Tuesday, March 19, 2013

राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम के "गिद्ध"!


एक गरीब जो दिन भर बमुश्किल आधा पेट भरने के हिसाब से कमाई कर पाता है तो क्या उसे इस देश में इसलिये जीने का हक नहीं है क्योंकि वह प्रशासकीय अव्यवस्था और भ्रष्टाचारी माहौल की वजह से अपनी तमाम जिन्दगी अपना व अपने परिवार के भरण पोषण में व्यतीत कर देता है और उसे शिक्षित व जागरूक होने का मौका नहीं मिल पाता जबकि उसके द्वारा किये जा रहे कार्य खरीदने या बेचने वाली हर वस्तु पर रुपया उसे कर(Tax) के रूप में अदा करना ही पड़ रहा है, जबकि उसे सरकारी व्यवस्था से मिलने वाला सरकारी सहयोग प्राप्त नहीं होता यह तो सर्वविदित हैं| मगर हद तो तब हो जाती है जब चील-कौये और गिद्ध के समान वे सरकारी कर्मचारी इन मासूम ज़िन्दगियों की उस चमड़ी को भी नोच लेना चाहते हैं, जो उनके शरीर के ऊपर एक पतली चादर के समान है जिसके अन्दर की एक-एक हड्डी तक साधारण आँखों से नजर आ जाती है| यह पूरा नजारा नजर आयाराजस्थान राज्य पथ परिवहन निगमकीबस नं. RJ-27-PA-0032 (STAR LINE)जिसपर श्री. मनोज सोलं दिनांक 12-03-2013 समय16:15:34 PM कोगोगुंदा बाइपास से उदयपुरसवार हुये और जब उन्होंने 24 रु. केटिकिटके लिये100/-रु.परिचालक को दिये तो परिचालक ने5/- रु.वापस किया, श्री. मनोज सोलंकी ने सोचा कि बाकी रुपयापरिचालक मुहमद ख़ान उन्हें बाद में वापस कर देगा मगरआखिरी स्टॉप (बडगाव)आने तक परिचालक ने ऐसा कोई एहसास नहीं कराया, जिससे यह मालूम पड़े कि परिचालक बाकी बचे रु. लौटाने का ईरादा रखता हो, आखिर श्री. मनोज सोलंकी को परिचालक को याद दिलाने की जरूरत पड़ ही गई कि "क्या रु. वापस किये जायेंगे", जबकि परिचालक के पास काफी समय पहले से ही छुट्टे रुपये जमा थे, पूछने पर परिचालक ने जवाब दिया कि"मैंने रुपये वापस कर दिये हैं", परिचालक की तरफ से यह भी कहा गया कि"आपने रु. पहले क्यूँ नहीं मांगे?"इसके जवाब में श्री. मनोज सोलंकी को कहना पड़ा कि"जब आप मेरे साथ ऐसा व्यवहार कर रहे हैं, तो इन मासूम व गरीबों के साथ कैसा व्यवहार करते होंगे? इन्हें तो आप जैसे लोग कदम-कदम पर लूटते होंगे?" ऐसा कहने पर बस में बैठी कई सवारियों ने कहा कि"हमारा भी 2-3 रु. रोजाना ये रख लेते हैं, वापिस नहीं करते और अधिक बोलने पर बस से नीचे उतार देते हैं"|यह सब होने पर परिचालक ने श्री. मनोज सोलंकी से कहा कि"तुम कौन हो, जो मुझसे इस तरह बातचीत कर रहे हो?"श्री. मनोज सोलंकी ने कहा कि"मैं एक आम नागरिक हूँ"और उन्होंने अपनाID Card परिचालक को दिखाया, जिसके बाद परिचालक फौरन माफी माँगने लगा|
इस पूरे प्रकरण में यह साफ नजर आता है कि राजस्थान सरकार और उसकी राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम किस प्रकार मदहोशी में सोई हुई है और जिन गरीबों और मासूमों के बल पर सत्ता में बैठ कर सत्ता सुख हासिल कर रही है उसके राज्य में इन मासूमों के साथ किस प्रकार का अन्याय किया जा रहा है और वह भी सीनाजोरी के साथ| ऐसी हजारों बसें राज्य के ग्रामीण इलाकों से भ्रमण कर रही हैं और उसमें काम करने वाले कर्मचारी किस प्रकार से वेतन, महँगाई भत्ता व बोनस लेने के साथ-साथ प्रतिदिन का ही लगभग 500/- रु. से 1000/- रु. तक की लूटमार इन गरीबों की चमड़ी को नोंच कर खाने का कार्य कर रहे हैं| दिखने में तो यह हमसब के लिये 1-2 रु. हो सकता है लेकिन उन मासूमों के लिये तो यह 2/- रु. उनके दिनभर के पेट भरने का साधन बन सकता है, अगर 1 बस से यह कर्मचारी दिनभर में 500/- रु. भी इस गैर-कानूनी तरीके से ग्रामीणों को लूटकर कमाते हैं तो पूरे महीने में 15000/- रु. के आसपास और वर्ष भर में 1 लाख 80 हजार रु. के आसपास गैर-कानूनी रूप से गरीबों व मासूमों की हाय लेते हुये प्राप्त करते हैं जो शायद उनकी अय्याशी के काम ही आती होगी|
