Tuesday, March 05, 2013

बिजली-पानी के लिए होगा सविनय अवज्ञा आंदोलन!


♦ अरविंद केजरीवाल
♣ दिल्ली में पानी और बिजली के बिल बढ़ने का केवल एक कारण – भ्रष्टाचार।
♣ दिल्ली की जनता के लिए ये बिल भरना नामुमकिन हो रहा है।
♣ जनता डरी हुई है, एकजुट नहीं है।
♣ इसी डर का फायदा उठाकर शीला दीक्षित और बिजली कंपनियां दाम बढ़ाती जा रही हैं।
♣ अभी बिजली के दामों में भारी बढ़ोतरी की शीला जी की तैयारी।
♣ 5 हजार रुपये प्रति महीना प्रति परिवार बिजली बिल बढ़ सकता है।
♣ दिल्ली की जनता को एकजुट करके उनके मन से डर निकालने के लिए अनिश्चिकालीन उपवास।
♣ शहीद भगतसिंह के शहीदी दिवस 23 मार्च से शुरू होगा उपवास।
♣ 23 मार्च से Civil Disobedience Movement
♣ दिल्ली की जनता से अपील – 23 मार्च से अपने बिजली और पानी के बिल देना बंद करें।
♣ जो जितने बिल रोक सकता है, रोक लें।
♣ कम से कम एक बिल तो सभी रोकें।
बिजली, पानी की बढ़ती कीमतों में भ्रष्टाचार के खिलाफ
सविनय अवज्ञा आंदोलन
दिल्ली में पानी और बिजली के पूरे बिल नाजायज तरीके से आ रहे हैं। जनता महंगाई की वजह से कराह उठी है।
महंगाई के पीछे सिर्फ और सिर्फ एक कारण है – भ्रष्टाचार। दिल्ली की मुख्यमंत्री ने बिजली पानी की कंपनियों से सांठगांठ करके इनका दाम इतना बढ़ा दिया है कि दिल्ली वालों का जीना हराम होता जा रहा है। वह कहती हैं कि कंपनियां घाटे में हैं इसलिए बिल बढ़ाना मजबूरी है। अगर बिल कम चाहते हो तो कूलर की जगह पंखा चलाओ, टीवी और फ्रिज कम इस्तेमाल करो
इत्यादि।
शीला दीक्षित के इस भ्रष्टाचार से दिल्ली की जनता लुट रही है, लेकिन विपक्ष में बैठी भारतीय जनता पार्टी भी बिजली पानी की कीमतों के मुद्दों पर या तो मौन है या फिर औपचारिक प्रदर्शन का नाटक करती है। जाहिर है कि भाजपा को भी लगता है कि अगर आगे कभी उसकी सरकार बनी तो उसे भी तो यही करना है।
सवाल यह है कि ऐसे में जनता क्या करे?
सविनय अवज्ञा आंदोलन
गांधी जी कहते थे, यदि हमारे ऊपर अन्याय हो तो उसके खिलाफ आवाज उठाना हमारा धर्म है। जो लोग उसके खिलाफ आवाज नहीं उठाते वो एक तरह से अन्याय का साथ देते हैं और अधर्म के भागीदार होते हैं।
ऐसी परिस्थिति में दिल्ली के सभी नागरिकों का यह फर्ज बनता है कि वो पानी और बिजली के नाजायज बिल देना बंद करें। इन बिलों में जितना जायज हिस्सा है केवल उतना दें, नाजायज हिस्से को रोक लें। जायज बिल कितना बनता है? कहना मुश्किल है। जब तक इन कंपनियों का ऑडिट नहीं कराया जाएगा, सच्चाई का पता नहीं लगेगा। लेकिन यदि बरजिंदर सिंह जी की मानें तो बिजली के दाम आधे से भी कम होने चाहिए। इसीलिए लोग आध बिल ही दें। अगर बिजली कंपनियां और जल बोर्ड आध बिल लेने से इनकार करें तो वो अपना पूरा बिल रोक लें। ऐसा करने पर बिजली कंपनियां और सरकार जो भी सजा देती हैं उसे भुगतने के लिए सभी तैयार रहे। यही धर्म है। यही सबका फर्ज है। इसी असहयोग आंदोलन के दम पर महात्मा गांधी ने अंग्रेजों को झुकने पर मजबूर कर दिया था। आज हम भी इस असहयोग आंदोलन के दम पर कंपनियों व सरकार को झुका सकते हैं और नाजायज बढ़े हुए दामों से मुक्ति पा सकते हैं।
