Showing posts with label BJP. Show all posts
Showing posts with label BJP. Show all posts

Tuesday, January 20, 2015

निरंकुश शासन के खिलाफ विद्रोह की शुरुआत ॥

इस बार दिल्ली में केजरीवाल के लिए जो समर्थन दिख रहा है वह अभूतपूर्व है। निरंकुश शासन के खिलाफ विद्रोह की शुरुआत हो चुकी है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जीत को लेकर अब मेरे मन में कोई संदेह नहीं रह गया है।
➡ प्रभात रंजन, कथाकार और अनुवादक

क्‍या दिल्ली चुनाव नरेंद्र मोदी का वाटरलू साबित होने जा रहा है? इस बात के कुछ ठोस कारण और लक्षण भी दिखाई देने लगे हैं।

1. भाजपा के लिए दिल्ली के ग्रामीण इलाकों में कोई भविष्य नहीं बचा है। केंद्र सरकार ने भूमि अधिग्रहण के बारे में जो अध्यादेश जारी किया है, वह शहरी क्षेत्रों के निकट की ग्रामीण जनता के खिलाफ सीधे तौर पर युद्ध की घोषणा से कम नहीं है।

2. दिल्ली के बस्ती इलाकों में भाजपा की स्थिति पहले से ही कमजोर रही है और अभी तक उसमें कोई सुधार नहीं आया है। कॉलोनियों को रेगुलराईज करने की दिशा में सिर्फ एक घोषणा भर की गयी है, जिसकी कोई कानूनी वैधता नहीं है। इस मामले में भाजपा के इरादे आज भी हमेशा की तरह संदेह के घेरे में हैं।

3. दिल्ली के अल्प-संख्यकों में अब कोई दुविधा नहीं है। भाजपा और संघ परिवार के नेताओं की धर्म-परिवर्तन और नफ़रत फैलाने की हरकतों तथा गिरजाघरों में आगजनी की घटनाओं ने अल्पसंख्यकों के सभी समुदायों को भाजपा के खिलाफ दूसरे किसी भी समय की तुलना में कहीं ज्यादा एकजुट कर दिया है। संघ परिवार के लोगों की दंगा भड़काने की साजिशों का आम आदमी पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ताओं ने जिस बहादुरी से मुकाबला किया, उसने इन समुदायों को और भी जागृत किया है।

4. पेट्रोलियम पदार्थों की अतरराष्ट्रीय दरों में भारी गिरावट के बावजूद रोजमर्रे की जरूरी चीजों के दामों को कम करने में भाजपा सरकार की पूर्ण विफलता ने मध्यवर्ग के तबकों का भाजपा के प्रति मोहभंग किया है।

5. भ्रष्टाचार के मामले में भाजपा पर पहले भी किसी को कोई भरोसा नहीं था। अब भाजपा के परंपरागत नेताओं को हटा कर किरण बेदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने का फ़ैसला करके खुद भाजपा के सर्वोच्च नेतृत्व ने भी खुले आम दिल्ली की भाजपा के प्रति अविश्वास जाहिर कर दिया है।

6. किरण बेदी एक अक्षम पुलिस अधिकारी रही हैं। उन्हें पुलिस सेवा में भी अराजक व्यवहार और निकम्मेपन की वजह से किसी भी उच्च पदस्थ अधिकारी को स्वाभाविक तौर पर मिलने वाले पदक भी नहीं मिल पाये। इसके अलावा, आम आदमी पार्टी के पूरे आंदोलन में उनकी भूमिका एक तोड़क की भूमिका रही। ऐसे विफल व्यक्ति को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश करके चुनाव में उतरना भाजपा के परंपरागत मतदाताओं के विश्वास को भी हिला देने के लिए काफी है।

7. नरेंद्र मोदी की सभा में उम्मीद से बेहद कम लोगों का आना और अरविंद केजरीवाल की सभाओं में भारी भीड़ का उमड़ना ही वह प्रमुख कारण रहा है, जिसकी वजह से मोदी जी ने दिल्ली में खुद को दाव पर लगाना मुनासिब नहीं समझा। किरण बेदी की खोज भी इसीलिए की गयी है।

इन तमाम चीजों को देखते हुए दिल्ली विधानसभा के आगामी चुनाव के बारे में इस नतीजे पर पहुंचना गलत नहीं होगा कि यह चुनाव नरेंद्र मोदी के लिए वाटरलू साबित होने वाला है।

निरंकुश शासन के खिलाफ विद्रोह की शुरुआत ॥

इस बार दिल्ली में केजरीवाल के लिए जो समर्थन दिख रहा है वह अभूतपूर्व है। निरंकुश शासन के खिलाफ विद्रोह की शुरुआत हो चुकी है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जीत को लेकर अब मेरे मन में कोई संदेह नहीं रह गया है।
➡ प्रभात रंजन, कथाकार और अनुवादक

क्‍या दिल्ली चुनाव नरेंद्र मोदी का वाटरलू साबित होने जा रहा है? इस बात के कुछ ठोस कारण और लक्षण भी दिखाई देने लगे हैं।