हमारी, राज्य सरकार व राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम से माँग है कि इस परिचालक के ऊपर तो फौरन कार्यवाही की जाये और उसका जवाब संस्था को लिखित में दिया जाये और साथ ही इस प्रकार का घिनौना कार्य परिवहन निगम की बसों में न हो उसकी व्यवस्था फौरन ही करवाई जाये, जिससे इन मासूमों के पेट पर लात मारने वाले इन दरिंदों को नसीहत मिल सके व सजा प्राप्त हो और इनके अंजाम को देखते हुये अन्य कर्मचारी ऐसे किसी भी घिनौने कार्य को करने से पहले उसके अंजाम को दिलों में बैठा लें जिससे आपके परिवहन निगम का नाम ऊँचा हो सके| हम समझ सकते हैं, कि यह एक छोटा सा अपराध है, जिसके मामले में इतने कड़क शब्दों का प्रयोग करना उचित नहीं है मगर हम यह भी जानते हैं कि मकान में उग रहे छोटे पीपल के पौधे को अगर हम उसकी बाल्यावस्था में ही समाप्त न करें तो वह बड़ा होने पर मकान को नुकसान पहुँचाने का कार्य करेगा जबकि बड़े होने पर हमारे द्वारा उसे नष्ट करने पर पेड़ से ज्यादा नुकसान हमारे मकान को ही होगा| अतः जरूरत है बाल्यावस्था में ही ऐसे अपराधों पर रोकथाम लगाई जाये|
जरूरी है ऐसे कर्मचारियों को सजा दिलाना यह कार्य हम इसलिये नहीं करना चाहते कि हमारी इनसे निजी दुश्मनी है, बल्कि हम इसलिये चाहते हैं कि अगर इनको सजा मिली तो उस डर से बाकी के कर्मचारी गिद्धों के समान इन मासूमों का शोषण करने की हिम्मत न कर सकें क्योंकि हम जानते हैं कि स्प्रिंग को उतना ही दबाया जा सकता है जितनी उसमें दबने की क्षमता है, जहाँ अति हो गई तो वह या तो टूट जायेगी या पलट कर आप पर वार करेगी और नुकसान पहुँचायेगी| हम नहीं चाहते कि कोई उधम सिंह बनकर ऐसे मामले को सुलझाने की पहल करे, एक बारगी उधम सिंह तो ठीक हैं क्योंकि वह कुछ समझदार हैं मगर यह मासूम तो उस माटी के पुतले हैं जिन्हें जिस तरह चाहे मोड़ा जा सके और अगर इनके गुस्से का उपयोग गलत दिशा में हो गया तो वे यह नहीं देख पायेंगे कि कौन सही है और कौन गलत बल्कि अंजाम सबको भुगतना पड़ जायेगा और हम ऐसी स्थिती आने से पहले ही परिस्थितीयों को बदलना चाहते हैं और चाहते हैं कि दरिंदगी की इन वारदातों को रोका जाये|
हम चाहते हैं कि एक नज़र इस मामले को उदाहरण के रूप में लेते हुये समझें - अगर एक महिला जिसको जबरन उसकी अनुमति के बिना बालविवाह करवा दिया जाता है और अदालत भी इस इल्जाम पर उस महिला का साथ देती है मगर दूसरी अदालत इसलिये उसे सरकारी नौकरी से वंचित करती है कि"उसने बालविवाह किया था"(अदालत के अनुसार - परिस्थिती चाहे कुछ भी हो अगर हमने उसे नौकरी दी तो उसका संदेश समाज में गलत जायेगा और बालविवाह को कानूनी सहमती माना जायेगा) इस वजह से उसे नौकरी से वंचित कर दिया गया| जबकि पहली अदालत ने खुद कहा कि उस महिला के साथ अन्याय हुआ है, उसका जबरन विवाह करवाया गया है जिसमें विवाह करवाने वालों को दोषी माना गया| जब एक महिला को कानून का गलत संदेश ना जाये"इस बिनाह पर नौकरी से वंचित किया जा सकता है", तो राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम में गिद्ध के समान काम करने वाले"ऐसे कर्मचारियों के खिलाफ भी कठोर कार्यवाही होनी चाहिये"यही हमारी राज्य सरकार और राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम से प्रार्थना है|

