों को फायदे पहुंचाएंगे और देश के किसानों, आदिवासियों और ग्रामीणों को उनकी इस चाल का पता नहीं चलेगा। 2013 में पारित कानून के हर सकारात्मक बिंदु (जो कि भाजपा के भी सक्रिय समर्थन से बने था) को इस जनविरोधी अध्यादेश ने खत्म कर दिया है। हम वापस अंग्रेजों के सन 1894 वाले कानून पर आ गये हैं। क्या देश के किसानों के लिए यही है प्रधानमंत्री जी का तोहफा?

आम आदमी पार्टी इस अति-गंभीर मुद्दे को पूरे जोर-शोर से उठाएगी और सरकार के ऐसे जनविरोधी कृत्यों को कभी सफल नहीं होने देगी। पार्टी केंद्र सरकार को ये याद दिलाना चाहती है कि भूमि-अधिग्रह कानून का मकसद लोगों को न्याय दिलाना होना चाहिए न कि उनको दबाना। आम आदमी पार्टी एक बार फिर मांग करती है कि प्रधानमंत्री इस किसान विरोधी अध्यादेश को वापस ले।

Saturday, January 03, 2015

सोशल मिडिया को बंद करने के मूड में मोदी सरकार,विरोध करें।

भारत सरकार ने 32 वेबसाइट को बंद कर दिया है। सुरक्षा संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए। सरकार की दलील है कि इन वेबसाइट्स पर भारत विरोधी सामग्री परोसी जा रही थी। इन वेबसाइट्स का इस्‍तेमाल आईएसआईएस (इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया) जैसे आतंकी समूह कर रहे थे। सरकार का यह पक्ष और कार्रवाई न सिर्फ सतही है, बल्कि अभिव्‍यक्ति की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करने की कोशिश भी है। एक खुली दीवार, जो हर आदमी के लिए उपलब्‍ध है – उस पर अच्‍छे लोग भी वॉल राइटिंग कर सकते हैं और बुरे लोग भी। उस दीवार को ढाहने से बेहतर बुरे वाक्‍यों को मिटाना होता। लेकिन हमारी सरकार ने थोड़ी बुरी आवाजों की आड़ में बहुतेरी अच्‍छी और सच्‍ची आवाजों को मार गिराया है। फेसबुक-ट्वीटर को सरकार ने फिलहाल बख्‍श दिया है क्‍योंकि इन जगहों पर सरकार खुद मौजूद है, अपने प्रचार के लिए, अपनी ‘नीतियों’ के प्रचार के लिए। सरकार की इस कार्रवाई का अगर हम आज विरोध नहीं करते हैं, तो कल हम सबकी आवाजें खत्‍म कर दी जाएंगी और हम कुछ नहीं कर सकेंगे। फेसबुक परअभिनव आलोक ने इस तरफ हमारा ध्‍यान खींचा, तो हमारे भी कान खड़े हुए। ऐसे मित्र होने चाहिए, जो इस तरह के मामलों में हमारी नींद तोड़ें।

मूर्खताएं वाकई असीमित होती हैं! GitHub, SourceForge, Dailymotion, Internet Archive Weebly, Snipplr, Vimeo जैसी तमाम वेबसाइटों को ब्लॉक करने के फरमान को क्या समझा जाये? ये सब चाइल्ड पोर्नोग्राफी की वेबसाइटस नहीं हैं। इनमें से अधिकतर वो साइट्स हैं, जहां ओपन सोर्स सोफ्ट्वरेस, कोड, प्रोजेक्ट्स, ब्लॉग इत्यादि होस्ट किया जाता हैं। GitHub और ‪#‎SourceForge‬ तो ओपन सोर्स कम्युनिटी की रीढ़ की हड्डी हैं। इस पर हमला तो कोई जाहिल प्रशासन ही कर सकता है। अभिव्यक्ति और इंटरनेट के इस्तेमाल की आजादी को भी थोड़ी देर के लिए दरकिनार (जबकि ये बेहद मौलिक अधिकार हैं) कर दें, तो भी मुझे समझ नहीं आ रहा कि एक कम विकसित देश भला ओपन सोर्स के खिलाफ इतना बड़ा फैसला कैसे अफोर्ड कर सकता है, जबकि कोई भी ओपन सोर्स से जुड़ा इनिशिएटिव ऐसे ही देशो और इसके नागरिकों के लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद है!