1. भाजपा के लिए दिल्ली के ग्रामीण इलाकों में कोई भविष्य नहीं बचा है। केंद्र सरकार ने भूमि अधिग्रहण के बारे में जो अध्यादेश जारी किया है, वह शहरी क्षेत्रों के निकट की ग्रामीण जनता के खिलाफ सीधे तौर पर युद्ध की घोषणा से कम नहीं है।

2. दिल्ली के बस्ती इलाकों में भाजपा की स्थिति पहले से ही कमजोर रही है और अभी तक उसमें कोई सुधार नहीं आया है। कॉलोनियों को रेगुलराईज करने की दिशा में सिर्फ एक घोषणा भर की गयी है, जिसकी कोई कानूनी वैधता नहीं है। इस मामले में भाजपा के इरादे आज भी हमेशा की तरह संदेह के घेरे में हैं।

3. दिल्ली के अल्प-संख्यकों में अब कोई दुविधा नहीं है। भाजपा और संघ परिवार के नेताओं की धर्म-परिवर्तन और नफ़रत फैलाने की हरकतों तथा गिरजाघरों में आगजनी की घटनाओं ने अल्पसंख्यकों के सभी समुदायों को भाजपा के खिलाफ दूसरे किसी भी समय की तुलना में कहीं ज्यादा एकजुट कर दिया है। संघ परिवार के लोगों की दंगा भड़काने की साजिशों का आम आदमी पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ताओं ने जिस बहादुरी से मुकाबला किया, उसने इन समुदायों को और भी जागृत किया है।

4. पेट्रोलियम पदार्थों की अतरराष्ट्रीय दरों में भारी गिरावट के बावजूद रोजमर्रे की जरूरी चीजों के दामों को कम करने में भाजपा सरकार की पूर्ण विफलता ने मध्यवर्ग के तबकों का भाजपा के प्रति मोहभंग किया है।

5. भ्रष्टाचार के मामले में भाजपा पर पहले भी किसी को कोई भरोसा नहीं था। अब भाजपा के परंपरागत नेताओं को हटा कर किरण बेदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने का फ़ैसला करके खुद भाजपा के सर्वोच्च नेतृत्व ने भी खुले आम दिल्ली की भाजपा के प्रति अविश्वास जाहिर कर दिया है।

6. किरण बेदी एक अक्षम पुलिस अधिकारी रही हैं। उन्हें पुलिस सेवा में भी अराजक व्यवहार और निकम्मेपन की वजह से किसी भी उच्च पदस्थ अधिकारी को स्वाभाविक तौर पर मिलने वाले पदक भी नहीं मिल पाये। इसके अलावा, आम आदमी पार्टी के पूरे आंदोलन में उनकी भूमिका एक तोड़क की भूमिका रही। ऐसे विफल व्यक्ति को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश करके चुनाव में उतरना भाजपा के परंपरागत मतदाताओं के विश्वास को भी हिला देने के लिए काफी है।

7. नरेंद्र मोदी की सभा में उम्मीद से बेहद कम लोगों का आना और अरविंद केजरीवाल की सभाओं में भारी भीड़ का उमड़ना ही वह प्रमुख कारण रहा है, जिसकी वजह से मोदी जी ने दिल्ली में खुद को दाव पर लगाना मुनासिब नहीं समझा। किरण बेदी की खोज भी इसीलिए की गयी है।

इन तमाम चीजों को देखते हुए दिल्ली विधानसभा के आगामी चुनाव के बारे में इस नतीजे पर पहुंचना गलत नहीं होगा कि यह चुनाव नरेंद्र मोदी के लिए वाटरलू साबित होने वाला है।