कुछ भी मौलिक नहीं होता!


‘कोई मौलिक विचार बूझ पाना या कुछ मौलिक रच पाना बहुत ही दुष्कर कार्य है, सामान्य प्रयासों और परिस्थितियों में लगभग असंभव। आप धीरे-धीरे यह समझेंगे। ‘ यह कुछ समझ आता है।
इसकी पृष्ठभूमि में एक और महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि मौलिकता की अवधारणा को अधिकतर वैयक्तिकता के साथ जोडकर देखा जाता है, परंतु यह पूरा सच नहीं हैं। कुछ भी मौलिक नहीं होता, ऐसा भी कहा जाता है।
सभी भौतिक और वैचारिक अवस्थाएं एक क्रमिक विकास में होती हैं। यानि मानवजाति अपने अनुभव और ज्ञान को संचित करते हुए, उसे आगे की पीढ़ी को अंतरित करते हुए, उसका क्रमिक विकास करती हुई यहां तक पहुंची है, और यही अभी भी जारी है। यानि कि हर स्तर का ज्ञान, अपने पूर्व के ज्ञान पर ही अवलंबित होता है। हर नया विचार या खोज, मानवजाति की पूर्व के अनुभवों के इसी संचय पर निर्भर करती है।
इसका मतलब यह हुआ कि किसी ज्ञान, विचार या खोज के पीछे पूरी मानवजाति के ज्ञान की थाति अपना काम कर रही होती है, अपना योगदान कर रही होती है, उस खोज की पूर्वपीठिका तैयार करती है। कोई भी व्यक्ति शून्य से शुरू करके, मानवजाति के संचित ज्ञान से अपने को अद्यतन किए बगैर कुछ नहीं कर सकता। यानि क्या वैयक्तिकता का दावा ( यहां आप पेटेंट बगैरा को रख सकते हैं, वैयक्तिक अश्लील रॉयल्टीज़ को रख सकते हैं ) बिल्कुल ही गैरवाज़िब नहीं होना चाहिए ?
नितांत नवीन और मौलिक कार्यों के व्यक्तिगत प्रयासों के लिए थोड़ा-बहुत वैयक्तिक श्रेय दिया जा सकता है, ज्ञान की इसी क्रमबद्धता में उनके पड़ाव को उनसे जोड़कर देखा जा सकता है, उनकी सांयोगिक ऐतिहासिकता को दर्ज़ किया जा सकता है। परंतु संपूर्ण मानवसमाज के क्रमिक रूप से संचित ज्ञान और अनुभवों के आधारों पर परवान चढ़ सके इस वैयक्तिक अवदान के लिए उन्हें असामाजिक और अश्लीलता के स्तर तक पहुंचे, किन्हीं विशेष फायदों के लिए लाइसेंस नहीं दिया जा सकता।
