Sunday, January 11, 2015

रेल मेंअब कोई लटक-फटक के नहीं जाने वाला है

आज ही का तो दिन था...लगभग 400 साल पहले...सूरत में ईस्ट इंडिया कंपनी का पहला कारखाना तैयार हुवा था. तब का मुग़लिया बादशाह जहाँगीर और तमाम जनता भी बहुत खुश थी. किसी को आनेवाले वक़्त का अंदेशा नहीं था. खैर, हम अभी की बात करते हैं. आज ज़्यादातर हिन्दुस्तानियों की सुबह चाय से ही होती है. 1920 के दशक से पहले इस मुल्क़ में चाय संस्कृति ने घुसपैठ नहीं किया था. तब ईस्ट इंडिया कंपनी की टी बोर्ड ने लोगों को मुफ़्त में चाय पिलाना शुरू किया. चूँकि इस देश में धर्म-संस्कृति को आधार बनाए बिना जनमानस तक पहुँचना मुश्किल होता है, तो कंपनी ने चाय को वेद वर्णित संजीवनी से जोड़कर प्रचारित किया. 1950 तक यह चाय मुल्क़ के गाँवों तक पहुँच गया था. आज चाय की कितनी सारी कम्पनियाँ इस लत से संजीवनी पा रही है...माल बना रही है...लोगों की जेबों से सबसे पहले पैसा निकाल रही है.
अब आज के दिन की बात करते हैं. साहेब ने बिजली के पूर्ण निजीकरण का लोकलुभावन तरीका जनता को दे दिया. जनता मस्त, कि मोबाइल प्रोवाइडर की तरह वो बिजली कंपनी को भी पोर्ट करने का मज़ा लेगी. कोयले के खदानों का निजीकरण भी ज़ल्दी ही होगा. रेलवे की बात तो बहुत आगे जा चुकी है. रक्षा क्षेत्र में एफ डी आई की खबर सबको मालूम होगी ही. चिकित्सा के उपकरण बनाने के क्षेत्र में सौ प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश स्वीकृत हो चुका है. भूमि अधिग्रहण अधिनियम के नये संशोधन से खेती की ज़मीन अम्बानियों-अदानियों के गोद में धर दिए जाने का भी बन्दोबश्त हो गया है. आप मग्न रहिये भक्ति में, कि कोई रामराज्य आनेवाला है, कि अपना मुल्क़ गुप्तकाल की तरह सोना-सोना होनेवाला है, कि अखंड हिन्दू राष्ट्र बनने वाला है, कि अम्बानी की कंपनी आपको बिजली के साथ में फ्रीज भी देनेवाली है, कि रेलवे में अब कोई लटक-फटक के नहीं जाने वाला है, कि कभी भी आते काले धन का आपका हिस्सा आपके अकाउंट में टपकने वाला है. बड़ी ज़ल्दी नशा फटेगा और तब दर्द से सिर फटने का आनंद लीजियेगा.
संयोग देखिये, कि ये नामुराद चाय तब भी अहम भूमिका में थी और ये दिल्ली शहर तब भी गुलामी की आधारशिला के रखे जाने की गवाह थी.
बाक़ी, फिलहाल तो एक काम करिए कि भक्तिकाल से थोडा बाहर आकर संस्कृति और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का बत्ती बनाकर धर लीजिये. सिरदर्द के समय खुद को बहलाने के काम आयगा.

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