Sunday, January 11, 2015

रेल मेंअब कोई लटक-फटक के नहीं जाने वाला है

आज ही का तो दिन था...लगभग 400 साल पहले...सूरत में ईस्ट इंडिया कंपनी का पहला कारखाना तैयार हुवा था. तब का मुग़लिया बादशाह जहाँगीर और तमाम जनता भी बहुत खुश थी. किसी को आनेवाले वक़्त का अंदेशा नहीं था. खैर, हम अभी की बात करते हैं. आज ज़्यादातर हिन्दुस्तानियों की सुबह चाय से ही होती है. 1920 के दशक से पहले इस मुल्क़ में चाय संस्कृति ने घुसपैठ नहीं किया था. तब ईस्ट इंडिया कंपनी की टी बोर्ड ने लोगों को मुफ़्त में चाय पिलाना शुरू किया. चूँकि इस देश में धर्म-संस्कृति को आधार बनाए बिना जनमानस तक पहुँचना मुश्किल होता है, तो कंपनी ने चाय को वेद वर्णित संजीवनी से जोड़कर प्रचारित किया. 1950 तक यह चाय मुल्क़ के गाँवों तक पहुँच गया था. आज चाय की कितनी सारी कम्पनियाँ इस लत से संजीवनी पा रही है...माल बना रही है...लोगों की जेबों से सबसे पहले पैसा निकाल रही है.
अब आज के दिन की बात करते हैं. साहेब ने बिजली के पूर्ण निजीकरण का लोकलुभावन तरीका जनता को दे दिया. जनता मस्त, कि मोबाइल प्रोवाइडर की तरह वो बिजली कंपनी को भी पोर्ट करने का मज़ा लेगी. कोयले के खदानों का निजीकरण भी ज़ल्दी ही होगा. रेलवे की बात तो बहुत आगे जा चुकी है. रक्षा क्षेत्र में एफ डी आई की खबर सबको मालूम होगी ही. चिकित्सा के उपकरण बनाने के क्षेत्र में सौ प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश स्वीकृत हो चुका है. भूमि अधिग्रहण अधिनियम के नये संशोधन से खेती की ज़मीन अम्बानियों-अदानियों के गोद में धर दिए जाने का भी बन्दोबश्त हो गया है. आप मग्न रहिये भक्ति में, कि कोई रामराज्य आनेवाला है, कि अपना मुल्क़ गुप्तकाल की तरह सोना-सोना होनेवाला है, कि अखंड हिन्दू राष्ट्र बनने वाला है, कि अम्बानी की कंपनी आपको बिजली के साथ में फ्रीज भी देनेवाली है, कि रेलवे में अब कोई लटक-फटक के नहीं जाने वाला है, कि कभी भी आते काले धन का आपका हिस्सा आपके अकाउंट में टपकने वाला है. बड़ी ज़ल्दी नशा फटेगा और तब दर्द से सिर फटने का आनंद लीजियेगा.
संयोग देखिये, कि ये नामुराद चाय तब भी अहम भूमिका में थी और ये दिल्ली शहर तब भी गुलामी की आधारशिला के रखे जाने की गवाह थी.
बाक़ी, फिलहाल तो एक काम करिए कि भक्तिकाल से थोडा बाहर आकर संस्कृति और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का बत्ती बनाकर धर लीजिये. सिरदर्द के समय खुद को बहलाने के काम आयगा.

Thursday, January 08, 2015

मुसलमान जाहिल है, कूपमंडूक है, पागल है

पेरिस के हादसे की चारों तरफ निंदा हो रही है। यह जायज भी है। लेकिन इस निंदा अभियान में एक बड़ा तबका है जिनके मुसलिम विरोधी मानस को बड़ा संतोष हो रहा है। इसी बहाने वे आम मुसलमानों को अपनी टिप्‍पणियों में निशाना बना रहे हैं। सोशल मीडिया पर ऐसी हरकत बड़े पैमाने पर देखी जा सकती है। हैदर रिज़वी ने इसी मसले पर अपनी बात रखी है


♦ हैदर रिज़वी

इतना फड़फडाने की जरूरत नहीं है। आपकी अभिव्यक्ति की आजादी आपको ये स्वतंत्रता नहीं देती कि आप आये दिन किसी के धर्म का मजाक उड़ाएं। मुसलमान जाहिल है, कूपमंडूक है, पागल है … पर आप तो समझदार हो। सांड को लाल कपड़ा दिखाते ही क्यूं हो? जब आपको पता है कि मुहम्मद साहब की तस्वीर तक नहीं बनाते, तो फिर बार बार कार्टून बनाकर साबित क्या करना चाहते हो?

रही बात कार्टून के विरोध की, तो फिर वही निदा फाजली साहब वाली बात कि “उठ उठ के मस्जिदों से नमाजी चले गये, दहशतगरों के हाथ में इस्लाम रह गया”। इस कार्टून का विरोध यदि मुसलमानों ने किया होता, तो उनके धर्मगुरुओं का फतवा आता। हर देश में इसका विरोध होता, किंतु ऐसा नहीं हुआ। चंद जाहिल और बर्बर बंदूकधारी मैगजीन के दफ्तर जाते हैं और खुदाई फैसला सुना आते हैं।

लेकिन फिर मुझसे यह उम्मीद क्यों रखी जाती है कि मैं इनके या उनके किसी के भी समर्थन में बोलूं? न मैंने कार्टून बनाया, न ही मैंने हत्या की। हां, हत्या करने वाला खुद को मेरे मजहब का बताता है। हां, हत्या मेरे पैगंबर के कार्टून के विरोध में की गयी, इसके लिए तो हम खुद शर्मिंदा है। गली गली इस्लाम के खिलाफ हुंकार लगाने या अपनी सफाई देने से बेहतर है अब मुसलमान साफ साफ दो हिस्सों में बांट जाए।

एक वो मुसलमान जिन्हें खुद ही सारे फैसले करने हैं हथियारों या फतवों के दम पर, दूसरे वो जो ऐसी हर घटना पे खून के घू्ंट पीकर आपकी गालियां सुन कर भी चुप रह जाते हैं और दुबारा अपनी रोजी रोटी में लग जाते हैं।

गलती आपकी नहीं है, आपको तो मजा आ रहा है। आप तो बढ़िया तरीके से एनजॉय कर रहे हैं, गलती हैदर रिजवी जैसे मुसलमानों की है कि वो मुसलमान क्यूं पैदा हो गये। और अगर हुए ही थे तो इस शांत देश और अनुकूल वातावरण में क्यूं पैदा हो गये। हमें तो अफगान के पठारों में स्टेनगन के साथ पैदा होना चाहिए था। क्‍योंकि आपके हिसाब से हमारी सोच और हमारा सही स्थान वही है।