परंतु अभी यही हो रहा है, बाज़ारवाद ऐसे वैयक्तिक अवदानों को अपने हित में प्रोत्साहित करता है, उन्हें एक भरपूर हिस्सा देता है, और उन्हें और खोजों को अपने मुनाफ़ों की सेवा में लगाए रखता है। चारों तरफ़ लूट मची है, और उस लूट में अपनी हिस्सेदारी के लिए अफरातफरी भी। पूरे मानवसमाज के क्रमिक प्रयासों से निर्मित उसकी इस दुनिया को कुछ मानवसमूह अपने हितार्थ जमकर दोहन करने में लगे हैं।
‘यानि क्या वैयक्तिकता का दावा बिल्कुल ही गैरवाज़िब नहीं होना चाहिए ?’ यह सवाल…
अगर इस प्रश्न का जवाब दें तो शायद यह हो, ‘ हां, वैयक्तिकता का दावा बिल्कुल ही गैरवाज़िब होना चाहिए।’ यही मंतव्य था।
यह अश्लील रॉयल्टी क्या है, समझ नहीं आया।
वैयक्तिक पेटेंट या व्यक्तिगत श्रेयों के लिए, उस का व्यवसायिक प्रयोग करके उसके ज़रिए अकूत मुनाफ़ा कमाने वाले व्यक्ति, समूह अथवा कार्पोरेट्स काफ़ी बड़ी मात्रा में रॉयल्टी के रूप में मुनाफ़े का हिस्सा पहुंचाते हैं, या वह ख़ुद इसे मोटी रकमें लेकर बेचते हैं।
इसे अश्लील, इन श्रेयों के पीछे के सामाजिक अवदानों के सापेक्ष कहा गया है जिसको पिछली बार विस्तार देने की कोशिश की गई थी। यानि जिसके पीछे पूरी मानवजाति, समाज का अवदान हो, उसे भुलाकर, या कहे नकार कर अपने लिए वैयक्तिक रूप से अय्याशी के महल खड़े कए लेना हमें तो अश्लील ही लगता है, खासकर इन हालात में जबकि मानव-समाज का बहुल हिस्सा जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति से भी महरूम है।

Monday, March 18, 2013

आम आदमी नहीं, बनायें काम का आदमी!



4,28,00 का आंकड़ा वित्त मंत्री के बजट भाषण के बाद देश भर में चल गया है। एक अरब बीस करोड़ से अधिक आबादी वाले देश मेंइतने लोग मिले हैं जिनकी टैक्स देने वाली आमदनी एक करोड़ या उससे अधिक है। इसमें टाटा भी हैं अंबानी भी और हमारे जिले केकुछ लोग भी। यह संख्या कहां से आई किसी को पता नहीं। अनुमान लगा सकते हैं कि 4,28,00 करोड़पति हैं जो टैक्स देते हैं औरजिनका रिकॉर्ड सरकार के पास है।