पर क्या दिल्ली के लोग ऐसा करेंगे? पिछले वर्ष जब बिजली के बिल अचानक बढ़ा दिये गये, जनता त्राहि-त्राहि करने लगी। हमने जनता के साथ मिलकर 23 सितंबर को जंतर मंतर पर इसका विरोध करते हुए बिजली का बिल जला कर बिजली सत्याग्रह शुरू किया। बहुत लोगों ने बिजली का नाजायज बिल देना बंद करके सत्याग्रह प्रारंभ किया। सरकार के इशारे पर कंपनियों ने जनता को डराने के लिए कई लोगों के बिजली के कनेक्शन कटवा दिये। हम लोगों ने जनता के घर जाकर कटे कनेक्शन जोड़े। पर सरकार व कंपनियों ने दहशत पैदा करने के लिए उनके ऊपर मुकदमे लगाये, पैनल्टी लगायी। लोगों में डर का असर दिखाई देने लगा। हमने पूरी दिल्ली में एक सर्वे करवाया। अधिकतम लोगों का कहना है कि बिजली व पानी के बढ़े बिलों से हम सभी परेशान हैं। हम बढ़े हुए बिल देने की स्थिति में नहीं है लेकिन बिजली बिल न देने व सत्याग्रह में शामिल होने पर कनेक्शन कटने, गिरफ्रतारी, मुकदमा व पैनल्टी से डर लगता है।
पिछले एक महीने से हम लोग दिल्ली में जनसभाएं कर रहे हैं, दिल्ली की गलियों में लोगों से मिल रहे हैं। बातचीत में निकल कर आ रहा है कि लोग डरे हुए हैं। उनका डर है कि – बिजली कट गयी तो? पानी कट गया तो? जेल हो गयी तो? केस हो गया तो? पैनल्टी हो गयी तो? सभी के मन में डर है।
आज पूरी दिल्ली गुलामों की तरह डरी हुई है। इसी डर का फायदा उठाकर कंपनियों से साठगांठ करके सरकार पुन: बिजली व पानी के दाम बढ़ाने की साजिश कर रही है। बिजली व पानी देश का है, इसकी मालिक जनता है, लेकिन साजिश करके सरकार व कंपनियों ने बिजली व पानी को अपने कब्जे में कर लिया है और हमारे अंदर डर पैदा करके हमें नाजायज तरीके से लूट रहे हैं।
जिस मुल्क की सारी जनता डरी हुई हो, वह मुल्क कभी प्रगति नहीं कर सकता। 1947 में हमें आजादी इसलिए मिली क्योंकि उस वक्त हमारे पुरखे, आजादी के सिपाही, डरे नहीं थे।
अनिश्चितकालीन उपवास
दिल्ली की जनता के मन से डर निकालना होगा। दिल्ली की जनता को संगठित करना होगा। इसके लिए मैं 23 मार्च, 2013 से उपवास पर बैठ रहा हूं। 23 मार्च एक क्रांतिकारी दिन है। शहीद भगत सिंह का शहीदी दिवस है। यह दिन हमें देश के लिए मर मिटने वालों की याद दिलाता है। इस दिन से मैं अनिश्चितकालीन उपवास पर बैठूंगा। यह अनशन नहीं है। किसी सरकार के खिलाफ नहीं है। न ही किसी सरकार से मेरी कोई मांग है। यह अनिश्चितकालीन उपवास है। पिछले कई वर्षों से कई धरने, अनशन और प्रदर्शन किये। इन सरकारों से कई बार न्याय की मांग की। धीरे-धीरे समझ में आने लगा कि इन सरकारों का चरित्र तो अंग्रेजो से भी बदतर है। इनसे किसी भी