आस्ट्रेलिया के मॉल में एक ईरानी क्रिमिनल घुस कर दो लोगों को मार देता है, गुस्सा हैदर रिजवी पर आता है आपको, पेशावर में बच्चे मरते हैं गुस्सा हैदर रिजवी पे, कार्टूनिस्ट मारा गया गुस्सा हैदर रिजवी पे। नक्सल किसी को मारते हैं, तो मुझे अपने पड़ोसी हिंदू पर तो गुस्सा नहीं आता? भिंडरावाला ने लोगों को मारा, मुझे सिक्खों के साथ तो कोई गुस्सा नहीं है? रणवीर सेना ने बच्चों को तलवारों पे टांग दिया, मुझे तो अपने ठाकुर पंडित दोस्तों पर गुस्सा नहीं आया? तमिलों ने मेरे प्रधानमंत्री को मार दिया, मुझे साउथ इंडियंस से नफरत तो नहीं? बोडो रोज खूंरेजी करते हैं, मुझे नार्थ ईस्ट वालों से कोई गुस्सा नहीं? पाकिस्तान रोज भारत में खुराफाती हरकतें करता रहता है मुझे पाकिस्तानियों से नफरत तो नहीं? बाबा और साधू रोज जेल जाते हैं, मुझे अपने मोहल्ले के पुजारी से उतनी ही मुहब्बत रही…

तुम लोग करवाओ अपने दिमाग का इलाज। खोट कहीं तुम्हारे दिमागों में है, मेरे इनबॉक्स में आकर बुद्धिजीविता और देशभक्ति न झाड़ो।

 “ईश्‍वर नहीं है लेकिन अल्‍लाह है”।

जो तथाकथित धर्मों की आड़ में खड़े होकर त्रिशूल, तलवार, बम, गोली से इस दुनिया को बेजुबान गुलामों की दुनिया में बदल देना चाहते हैं वे कभी कामयाब नहीं होंगे। जान देकर भी सच, न्याय, प्यार और कमजोरों की हिमायत में खड़ा होना ही असली धर्म है। अगर ऐसा होना होता तो समाज कबीला युग से आगे बढ़ ही नहीं पाया होता। हर दौर में खुले दिमाग वाले साहसी लोग संकीर्ण, बनैले दुनिया को असलहों से बंधक बना लेने की फंतासियों में जीने वालों से लड़े हैं और जीते हैं। कार्टून और व्यंग्य के फलने फूलने की कामना के साथ पेरिस में मारे गये पत्रकारों को श्रद्धांजलि।


सात जनवरी की शाम, पेरिस में Charlie Hebdo के दफ्तर में इस्‍लाम को चाहने वाले तीन गुंडे घुसे और 12 इंसानों की हत्‍या कर दी। इनमें से चार फ्रांस के बड़े कार्टूनिस्‍ट थे और दो पुलिस के अधिकारी थे। हालांकि इस पत्रिका को कोई धमकी नहीं दी गयी थी। 2011 में Charlie Hebdo का एक विशेषांक निकला था। खास तौर पर उस अंक के लिए पत्रिका के नाम के अक्षरों में फेरबदल की गयी थी। Charlie Hebdo की जगह Sharia Hebdo… दोनों ही शब्‍दों का फ्रेंच उच्‍चारण एक होता है। उन दिनों ट्यूनेशिया की इस्‍लामिक पार्टी एन्‍नाहदा की राजनीतिक जीत पर इस पत्रिका का यह विशेषांक था और उसमें अतिथि संपादक के रूप में प्रोफेट मोहम्‍मद का कार्टून छापा गया था। कवर पर प्रोफेट मोहम्‍मद के कार्टून के नीचे छपा था, “सौ कोड़े लगाये जाएंगे अगर आप हंसी से नहीं मरे! (100 lashes if you don’t die of laughter!)”। उस वक्‍त इस पत्रिका की वेबसाइट हैक कर ली गयी थी और उस पर लिख दिया गया था, “ईश्‍वर नहीं है लेकिन अल्‍लाह है”।

ऐसा नहीं है कि इस पत्रिका ने पहली बार इस्‍लाम के कथित नुमाइंदों को अपना निशाना बनाया था, जिसकी कीमत 12 इंसानों की जान के रूप में चुकानी पड़ी। THE DEALY BEAST ने पत्रिका की ऐसी 16 कवर स्‍टोरी रेखांकित है, जिसमें मोहम्‍मद और इस्‍लाम का मजाक उड़ाया गया है।

इस्‍लाम के गुंडों ने इस पत्रिका पर जिस तरह से अपनी खब्‍त निकाली है, उसके बाद ये कहना कठिन है कि आने वाले दिनों में पत्रिका का रुख क्‍या रहता है, लेकिन इस हादसे ने जो चीज पेरिस और फ्रांस तक सीमित थी, उसे पूरी दुनिया में जरूर पहुंचा दिया है। यह अभिव्‍यक्ति की आजादी पर हमला है, जिसका विरोध पूरी दुनिया में हो रहा है। मोहल्‍ला लाइव भी इस विरोध में शामिल है।

Wednesday, January 07, 2015

हां, हम सब हरामजादे हैं

पिछले महीने, दिल्ली में, केंद्रीय मंत्री निरंजन ज्योति ने ‘रामजादे’ बनाम ‘हरामजादे’ वाला चर्चित घोर सांप्रदायिक वक्तव्य अपने एक भाषण में दिया था, उससे कितनों की ‘भावनाएं आहत हुईं’ इसका हिसाब कौन रखेगा? 