हम एक विचित्र देश में रहते हैं। यहां इस बात पर भी विवाद हो जाता है कि गरीब कितने हैं और जहां इस बात पर भी फै सला नहीं होपाता कि अमीर कितने हैं। वो दो सौ कौन हैं जो 4,28,00 टैक्स भरने वाले करोड़पतियों में नहीं  सके वर्ना यह संख्या 4,30,00 होजाती। ये दो सौसौ दो सौ से रह गए या कुछ लाख से। भारत ने शून्य की खोज की थी। पर हम इस शून्य का इस्तेमाल हर संख्या कोबढ़ाने में नहीं बल्कि उसे जीरो करने में ही करते रहते हैं। आपको जानकर खुशी होगी कि ये करोड़पति फाल्गुन के महीने में उदास है।वित्त मंत्री ने इन पर दस प्रतिशत का अतिरिक्त टैक्स लगा दिया है। इन करोड़पतियों का रोना इस बात पर है कि उन्हें अमीर होने कीसजा दी जा रही है। अब तक ऐसा ही रोना गरीब रोते रहे कि गरीब होने की सज़ा दी जा रही है। अमीरों ने गरीबों का रोना मार लिया है।बेचारे ऐसे रो रहे हैं कि जैसे इस होली में पांच लाख वाली शराब की बोतल नसीब नहीं होगी।

अव्वल तो वित्त मंत्री को बताना चाहिए था कि ये करोड़पति ठीक से गिन लिये गए हैं या अभी और गिने जायेंगे। अंदाज़ी टक्कर से टैक्स का हिसाब पूरा नहीं होता।विदेशी और भारत में बनने वाली कारों पर टैक्स बढ़ाकर ठीक ही किया है। इस देश में लोग साठ लाख से दो करोड़ रुपये की कार पर आराम से चलने लगे हैं। चिदंबरमअगर काला धन वसूलने को लेकर गंभीर होते तो इन कारों पर और टैक्स लगाते। जैसा कि उन्होंने एसयूवी कारों पर टैक्स लगाया है। मैं इन कारों को गुंडा गाड़ी कहताहूं। ऐसी कारें ज़्यादातर छुट भैयोंनेताओंविधायकोंसांसदोंठेकेदारोंईंट-भट्टा वालों के यहां ख़ूब दिखती हैं। सड़क पर यह गाडिय़ां शोहरत और ताकत के अहंकार काप्रदर्शन करती हैं। एक सामान्य कार के पीछे इतना करीब आकर ब्रेक मारती हैं जैसे कुचलकर जाने का मन बना ही लिया था मगर मेहरबानी कि फै सला आखऱी क्षण मेंबदल दिया। अपने आस-पास नजऱ घुमाकर देखियेइन भीमकाय गाडिय़ों में कौन लोग चलते हैं और जब ये किसी शादी ब्याह में इनसे उतरते हैं तो इनका हाव-भावक्या होता है। ये गाडिय़ां आप किसानों का डीज़ल पी जाती हैं। चिदंबरम की नजऱ सिर्फ  इन कारों पर पड़ी हैं वर्ना अगर वे इनके खऱीदारों को देखते तो पता चलता कि देशमें करोड़पतियों की असली संख्या क्या है।

दुनिया में बड़े भारी अर्थशास्त्री हुए हैं प्रोफ़े सर अमत्र्या सेन। नोबेल पुरस्कार मिला है। प्रो सेन ने रोने का समाजशास्त्र निकाला है। कहा है कि जो अमीरों से कुछ गऱीब हैवो अपने आपको आम आदमी कहने लगे हैं। ये वो मध्यमवर्ग है जो होता तो खाता-पीता है मगर मौक़ा पडऩे पर अमीर-गऱीब दोनों बन जाता है। मनमोहन देसाई कीफि ल्मों की तरह। तो प्रो सेन की बात सही लगती है तो आम आदमी को अपनी नई पहचान ढूढनी पड़ेगी। वैसे आम आदमी भी अपने आप में कोई न्याय का प्रतीक नहींहै। राजनीतिक दलों को गऱीब कहना ठीक नहीं लगा तो उन्होंने आम आदमी का नाम दे दिया। मज़दूर किसान और गऱीब की श्रेणियों या पहचान को उस आदमी मेंमिला दिया गया जिसमें मध्यमवर्ग भी शामिल किया था। आम आदमी एक नागरिक और अराजनीतिक पहचान है। इसमें राज्य या राजनीतिक दल की नाकामी नहींझलकती है। इसलिए जब मध्यमवर्ग इस निरपेक्ष पहचान को अपना बना लेता तो है इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है। इसलिए आम आदमी को खुद से इस पहचानको छोड़ गरीब मज़दूर किसान की पहचान पर लौट जाना चाहिए। इस पहचान में उनकी राजनीतिक आकांक्षाएं छिपी हैं। उस मध्यमवर्ग को आम आदमी बनकर रोनेदीजिए जो आप किसानों की सब्सिडी का डीज़ल पी कर आपकी सब्सिडी का विरोध करता है।