तरह की न्याय की उम्मीद करना बेवकूफी होगी। इसीलिए इस उपवास के दौरान मेरी किसी भी सरकार से कोई भी मांग नहीं है। मेरा सरोकार और मेरी सीधी अपील जनता से है – उठो, जागो । देश को भ्रष्टाचार से मुक्त कराने की इस लड़ाई में शामिल हो जाओ। मेरी दिल्ली की जनता से सीधी अपील है कि वो अपने मन का डर निकाले। बिजली और पानी बिलों का नाजायज और आध हिस्सा देना बंद करें। यदि सरकार और बिजली कंपनियां आधा बिल लेने से मना करती हैं तो वो अपना पूरा बिल रोक लें।
अगर मैं दिल्ली की जनता से सविनय अवज्ञा आंदोलन की अपील करता हूं तो जाहिर है कि सबसे पहले इसका पालन मुझे करना चाहिए। मैं अब अधिकतर दिल्ली में ही रहना शुरू करूंगा और जहां मैं रहूंगा वहां का पानी और बिजली का बिल तब तक नहीं दूंगा जब तक सविनय अवज्ञा आंदोलन चलेगा। मेरा परिवार गाजियाबाद के एक फ्लैट में रहता है। हालांकि यह मुद्दा दिल्ली का है पर फिर भी जब तक दिल्ली का सविनय अवज्ञा आंदोलन चलेगा, मैं गाजियाबाद के घर का बिजली पानी का बिल नहीं दूंगा।
कब तक बिजली और पानी बिल न दें?
तब तक बिल न दें जब तक शीला दीक्षित जी निम्न बातें लागू न कर दें :
♣ शीला दीक्षित जी इन बिजली कंपनियों का सीएजी से ऑडिट कराएं।
♣ जब तक ऑडिट नहीं हो जाता, तब तक बिजली बिलों की और बढ़ोतरी बंद की जाए।
♣ जब तक ऑडिट नहीं हो जाता, तब तक सुधाकर जी द्वारा बिजली के दाम बढ़ाने वाले आदेशों पर रोक लगायी जाए।
♣ नियम बनाया जाए कि जिनका गलत बिल भेजे गये, उन मामलों में पहले बिल ठीक किया जाए, न कि पहले बिल भरने
पर आग्रह किया जाए, गलत बिल भेजने पर कंपनी पर पैनल्टी लगनी चाहिए।
♣ पूरी दिल्ली में मीटर 25 प्रतिशत से 40 प्रतिशत तेज चल रहे हैं। DERC ने ये माना है। अभी तक 10 सालों में तेज
मीटर से कंपनियों को कितना फायदा हुआ। तेज मीटर बंद किये बिना बिल न लिये जाएं।
♣ पानी के दाम कम से कम आधे किए जाएं।
अगर बिजली काट जाएं तो क्या करें?
ब पूरी दिल्ली एकजुट हो जाएगी तो शीला दीक्षित की हिम्मत नहीं होगी कि वो पूरी दिल्ली की बिजली काटें। पर फिर भी यदि बिजली काटते हैं तो आप उसे वापस जोड़ लीजिए। यदि आपको जेल जाने से डर लगता है तो हमें फोन कर दीजिए। हमारे कार्यकर्ता आकर बिजली जोड़ देंगे।
यही डर तो लोगों को निकालना है। इसका मुकाबला हम अकेले नहीं कर सकते, एकजुट होकर ही कर सकते हैं।
मेरे इस उपवास का मकसद है, दिल्ली के लोगों के मन से डर निकालना और उन्हें संगठित करना। जिन लोगों को ज्यादा डर लगता है वो कम से कम एक बिल तो रोकें, दो बिल तो रोकें, शुरुआत तो करें। इस लड़ाई में अपनी तरफ से कुछ आहूति दें। मेरी अपील सिर्फ घरेलू उपभोक्ताओं से ही होगी, व्यवसायिक और औद्योगिक उपभोक्ताओं से नहीं।
बिजली के दाम कई गुणा और बढ़ाने की तैयारी – क्या दिल्ली सरकार, केंद्रीय सरकार, DERC और बिजली कंपनियों में मैच फिक्सिंग हो गयी है?