इसी पे मैंने एक कविता लिखा है उम्मीद करता हूँ आप सभी को पसंद आएगी।

आप सभी की कॉमेंट चाहूँगा।

हां, हम सब हरामजादे हैं

पुरखों की कसम खाकर कहता हूं –
कि हम सब हरामजादे हैं
आर्य, शक, हूण, मंगोल, मुगल, अंग्रेज,
द्रविड़, आदिवासी, गिरिजन, सुर-असुर
जाने किस-किस का रक्त
प्रवाहित हो रहा है हमारी शिराओं में
उसी मिश्रित रक्त से संचरित है हमारी काया
हां, हम सब वर्णसंकर हैं

पंच तत्वों को साक्षी मानकर कहता हूं –
कि हम सब हरामजादे हैं!
गंगा, यमुना, ब्रम्हपुत्र, कावेरी से लेकर
वोल्गा, नील, दजला, फरात और थेम्स तक
असंख्य नदियों का पानी हिलोरें मारता है हमारी कोशिकाओं में
उन्हीं से बने हैं हम कर्मठ, सतत संघर्षशील

सत्यनिष्ठा की शपथ लेकर कहता हूं –
कि हम सब हरामजादे हैं!
जाने कितनी संस्कृतियों को हमने आत्मसात किया है
कितनी सभ्यताओं ने हमारे हृदय को सींचा है
हजारों वर्षों की लंबी यात्रा में
जाने कितनों ने छिड़के हैं बीज हमारी देह में
हमें बनाये रखा है निरंतर उर्वरा

इस देश की थाती सिर-माथे रखते हुए कहता हूं
कि हम सब हरामजादे हैं!
बुद्ध, महावीर, चार्वाक, आर्यभट्ट, कालिदास
कबीर, गालिब, मार्क्स, गांधी, अंबेडकर
हम सबके मानस-पुत्र हैं
तुम सबसे अधिक स्वस्थ एवं पवित्र हैं

इस देश की आत्मा की सौगंध खाकर कहता हूं –
कि हम सब हरामजादे हैं!
हम एक बाप की संतान नहीं
हममें शुद्ध रक्त नहीं मिलेगा
हमारे नाक-नक्श, कद-काठी, बात-बोली,
रहन-सहन, खान-पान, गान-ज्ञान
सबके सब गवाही देंगे
हमारा डीएन परीक्षण करवा कर देख लो
गुणसूत्रों में मिलेंगे अकाट्य प्रमाण
रख दोगे तुम कुतर्कों के धनुष-बाण

मैं एतद् द्वारा घोषणा करता हूं –
कि हम सब हरामजादे हैं
हम जन्मे हैं कई बार कई कोख से
हमें नहीं पता हम किसकी संतान हैं
इतना जानते हैं पर
जिसके होने का कोई प्रमाण नहीं
हम उस राम के वंशज नहीं
माफ करना रामभक्तों
हम रामजादे नहीं!

हे शुद्ध रक्तवादियो,
हे पवित्र संस्कृतिवादियो
हे ज्ञानियों-अज्ञानियो
हे साधु-साध्वियो
सुनो, सुनो, सुनो!
हर आम ओ खास सुनो!
नर, मुनि, देवी, देवता
सब सुनो!
हम अनंत प्रसवों से गुजरे
इस महादेश की जारज औलाद हैं
इसलिए डंके की चोट पर कहता हूं
हम सब हरामजादे हैं!
हां, हम सब हरामजादे हैं!

Tuesday, January 06, 2015

देश की जमींन अब अमीरों की,रईसो की!

आम आदमी पार्टी ने चार जनवरी को अपने दिल्ली डायलोग के जरिये भूमि-अधिग्रहण अध्यादेश का विरोध किया था। सरकार के असंवेदनशील अध्यादेश पर आम आदमी पार्टी ने कड़ी आपत्ति जतायी और आज देश के कोने-कोने से कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किया। हर जिला मुख्यालय पर पार्टी सदस्यों ने प्रधानमंत्री के नाम प्रतिवेदन दिया। कार्यकर्ताओं ने ये मांग की है कि केंद्र सरकार किसान विरोधी अपने इस अध्यादेश को वापस ले और भूमि अधिग्रहण कानून को न्यायसंगत बनाये। विरोध प्रदर्शन का ये सिलसिला आगे भी जारी रहेगा और कई राज्यों में इस अध्यादेश के खिलाफ पार्टी कार्यकर्ता सड़क पर आएंगे।

