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Monday, January 05, 2015

कारपोरेट ने भाजपा को हाथोंहाथ उठा लिया।


केंद्र सरकार ने इन सात महीनों में ताबड़तोड़ अध्यादेश जारी कर दिया है। लगता है यह सरकार “अध्यादेश सरकार” के नाम पर प्रसिद्धि पाएगी। 1978 में इंदिरा गांधी ने तत्कालीन जनता सरकार को काम न करने वाली सरकार कहा था और जनता को “गवर्नमेंट दैट वर्क्‍स” लाने का आह्वान किया था – 1980 में जनता सरकार सत्ता से बाहर हो गयी। 2012-13-14 तक केंद्र की यूपीए 2 सरकार को कारपोरेट ने सुस्त सरकार का प्रमाण पत्र दिया या कहें कारपोरेट ने यूपीए 2 सरकार को उनके हित के लिए नकारा करार दिया और उनके हित में तेजी से चलनेवाली राजनीतिक पार्टी की खोज में लग गयी। उसकी नजर में भाजपा चढ़ गयी और उसने भाजपा से संपर्क साधा। कारपोरेट ने भाजपा को हाथोंहाथ उठा लिया। और 2014 के लोकसभा चुनाव में कारपोरेट के सहयोग से भाजपा को लोकसभा में पूर्ण बहुमत मिला। यूपीए 1 तथा 2 दोनों ने कारपोरेट के हित में काम करना शुरू तो किया था। लेकिन दोनों समय वह “तिटंगी दौड़” दौड़ती रही। कारपोरेट को आर्थिक सुधार के मामलों में फर्राटा दौड़ वाली सरकार की जरूरत थी। कारपोरेट को तुरंत रिजल्ट देने वाला “पीएम” चाहिए था, इसलिए कारपोरेट ने तीन सालों तक कारपोरेट नियंत्रित मीडिया के कारण सरकार को हलाकान किया और अंतत: सुस्त पीएम को निकालकर तेज भागने वाले पीएम को लाने में सफल रहा। भाजपा सरकार बनी। अब कारपोरेट ने उस पर जल्दी-जल्दी निर्णय लेने के लिए दबाव बनाना शुरू किया।

कारपोरेट नियंत्रित मीडिया, समाचार पत्र, स्‍तंभ लेखक, संपादकीय केंद्र की भाजपा सरकार को रोज ही ताकीद देते हैं कि ऐसा नहीं… और तेज और तेज और तेज। लेकिन लोकतंत्र में कुछ व्यवहारिक समस्याएं भी उपस्थित होती हैं। आर्थिक सुधारों से संबंधित बिल संसद में या तो पेश ही नहीं किये जा सके या पेश किये गये, तो हल्ला-गुल्ला के कारण उन पर चर्चा तक नहीं हो सकी। दूसरी तरफ भाजपा सरकार पर कारपोरेट का दबाव भी बढ़ने लगा। संसद का शीतकालीन सत्र खत्म हुआ। आर्थिक सुधार संबंधी बिल पारित नहीं हो पाये। भाजपा ने कारपोरेट से वायदा किया था कि अपने प्रथम कार्यकाल के छह माह में ही कारपोरेट को वह मनवांछित परिणाम देगी। लेकिन लोकतंत्र की जरूरतों को पूरा करना भी भाजपा सरकार के लिए जरूरी था, अत: सरकार मनमसोस कर रह गयी।

चुनाव के दौरान भाजपा ने आर्थिक सुधार का वायदा किया था। अपना वायदा निभाना उसके लिए जरूरी था, अत: संसद सत्र का अवसान होते ही मंत्रिमंडल ने अध्यादेश पारित किया और दूसरे ही दिन राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर भी कर दिये। अब सरकार का सीना फूला और कारपोरेट के सामने उपस्थित होकर सरकार ने कहा कि उसने “अपना वायदा पूरा किया।” लेकिन कारपोरेट को अपने हित में लोकतंत्र चाहिए और अपने ही हित में संसद चाहिए। जनता भी उसके पक्ष में हो। कारपोरेट पूरा परिवेश अपने हित में चाहता है। वह दिखाता है कि वह लोकतंत्र की मजबूती का पक्षधर है। कोई उस पर आरोप न लगा दे, इसलिए कारपोरेट का मीडिया कहने लगा कि “कोयला और बीमा पर अध्यादेश लाकर सरकार ने आर्थिक सुधार के रास्ते पर चलने की अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति का सिग्नल दिया है, लेकिन संसद का महत्व कम नहीं किया जाना चाहिए।”