अभी असली गाज तो दिल्ली वालों पर गिरने वाली है। अगर तुरंत कुछ नहीं किया गया तो शीला दीक्षित जी बिजली के दाम कई गुणा बढ़ाने की पूरी तैयारी कर चुकी हैं।
सुधाकर जी ने शीला दीक्षित सरकार को अभी हाल ही में 1 फरवरी को पत्र लिखा है कि पिछले चार साल में बिजली कंपनियों को 20 हजार करोड़ रुपये का घाटा हुआ है। या तो सरकार बिजली कंपनियों को 20 हजार करोड़ रुपये दें या वो दिल्ली में बिजली के दाम और बढ़ाएंगे। अब चाहे सरकार यह पैसा सीधे बिजली कंपनियों को दे या बिजली के दाम बढ़ाए जाएं, अंतत: पैसा तो जनता की जेब से ही निकलना है। दिल्ली में 35 लाख घरेलू कनेक्शन हैं। अगर 20 हजार करोड़ को 35 लाख से भाग दिया जाए, प्रति परिवार प्रति महीना पांच हजार रुपये का बोझ जनता पर पड़ने वाला है। ऐसा लगता है कि बिजली कंपनियों, दिल्ली सरकार, केंद्रीय सरकार और क्म्त्ब् के बीच में मैच फिक्सिंग हो गयी है? दिल्ली में जानबूझकर ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि बिजली कंपनियां भारी घाटे में है। और उनको तुरंत पैसा नहीं दिया गया तो ये बिजली कंपनियां बिजली नहीं खरीद पाएंगी। और दिल्ली में बिजली की कमी हो जाएगी। पिछले हफ्ते 8 करोड़ रुपये न देने पर पावरग्रिड ने BYPL की 400 मेगावाट बिजली काट दी। उधर यूपी सरकार का पावरग्रिड को 300 करोड़ रुपये देना बनता है, इसके बावजूद पावरग्रिड ने यूपी सरकार की बिजली नहीं काटी। तो क्या शीला दीक्षित जी केंद्र सरकार के सहयोग से दिल्ली की जनता को ब्लैकमेल कर रही हैं? इसका मतलब शीला दीक्षित जी केंद्र सरकार के साथ मिलकर बिजली कंपनियों को सीधे या परोक्ष रूप से 20 हजार करोड़ रुपये देने का मन बना चुकी है। यह इससे भी साबित होता है कि 1 फरवरी को DERC के अध्यक्ष श्री सुधाकर जी ने शीला दीक्षित सरकार को चिट्ठी लिखकर कहा कि बिजली कंपनियों को 20 हजार करोड़ रुपये का घाटा हुआ है। उसी पत्र में सुधाकर जी ने शीला दीक्षित जी को यह भी सुझाव दे डाला कि केंद्र सरकार की कौन-कौन सी योजनाओं के तहत बिजली कंपनियों को यह पैसा दिया जा सकता है। अपने पत्र में उन्होंने धमकी दी कि यदि ये पैसा बिजली कंपनियों को नहीं दिया गया तो दिल्ली में बिजली के दाम बढ़ा देंगे। पत्र मिलते ही शीला दीक्षित जी ने तुरंत केंद्रीय ऊर्जा मंत्री से मिलीं। जितनी शीघ्रता से शीला दीक्षित जी केंद्रीय ऊर्जा मंत्री से मिलीं, ऐसा लगता है कि शीला दीक्षित जी इस पत्र का इंतजार कर रहीं हों।
कुछ प्रश्न
इस उपवास से क्या हासिल होगा? क्या इस उपवास से दिल्ली सरकार बिजली के दाम कम करेगी?
इस उपवास से दिल्ली संगठित होगी, दिल्ली के लोग एकजुट होंगे। दिल्ली के लोगों के मन का डर निकलेगा, वो एकजुट होकर महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने को तैयार होंगे। अगर ऐसा हो जाता है तो निश्चित तौर पर शीला दीक्षित को बिजली के दाम कम करने ही पड़ेंगे। अगर वो ऐसा नहीं करती हैं तो दिल्ली के लोग आने वाले चुनाव में उन्हें उखाड़ फेंकेंगे।
बिजली, पानी का बिल न देना गैर-कानूनी है। ऐसा करने से आप लोगों को कानून तोड़ने के लिए उकसा रहे हैं?