मोदी सरकार ने कानून में संशोधन करके पांच श्रेणियों की परियोजनाओं को कई तरह की छूट दे दी है। ये पांच श्रेणियां हैं: रक्षा, औद्योगिक कॉरिडोर, ग्रामीण क्षेत्रों में ढांचागत निर्माण, सस्ते मकान एवं निम्न ग़रीब वर्ग के लिए आवास योजना और पीपीपी मॉडल के तहत बनने वाली सामाजिक ढांचागत परियोजनाएं जहां की भूमि सरकार की ओर से दी जानी हो।

किसी भी परियोजना को अब इन पांच में से किसी न किसी श्रेणी में डालकर अधिग्रहण को कानूनन जायज ठहराया जा सकेगा।

अब सरकार बिना जमीन मालिकों के सहमति के भी अधिग्रहण कर सकती है। अब सरकार के लिए ये जरूरी नहीं होगा कि वो जमीन का कब्जा लेने से पहले वहां के समाज पर पड़ रहे इसके प्रभाव का आकलन करे। पांच साल तक मुआवजा न मिलने या सरकार द्वारा जमीन पर कब्जा न लेने की सूरत में जमीन पर वापस अपना दावा करने का अधिकार था। सरकार ने अध्यादेश के जरिये लोगों का ये अधिकार भी छीन लिया है।

अब निजी कंपनी के अलावा प्रोप्राइटरशिप, पार्टनरशिप या किसी एनजीओ के लिए भी सरकार जमीन ले सकती है। “रक्षा” शब्द की परिभाषा बदलकर “राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए कोई भी परियोजना” और “रक्षा उत्पाद” को शामिल कर लिया गया है। इनमें से कोई भी “ढांचागत निर्माण परियोजना” या “निजी परियोजना” हो सकती है। अब अगर कोई भूमि अधिग्रहण अधिकारी कुछ गलती भी करता है, तो हम बिना सरकार के इजाजत के उसे अदालत में नहीं ले जा सकते।

2013 का अधिनियम पारित होने से पहले बीजेपी समेत सभी दलों ने इस पर व्यापक चर्चा करके अपनी राय दी थी। यहां तक कि जिस संसदीय समिति ने इसे पारित किया, उसकी अध्यक्षा सुमित्रा महाजन थीं, जो आजकल लोकसभा की अध्यक्षा हैं। राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज जैसे कई भाजपा नेताओं ने तब किसान-हित की बड़ी बड़ी बातें की थी। बिल पर वोट करने वाले 235 सांसदों में से 216 ने इसका समर्थन किया था। आम आदमी पार्टी जानना चाहती है कि क्यूं ऐसे व्यापक समर्थन के बाद बने कानून को सरकार ने एक झटके में अध्यादेश के जरिये खारिज कर दिया? ऐसा करना अनैतिक ही नहीं, लोकतांत्रिक प्रक्रियायों के प्रति वर्तमान सरकार की कमजोर प्रतिबद्धता का भी परिचायक है।

आम आदमी पार्टी सरकार के अध्यादेश लाने के निर्णय को ही असंवैधानिक मानती है। संविधान में अध्यादेश लाने का प्रावधान दो सत्रों के बीच किसी आपात स्थिति के लिए किया गया है। आज ऐसी कौन सी आपातकालीन परिस्थिति है? किसानो, आदिवासियों और आम लोगों की कीमत पर किन चुनिंदा पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए मोदी सरकार को ऐसा कदम उठाना पड़ा? अध्यादेश पर हस्ताक्षर करने से पहले राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी ने भी यह जानना चाहा है कि आखिर मोदी सरकार को ऐसी कौन सी जल्दबाजी है?

पिछला भूमि अधिग्रहण कानून एक जनवरी 2014 को लागू तो हो गया, लेकिन कई राज्यों की विधानसभाओं में नियम नहीं बन पाने के कारण पूरी तरह से क्रियान्वित नहीं हो पाया था। आम आदमी पार्टी जानना चाहती है कि कैसे, एक वर्ष से भी कम समय में, इस कानून को जांचे बगैर, सरकार ने अधिनियम की व्यवहारिकता का आकलन भी लगा लिया और संशोधन की आवश्यकता समझ ली?

सच्चाई तो यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तय कर लिया है कि वो कुछ गिने-चुने पूंजीपतियों और व्यापारी घरानों को फायदे पहुंचाएंगे और देश के किसानों, आदिवासियों और ग्रामीणों को उनकी इस चाल का पता नहीं चलेगा। 2013 में पारित कानून के हर सकारात्मक बिंदु (जो कि भाजपा के भी सक्रिय समर्थन से बने था) को इस जनविरोधी अध्यादेश ने खत्म कर दिया है। हम वापस अंग्रेजों के सन 1894 वाले कानून पर आ गये हैं। क्या देश के किसानों के लिए यही है प्रधानमंत्री जी का तोहफा?