चिदंबरम साहब का हिसाब किताब जो भी हो अगर पैसा समय पर और पूरा का पूरा आपके इलाके और हाथ में नहीं पहुंचे तो क्या  ायदा। सरकार अब कई योजनाओंके पैसे सीधे आपके हाथ में देना चाहती है। यानी आम आदमी से आपका पैसा आपके हाथ का नारा है। कहीं ऐसा  हो कि ये पैसे इतने कम पड़ जाएं कि आपका कामही  चले। सोचियेगा। यह योजना अच्छी तो लगती है पर क्या ऐसा नहीं हो सकता कि सरकार अच्छा स्कूल और ब्लाक स्तर पर बेहतरीन अस्पताल बना कर दे जहांसबको सस्ता इलाज मिल सके। जब तक सरकार सामाजिक सुरक्षा को पेशेवर और जवाबदेही के साथ संस्थागत रूप नहीं देगी आपका कल्याण नहीं होगा। ठीक वैसे हीजैसे रिश्तेदारों के यहां से मिले विदाई के पैसे से आप अमीर नहीं हो जाते। ठीक वैसे ही जैसे दुल्हन के आँचल में चावल और दूब के साथ सौ का नोट रख देने से हमीमूनका ख़र्चा नहीं निकल आता है  आम आदमी नहीं सरकार से कहिये काम का आदमी बनाए। आदमी को काम चाहिए आम नहीं।

