पेरिस के हादसे की चारों तरफ निंदा हो रही है। यह जायज भी है। लेकिन इस निंदा अभियान में एक बड़ा तबका है जिनके मुसलिम विरोधी मानस को बड़ा संतोष हो रहा है। इसी बहाने वे आम मुसलमानों को अपनी टिप्पणियों में निशाना बना रहे हैं। सोशल मीडिया पर ऐसी हरकत बड़े पैमाने पर देखी जा सकती है। हैदर रिज़वी ने इसी मसले पर अपनी बात रखी है
♦ हैदर रिज़वी
इतना फड़फडाने की जरूरत नहीं है। आपकी अभिव्यक्ति की आजादी आपको ये स्वतंत्रता नहीं देती कि आप आये दिन किसी के धर्म का मजाक उड़ाएं। मुसलमान जाहिल है, कूपमंडूक है, पागल है … पर आप तो समझदार हो। सांड को लाल कपड़ा दिखाते ही क्यूं हो? जब आपको पता है कि मुहम्मद साहब की तस्वीर तक नहीं बनाते, तो फिर बार बार कार्टून बनाकर साबित क्या करना चाहते हो?
रही बात कार्टून के विरोध की, तो फिर वही निदा फाजली साहब वाली बात कि “उठ उठ के मस्जिदों से नमाजी चले गये, दहशतगरों के हाथ में इस्लाम रह गया”। इस कार्टून का विरोध यदि मुसलमानों ने किया होता, तो उनके धर्मगुरुओं का फतवा आता। हर देश में इसका विरोध होता, किंतु ऐसा नहीं हुआ। चंद जाहिल और बर्बर बंदूकधारी मैगजीन के दफ्तर जाते हैं और खुदाई फैसला सुना आते हैं।
लेकिन फिर मुझसे यह उम्मीद क्यों रखी जाती है कि मैं इनके या उनके किसी के भी समर्थन में बोलूं? न मैंने कार्टून बनाया, न ही मैंने हत्या की। हां, हत्या करने वाला खुद को मेरे मजहब का बताता है। हां, हत्या मेरे पैगंबर के कार्टून के विरोध में की गयी, इसके लिए तो हम खुद शर्मिंदा है। गली गली इस्लाम के खिलाफ हुंकार लगाने या अपनी सफाई देने से बेहतर है अब मुसलमान साफ साफ दो हिस्सों में बांट जाए।
एक वो मुसलमान जिन्हें खुद ही सारे फैसले करने हैं हथियारों या फतवों के दम पर, दूसरे वो जो ऐसी हर घटना पे खून के घू्ंट पीकर आपकी गालियां सुन कर भी चुप रह जाते हैं और दुबारा अपनी रोजी रोटी में लग जाते हैं।
गलती आपकी नहीं है, आपको तो मजा आ रहा है। आप तो बढ़िया तरीके से एनजॉय कर रहे हैं, गलती हैदर रिजवी जैसे मुसलमानों की है कि वो मुसलमान क्यूं पैदा हो गये। और अगर हुए ही थे तो इस शांत देश और अनुकूल वातावरण में क्यूं पैदा हो गये। हमें तो अफगान के पठारों में स्टेनगन के साथ पैदा होना चाहिए था। क्योंकि आपके हिसाब से हमारी सोच और हमारा सही स्थान वही है।
आस्ट्रेलिया के मॉल में एक ईरानी क्रिमिनल घुस कर दो लोगों को मार देता है, गुस्सा हैदर रिजवी पर आता है आपको, पेशावर में बच्चे मरते हैं गुस्सा हैदर रिजवी पे, कार्टूनिस्ट मारा गया गुस्सा हैदर रिजवी पे। नक्सल किसी को मारते हैं, तो मुझे अपने पड़ोसी हिंदू पर तो गुस्सा नहीं आता? भिंडरावाला ने लोगों को मारा, मुझे सिक्खों के साथ तो कोई गुस्सा नहीं है? रणवीर सेना ने बच्चों को तलवारों पे टांग दिया, मुझे तो अपने ठाकुर पंडित दोस्तों पर गुस्सा नहीं आया? तमिलों ने मेरे प्रधानमंत्री को मार दिया, मुझे साउथ इंडियंस से नफरत तो नहीं? बोडो रोज खूंरेजी करते हैं, मुझे नार्थ ईस्ट वालों से कोई गुस्सा नहीं? पाकिस्तान रोज भारत में खुराफाती हरकतें करता रहता है मुझे पाकिस्तानियों से नफरत तो नहीं? बाबा और साधू रोज जेल जाते हैं, मुझे अपने मोहल्ले के पुजारी से उतनी ही मुहब्बत रही…
तुम लोग करवाओ अपने दिमाग का इलाज। खोट कहीं तुम्हारे दिमागों में है, मेरे इनबॉक्स में आकर बुद्धिजीविता और देशभक्ति न झाड़ो।
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