कारपोरेट को खास मतलब से ही संसद की चिंता हो रही है। कारपोरेट चाहता है कि बिल पर संसद में चर्चा हो और सरकार उसे किसी भी तरह पास कराये, जिससे संसद से बाहर राजनीतिक दल विरोध में न आएं। अध्यादेश लाने पर विरोध हो सकता है और जनता को लामबंद करने में राजनीतिक दल सफल हो सकते हैं। कारपोरेट इस अर्थ में संसद के गुण गाता है। एक तरफ अध्यादेश लाने पर सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति की तारीफ कर सरकार को खुश करता है, दूसरी तरफ संसद का महत्व बताकर जनता की नजरों में वह खुद को लोकतंत्रवादी बनना चाहता है। दरअसल इस समय कारपोरेट के दोनों हाथ में लड्डू है। इस समय देश में हो वही रहा है, जो कारपोरेट चाहता है। सरकार तो नाममात्र की है। कारपोरेट चाहता है कि सब कुछ उसे सौंप दिया जाए और वह निर्बाध गति से उड़ते हुए आसमान छू सके।

भूखो ओ, प्यासो ओ
धूल फांक श्रम करो
इंद्रियजित संत बनो
साम्य-स्वप्न-भ्रम हरो
परमपूर्ण अंत बनो
अमरीकी सेठवाद
भारतीय मान लो

कल्पना की दीप्ति, मुक्तिबोध, 1961-62


भाजपा सरकार को कारपोरेट मीडिया प्राय: रोज ही समझा रहा है कि “अति हिंदूवाद” का नारा जो उसके प्रकल्प, उसके कुछ मंत्री, उसके कुछ पदाधिकारी दे रहे हैं, वह बंद हो अन्यथा आर्थिक सुधार का रास्ता कठिन होता जाएगा। कारपोरेट को अपने लिए निर्बाध रास्ता चाहिए, कोई रोड़ा न हो, इसलिए कारपोरेट की अतिहिंदूवाद का नारा नापसंद है। अगर यह नारा उसके लिए लाभप्रद होता, तो कारपोरेट ने आपत्ति नहीं की होती। कारपोरेट को केवल अपना लाभ चाहिए, सरकार किसी भी गुण-धर्म की हो। कारपोरेट का मीडिया संसद में शोरगुल को और व्यवधान को पसंद नहीं कर रहा, क्योंकि इसके कारण आर्थिक सुधार संबंधी बिल पास नहीं हुए और इसलिए कारपोरेट मीडिया फब्ती कस रहा है कि संसद कोई मछली बाजार नहीं है। कारपोरेट मीडिया इस बात पर नाराज है कि संसद के बाहर भी धरना, नारेबाजी चलती रहती है, जिसके कारण सरकार के विधायी कार्य में बाधा उपस्थित होती रही। लेकिन 2012 से 2014 के मध्य तक जब लोकपाल बिल लाने को लेकर संसद के बाहर आंदोलन हुए और संसद का कामकाज हफ्तों बाधित किया जाता रहा और बात-बात में मंत्रियों के त्यागपत्र मांगे जाते रहे, तब कारपोरेट मीडिया ने इसका विरोध नहीं किया। विरोध करना तो दूर आंदोलन का सीधा प्रसारण किया जाता रहा। दरअसल वह आंदोलन “कारपोरेट” की उपज था। कारपोरेट मीडिया यूपीए 2 की हर हालत में विदाई चाहता था।