आम आदमी पार्टी इस अति-गंभीर मुद्दे को पूरे जोर-शोर से उठाएगी और सरकार के ऐसे जनविरोधी कृत्यों को कभी सफल नहीं होने देगी। पार्टी केंद्र सरकार को ये याद दिलाना चाहती है कि भूमि-अधिग्रह कानून का मकसद लोगों को न्याय दिलाना होना चाहिए न कि उनको दबाना। आम आदमी पार्टी एक बार फिर मांग करती है कि प्रधानमंत्री इस किसान विरोधी अध्यादेश को वापस ले।

Monday, January 05, 2015

कारपोरेट ने भाजपा को हाथोंहाथ उठा लिया।


केंद्र सरकार ने इन सात महीनों में ताबड़तोड़ अध्यादेश जारी कर दिया है। लगता है यह सरकार “अध्यादेश सरकार” के नाम पर प्रसिद्धि पाएगी। 1978 में इंदिरा गांधी ने तत्कालीन जनता सरकार को काम न करने वाली सरकार कहा था और जनता को “गवर्नमेंट दैट वर्क्‍स” लाने का आह्वान किया था – 1980 में जनता सरकार सत्ता से बाहर हो गयी। 2012-13-14 तक केंद्र की यूपीए 2 सरकार को कारपोरेट ने सुस्त सरकार का प्रमाण पत्र दिया या कहें कारपोरेट ने यूपीए 2 सरकार को उनके हित के लिए नकारा करार दिया और उनके हित में तेजी से चलनेवाली राजनीतिक पार्टी की खोज में लग गयी। उसकी नजर में भाजपा चढ़ गयी और उसने भाजपा से संपर्क साधा। कारपोरेट ने भाजपा को हाथोंहाथ उठा लिया। और 2014 के लोकसभा चुनाव में कारपोरेट के सहयोग से भाजपा को लोकसभा में पूर्ण बहुमत मिला। यूपीए 1 तथा 2 दोनों ने कारपोरेट के हित में काम करना शुरू तो किया था। लेकिन दोनों समय वह “तिटंगी दौड़” दौड़ती रही। कारपोरेट को आर्थिक सुधार के मामलों में फर्राटा दौड़ वाली सरकार की जरूरत थी। कारपोरेट को तुरंत रिजल्ट देने वाला “पीएम” चाहिए था, इसलिए कारपोरेट ने तीन सालों तक कारपोरेट नियंत्रित मीडिया के कारण सरकार को हलाकान किया और अंतत: सुस्त पीएम को निकालकर तेज भागने वाले पीएम को लाने में सफल रहा। भाजपा सरकार बनी। अब कारपोरेट ने उस पर जल्दी-जल्दी निर्णय लेने के लिए दबाव बनाना शुरू किया।

कारपोरेट नियंत्रित मीडिया, समाचार पत्र, स्‍तंभ लेखक, संपादकीय केंद्र की भाजपा सरकार को रोज ही ताकीद देते हैं कि ऐसा नहीं… और तेज और तेज और तेज। लेकिन लोकतंत्र में कुछ व्यवहारिक समस्याएं भी उपस्थित होती हैं। आर्थिक सुधारों से संबंधित बिल संसद में या तो पेश ही नहीं किये जा सके या पेश किये गये, तो हल्ला-गुल्ला के कारण उन पर चर्चा तक नहीं हो सकी। दूसरी तरफ भाजपा सरकार पर कारपोरेट का दबाव भी बढ़ने लगा। संसद का शीतकालीन सत्र खत्म हुआ। आर्थिक सुधार संबंधी बिल पारित नहीं हो पाये। भाजपा ने कारपोरेट से वायदा किया था कि अपने प्रथम कार्यकाल के छह माह में ही कारपोरेट को वह मनवांछित परिणाम देगी। लेकिन लोकतंत्र की जरूरतों को पूरा करना भी भाजपा सरकार के लिए जरूरी था, अत: सरकार मनमसोस कर रह गयी।

चुनाव के दौरान भाजपा ने आर्थिक सुधार का वायदा किया था। अपना वायदा निभाना उसके लिए जरूरी था, अत: संसद सत्र का अवसान होते ही मंत्रिमंडल ने अध्यादेश पारित किया और दूसरे ही दिन राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर भी कर दिये। अब सरकार का सीना फूला और कारपोरेट के सामने उपस्थित होकर सरकार ने कहा कि उसने “अपना वायदा पूरा किया।” लेकिन कारपोरेट को अपने हित में लोकतंत्र चाहिए और अपने ही हित में संसद चाहिए। जनता भी उसके पक्ष में हो। कारपोरेट पूरा परिवेश अपने हित में चाहता है। वह दिखाता है कि वह लोकतंत्र की मजबूती का पक्षधर है। कोई उस पर आरोप न लगा दे, इसलिए कारपोरेट का मीडिया कहने लगा कि “कोयला और बीमा पर अध्यादेश लाकर सरकार ने आर्थिक सुधार के रास्ते पर चलने की अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति का सिग्नल दिया है, लेकिन संसद का महत्व कम नहीं किया जाना चाहिए।”