(जिन्हे ओपन सोर्स के बारे में पता नहीं. वो गूगल करें। यहां संक्षेप में यही कह सकता हूं कि यह ज्ञान और तकनिकी के लोकतंत्रीकरण और इसको पूंजीवाद से मुक्त करने का एक बड़ा हथियार है…)

Friday, January 02, 2015

#AAP ने पकड़ा मोदी सरकार का झूठ।

भाजपा की केंद्र सरकार दिल्ली में अनधिकृत कालोनियों को नियमित करने से संबंधित अध्यादेश के बारे में लोगों को गलत सूचना दे रही है। मीडिया ने यह गलत खबर प्रकाशित की है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अनधिकृत कालोनियों को राहत देने के लिए संबंधित अध्यादेश को मंजूरी दे दी है। जबकि सच्चाई यह है कि केंद्रीय मंत्रीमंडल ने न तो किसी अध्यादेश को मंजूरी दी है और न ही किसी तरह के कानून को लागू किया है।

नरेंद्र मोदी सरकार ने भी पूर्व शीला दीक्षित सरकार के स्वांग दोहराने की कोशिश की है। मौजूदा केंद्र सरकार ने भी केवल समय सीमा की तारीख बदल कर इन कालोनियों में रहने वाले गरीब लोगों को मूर्ख बनाने की कोशिश की है।

इस मुद्दे पर आम आदमी पार्टी ने केंद्र सरकार को चुनौती दी है कि वह उन सभी अनधिकृत कालोनियों की सूची को सार्वजनिक करे, जिन्हें नियमित करने की घोषणा की गयी है। साथ ही नियमित होने की तारीख की घोषणा करने की भी चुनौती दी है।

सच्चाई यह है कि केंद्र सरकार ने इन अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने की घोषणा से पहले की उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया है।

अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने की घोषणा से पहले इन तथ्यों पर गौर करना भी जरूरी है –

1) सबसे पहले, घर के मालिकों को कानूनन मालिकाना हक देने से पहले भूमि के उपयोग से संबंधित कानून में परिवर्तन किया जाना जरूरी है।

2) दिल्ली में ज्यादातर अनधिकृत कालोनियां डीडीए और एएसआई की भूमि के अलावा कृषि भूमि व वन भूमि पर बसी हैं। इन एजेंसियों के साथ भी इनकी जमीनों से संबंधित उपनियमों में परिवर्तन किया जाना जरूरी है। केंद्र सरकार ने क्या अब तक इस दिशा में किसी तरह के कदम उठाए हैं?

3) क्या केंद्र सरकार इसकी गारंटी दे सकती है कि उसकी इस घोषणाभऱ से इन कालोनियों में बिजली पानी के अलावा दूसरी बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था भी हो जाएगी?


केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने ऐसा कोई रोडमैप भी तैयार नहीं किया है कि अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने की उसकी घोषणा शीला दीक्षित सरकार से किस तरह अलग है? शीला दीक्षित सरकार ने भी अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने की घोषणा की थी। लेकिन जिस तरह इऩ कॉलोनियों के बाशिंदों को उनके घरों के कानूनन हक दिये बगैर प्रोविजनल सर्टिफिकेट बांटे गये, वह महज एक घोटाला ही साबित हुआ।

क्या शहरी विकास राज्य मंत्रालय बता सकता है कि इन अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने की दिशा में उसकी क्या पहल होगी? और क्या वह इस बात से इनकार कर सकता है कि इन कॉलोनियों को नियमित करने की घोषणा महज चुनाव के पहले की जनता को लुभाने की नौटंकी भर है?