Thursday, March 14, 2013

खबर खरीदने का एक दिलचस्‍प खेल शुरू होने वाला है


♦ अरविंद दास
खबार एक ‘प्रोडक्ट’ (उत्पाद) है, जिसे संपादक की कम, ब्रांड मैनेजर की ज्यादा जरूरत है… इस बात की चर्चा अखबारों के दफ्तरों में 80 के दशक के उतरार्द्ध में शुरू हो गयी थी। टाइम्स ग्रुप के अखबार इस ‘ब्रांड विमर्श’ के अगुआ थे। वर्तमान में हिंदी के लगभग सभी अखबार किस तरह से बाजार के सुर में सुर मिलाकर अपना व्यवसायिक हित साध रहे हैं, यह वर्ष 2009 में हुए लोकसभा चुनाव और बाद के विधान सभा चुनावों में पत्रकारिता ने जो भूमिका निभायी, उससे खुल कर सामने आ गया। प्रभाष जोशी ने इस सिलसिले में नोट किया था:
“अखबारों ने बाकायदा पैकेज बनाये थे और रेट कार्ड छापे थे। पैकेज में चुनाव कवरेज के सभी क्षेत्र कवर किये गये थे। फोटू से लेकर इंटरव्यू और अपील तक की अलग-अलग साइज के अलग-अलग दाम तय किये थे। जिनने ये पैकेज खरीदे, उन्हीं की खबरें छपीं। जिनने नहीं खरीदे, वे अखबारों के पेजों से गायब रहे।”
असल में जिसे 2009 में ‘पेड न्यूज’ कहा गया और उसकी ‘औपचारिक शुरुआत’ बैनेट कोलमन एंड कंपनी या टाइम्स ग्रुप, जिसके तहत नवभारत टाइम्स प्रकाशित होता है, ने 2003 में मीडिया नेट कंपनी बना कर कर दी थी। इसके तहत टाइम्स ग्रुप के अखबारों के परिशष्टों (Supplement) में कोई व्यक्ति, संस्था, वस्तु या फिल्म का प्रमोशन खबर के रूप में पैसे देकर कर करवा सकता है। वर्ष 2005 में टाइम्स ग्रुप ने मीडिया नेट से आगे जा कर ‘प्राइवेट ट्रीटीज’ – जिसे उन्होंने ‘ब्रांड कैपिटल’ कहा – की शुरुआत की। इसके करार के तहत टाइम्स ग्रुप के अखबार कंपनियों के विज्ञापन की लागत के बदले उनसे इक्विटी लेता है। लगभग 500 कंपनियों के साथ बैनेट कोलमन कंपनी ने इस तरह का करार किया है। स्पष्टत: इस तरह का करार पाठकों के विश्वास के साथ धोखा है।
NBT Plusहाल ही में (2012) टाइम्स ग्रुप के मालिक ने प्रतिष्ठित अमेरिकी पत्रिका द न्यूयॉर्कर से बात करते हुए कहा, “हम खबरों का नहीं विज्ञापन का कारोबार करते हैं।” हालांकि मीडियानेट को लेकर जब टाइम्स ऑफ इंडिया ने मार्च 2003 में अखबार में खबर दी, तब उसने इसे ‘हिताहित का ध्यान रखने वाला, लेखा परीक्षक और प्रहरी की भूमिका में देखा था जो मीडिया की पीआर सेक्टर के साथ बढ़ते मेल जोल का नियमन करेगा।” जाहिर है, पेड न्यूज की परिघटना का जनक टाइम्स ग्रुप है और भूमंडलीकरण के दो दशकों के बाद ‘इस कारोबार’ को लेकर अखबार को कोई मलाल नहीं!
पिछले दो दिनों से नवभारत टाइम्स, दिल्ली ने पहले पन्ने पर ‘हो गया NBT+’ नाम से खुद का एक विज्ञापन दे रहा है, जिसमें लिखा है – ‘अब आपको हर रोज अखबार लगेगा एनबीटी प्लस। यानी अब आपको अपने पसंदीदी सप्लिमेंट हैलो डेल्ही का पूरा मसाला चार बढ़े हुए पेजों के साथ मुख्य अखबार के पन्नों में ही मिल जाएगा।’ और फिर इस बदलाव पर पाठकों से राय मांगी गयी है।
जब मैंने नवभारत टाइमस फोन कर पूछा कि पहले तो सप्‍लीमेंट के नीचे ‘एडवरटोरियल, इनटरटेनमेंट प्रमोशनल फीचर’ लिखा होता था, लेकिन आज के अखबार में ऐसा तो नहीं दिख रहा है, क्यों? संपादकीय विभाग से जुड़े एक सज्जन ने इस बारे में अनभिज्ञता जाहिर की और कहा कि ‘इस बारे में पूछना पड़ेगा।’
अगले लोकसभा चुनाव को साल भर भी नहीं बचे हैं, ऐसा लग रहा है कि अखबारों ने तैयारी शुरू कर दी है!
(अरविंद दास। देश के उभरते हुए सामाजिक चिंतक और यात्री। कई देशों की यात्राएं करने वाले अरविंद ने जेएनयू से पत्रकारिता पर भूमंडलीकरण के असर पर पीएचडी की है। IIMC से पत्रकारिता की पढ़ाई। लंदन-पेरिस घूमते रहते हैं। दिल्ली केंद्रीय ठिकाना। ‘भूमंडलीकरण के दौर में हिंदी पत्रकारिता’ विषय पर लेखक की किताब 2013 में प्रकाशित होने वाली है।