यह सही है कि यूपीए 2 के समय भ्रष्टाचार जमकर हुआ, महंगाई जमकर बढ़ी। लेकिन इसके कारणों पर चर्चा नहीं करायी गयी। यह नहीं बताया गया जनता को कि उदार आर्थिक नीतियां ही भ्रष्टाचार व आर्थिक कुप्रबंधन के लिए जवाबदार हैं। उनके चलते ही भ्रष्टाचार हो रहा है। इसके विपरीत यह सिखाने का प्रयास किया गया कि यूपीए 2 सरकार जाएगी, तभी भ्रष्टाचार जाएगा। आज जनता देख-समझ रही है कि भाजपा सरकार कांग्रेस की आर्थिक नीतियों को ही आगे बढ़ाने का काम करने में लग गयी है। भाजपा को पूर्ण बहुमत प्राप्त है और कारपोरेट का पूरा साथ है। विदेशी उद्योग जगत भी “वाह वाह” कर रहा है, इसलिए भाजपा सरकार उस रास्ते पर तेज गति से चल रही है। भाजपा सरकार अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए ताबड़तोड़ अध्यादेश ला रही है। अब दुनिया भर के निवेशक खुश होंगे – भारत की जमीन, पानी, जंगल, खनिज, हवा, बिजली सब उन्हें मिलेंगे और सस्ता लेबर भी मुहैया कराने की दिशा में सरकार बढ़ेगी। मीडिया में इस पर चर्चा नहीं करायी जा रही, “पीके” फिल्म पर बहस करायी जा रही है। जनता को भटकाकर, भरमाकर रखने का प्रबंध कारपोरेट ने कर रखा है। सरकार जल्दी में है। आर्थिक सुधार का रिपोर्ट कार्ड उसे कारपोरेट को सौंपना है। मीडिया बता रहा है कि इस सरकार ने सात माह में इतना कर लिया, जो 10 साल में पूर्ववर्ती सरकार नहीं कर पायी।

Friday, January 02, 2015

#AAP ने पकड़ा मोदी सरकार का झूठ।

भाजपा की केंद्र सरकार दिल्ली में अनधिकृत कालोनियों को नियमित करने से संबंधित अध्यादेश के बारे में लोगों को गलत सूचना दे रही है। मीडिया ने यह गलत खबर प्रकाशित की है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अनधिकृत कालोनियों को राहत देने के लिए संबंधित अध्यादेश को मंजूरी दे दी है। जबकि सच्चाई यह है कि केंद्रीय मंत्रीमंडल ने न तो किसी अध्यादेश को मंजूरी दी है और न ही किसी तरह के कानून को लागू किया है।

नरेंद्र मोदी सरकार ने भी पूर्व शीला दीक्षित सरकार के स्वांग दोहराने की कोशिश की है। मौजूदा केंद्र सरकार ने भी केवल समय सीमा की तारीख बदल कर इन कालोनियों में रहने वाले गरीब लोगों को मूर्ख बनाने की कोशिश की है।

इस मुद्दे पर आम आदमी पार्टी ने केंद्र सरकार को चुनौती दी है कि वह उन सभी अनधिकृत कालोनियों की सूची को सार्वजनिक करे, जिन्हें नियमित करने की घोषणा की गयी है। साथ ही नियमित होने की तारीख की घोषणा करने की भी चुनौती दी है।

सच्चाई यह है कि केंद्र सरकार ने इन अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने की घोषणा से पहले की उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया है।

अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने की घोषणा से पहले इन तथ्यों पर गौर करना भी जरूरी है –

1) सबसे पहले, घर के मालिकों को कानूनन मालिकाना हक देने से पहले भूमि के उपयोग से संबंधित कानून में परिवर्तन किया जाना जरूरी है।

2) दिल्ली में ज्यादातर अनधिकृत कालोनियां डीडीए और एएसआई की भूमि के अलावा कृषि भूमि व वन भूमि पर बसी हैं। इन एजेंसियों के साथ भी इनकी जमीनों से संबंधित उपनियमों में परिवर्तन किया जाना जरूरी है। केंद्र सरकार ने क्या अब तक इस दिशा में किसी तरह के कदम उठाए हैं?

3) क्या केंद्र सरकार इसकी गारंटी दे सकती है कि उसकी इस घोषणाभऱ से इन कालोनियों में बिजली पानी के अलावा दूसरी बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था भी हो जाएगी?


केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने ऐसा कोई रोडमैप भी तैयार नहीं किया है कि अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने की उसकी घोषणा शीला दीक्षित सरकार से किस तरह अलग है? शीला दीक्षित सरकार ने भी अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने की घोषणा की थी। लेकिन जिस तरह इऩ कॉलोनियों के बाशिंदों को उनके घरों के कानूनन हक दिये बगैर प्रोविजनल सर्टिफिकेट बांटे गये, वह महज एक घोटाला ही साबित हुआ।

क्या शहरी विकास राज्य मंत्रालय बता सकता है कि इन अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने की दिशा में उसकी क्या पहल होगी? और क्या वह इस बात से इनकार कर सकता है कि इन कॉलोनियों को नियमित करने की घोषणा महज चुनाव के पहले की जनता को लुभाने की नौटंकी भर है?