कारपोरेट को खास मतलब से ही संसद की चिंता हो रही है। कारपोरेट चाहता है कि बिल पर संसद में चर्चा हो और सरकार उसे किसी भी तरह पास कराये, जिससे संसद से बाहर राजनीतिक दल विरोध में न आएं। अध्यादेश लाने पर विरोध हो सकता है और जनता को लामबंद करने में राजनीतिक दल सफल हो सकते हैं। कारपोरेट इस अर्थ में संसद के गुण गाता है। एक तरफ अध्यादेश लाने पर सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति की तारीफ कर सरकार को खुश करता है, दूसरी तरफ संसद का महत्व बताकर जनता की नजरों में वह खुद को लोकतंत्रवादी बनना चाहता है। दरअसल इस समय कारपोरेट के दोनों हाथ में लड्डू है। इस समय देश में हो वही रहा है, जो कारपोरेट चाहता है। सरकार तो नाममात्र की है। कारपोरेट चाहता है कि सब कुछ उसे सौंप दिया जाए और वह निर्बाध गति से उड़ते हुए आसमान छू सके।

भूखो ओ, प्यासो ओ
धूल फांक श्रम करो
इंद्रियजित संत बनो
साम्य-स्वप्न-भ्रम हरो
परमपूर्ण अंत बनो
अमरीकी सेठवाद
भारतीय मान लो

कल्पना की दीप्ति, मुक्तिबोध, 1961-62


भाजपा सरकार को कारपोरेट मीडिया प्राय: रोज ही समझा रहा है कि “अति हिंदूवाद” का नारा जो उसके प्रकल्प, उसके कुछ मंत्री, उसके कुछ पदाधिकारी दे रहे हैं, वह बंद हो अन्यथा आर्थिक सुधार का रास्ता कठिन होता जाएगा। कारपोरेट को अपने लिए निर्बाध रास्ता चाहिए, कोई रोड़ा न हो, इसलिए कारपोरेट की अतिहिंदूवाद का नारा नापसंद है। अगर यह नारा उसके लिए लाभप्रद होता, तो कारपोरेट ने आपत्ति नहीं की होती। कारपोरेट को केवल अपना लाभ चाहिए, सरकार किसी भी गुण-धर्म की हो। कारपोरेट का मीडिया संसद में शोरगुल को और व्यवधान को पसंद नहीं कर रहा, क्योंकि इसके कारण आर्थिक सुधार संबंधी बिल पास नहीं हुए और इसलिए कारपोरेट मीडिया फब्ती कस रहा है कि संसद कोई मछली बाजार नहीं है। कारपोरेट मीडिया इस बात पर नाराज है कि संसद के बाहर भी धरना, नारेबाजी चलती रहती है, जिसके कारण सरकार के विधायी कार्य में बाधा उपस्थित होती रही। लेकिन 2012 से 2014 के मध्य तक जब लोकपाल बिल लाने को लेकर संसद के बाहर आंदोलन हुए और संसद का कामकाज हफ्तों बाधित किया जाता रहा और बात-बात में मंत्रियों के त्यागपत्र मांगे जाते रहे, तब कारपोरेट मीडिया ने इसका विरोध नहीं किया। विरोध करना तो दूर आंदोलन का सीधा प्रसारण किया जाता रहा। दरअसल वह आंदोलन “कारपोरेट” की उपज था। कारपोरेट मीडिया यूपीए 2 की हर हालत में विदाई चाहता था।

यह सही है कि यूपीए 2 के समय भ्रष्टाचार जमकर हुआ, महंगाई जमकर बढ़ी। लेकिन इसके कारणों पर चर्चा नहीं करायी गयी। यह नहीं बताया गया जनता को कि उदार आर्थिक नीतियां ही भ्रष्टाचार व आर्थिक कुप्रबंधन के लिए जवाबदार हैं। उनके चलते ही भ्रष्टाचार हो रहा है। इसके विपरीत यह सिखाने का प्रयास किया गया कि यूपीए 2 सरकार जाएगी, तभी भ्रष्टाचार जाएगा। आज जनता देख-समझ रही है कि भाजपा सरकार कांग्रेस की आर्थिक नीतियों को ही आगे बढ़ाने का काम करने में लग गयी है। भाजपा को पूर्ण बहुमत प्राप्त है और कारपोरेट का पूरा साथ है। विदेशी उद्योग जगत भी “वाह वाह” कर रहा है, इसलिए भाजपा सरकार उस रास्ते पर तेज गति से चल रही है। भाजपा सरकार अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए ताबड़तोड़ अध्यादेश ला रही है। अब दुनिया भर के निवेशक खुश होंगे – भारत की जमीन, पानी, जंगल, खनिज, हवा, बिजली सब उन्हें मिलेंगे और सस्ता लेबर भी मुहैया कराने की दिशा में सरकार बढ़ेगी। मीडिया में इस पर चर्चा नहीं करायी जा रही, “पीके” फिल्म पर बहस करायी जा रही है। जनता को भटकाकर, भरमाकर रखने का प्रबंध कारपोरेट ने कर रखा है। सरकार जल्दी में है। आर्थिक सुधार का रिपोर्ट कार्ड उसे कारपोरेट को सौंपना है। मीडिया बता रहा है कि इस सरकार ने सात माह में इतना कर लिया, जो 10 साल में पूर्ववर्ती सरकार नहीं कर पायी।