मैं गांधी जी के शब्दों और उनके आंदोलनों की तरफ आप सब का ध्यान दिलाना चाहूंगा। गांधी जी का कहना था कि जो भी अन्यायपूर्ण कानून हो, उसे तोड़ना सबका फर्ज है। ऐसे कानून को मानना अन्याय और अधर्म का साथ देने जैसा है। इसी को तो सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement) कहते थे। इसी को वो सत्याग्रह कहते थे। उन्होंने अंग्रेजों द्वारा बनाया गया नमक कानून तोड़ा क्योंकि वो अन्यायापूर्ण था।
गांधी जी तो विदेशियों के खिलाफ लड़ रहे थे, क्या अपनी सरकार के खिलाफ यह करना ठीक है?
मैं इससे पूरी तरह से असहमत हूं। गांधी जी ने कभी भी नहीं कहा कि उन्हें गोरी चमड़ी से नफरत थी। सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा शाश्वत नियम है। अन्याय करने वाला चाहे कोई भी हो – गोरी चमड़ी वाला या काली चमड़ी वाला – वह नियम हर जगह लागू होता है।
ऐसे तो कोई भी हत्यारा या बलात्कारी कानून तोड़कर कहेगा कि वो सत्याग्रह कर रहा है?
दोनों परिस्थितियों में फर्क हैं। जैसा कि अन्ना जी कहते हैं – देश की आजादी के लिए लड़ते हुए जेल जाना भूषण है लेकिन बलात्कार या हत्या करके जेल जाना दूषण है। इसी तरह से अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने के लिए कानून तोड़ना भूषण है जबकि हत्या और बलात्कार करके किसी को क्षति पहुंचाना दूषण है।
क्या आप अराजकता नहीं फैला रहे हैं?
शीला जी के भ्रष्टाचार और भाजपा की चुप्पी की वजह से आज दिल्ली के हर घर में अराजकता फैली है। महंगाई की वजह से घर चलाना मुश्किल हो गया है, बच्चे पालने मुश्किल हो गये हैं। हमारे इस कदम से जनता राहत की सांस लेगी पर हो सकता है भाजपा, कांग्रेस और बिजली कंपनियों में अराजकता फैल जाए।
अब तो आप लोगों ने पार्टी बना ली है, आपको चुनाव लड़ना है, अब तो आप लोग राजनीति कर रहे हैं?
हम मानते हैं कि हम राजनीति कर रहे हैं, पर शीला दीक्षित जी अनिल अंबानी और टाटा की राजनीति करती हैं, हम जनता की राजनीति कर रहे हैं। भाजपा और कांग्रेस भ्रष्टाचार की राजनीति करते हैं। हम भ्रष्टाचार के खिलाफ राजनीति कर रहे हैं। लाल बहादुर शास्त्री ने भी राजनीति की थी। बाबा साहेब अंबेडकर और सरदार पटेल ने भी राजनीति की थी। उन्होंने देशभक्ति और ईमानदारी की राजनीति की थी। आज की गंदी राजनीति को बदल कर हम वापस उसी राजनीति को कायम करना चाहते हैं।
बिजली बिलों से बेहाल जनता
♣ गुलशन, सावनपार्क मॉडल टाउन में रहता है। उसका रु. 27,000/- बिजली का बिल आया है।
♣ खान बाबा, वजीरपुर की झुग्गी-झोपड़ी में रहते हैं। उनका रु. 2,11,000/- का बिल आया है।
♣ शकुंतला के पति रिक्शा चलाते हैं। शकुंतला, शालीमार बाग की झुग्गी में रहती हैं, उनका छ: महीने का रु. 10,530/-
बिल आया है।
♣ गणेश चाय का ढाबा लगाता है। उसका पांच महीने का रु. 12,240/- बिल आया है।
बिजली के बिलों को लेकर दिल्ली की जनता 4 तरह से परेशान है
1) बिजली के दाम गलत तरीके से अनाप-शनाप बढ़ा दिये गये।
2) कई लोगों के बिलकुल बेतुके और गैर-कानूनी तरीके से हजारों रुपये के बिजली के बिल बना दिये जाते हैं। जब वो बिल ठीक कराने जाते हैं तो उन्हें कहा जाता है कि पहले पूरा बिल भरो, फिर ठीक करेंगे। कई बार बिल ठीक कराने के लिए मोटी रिश्वत मांगी जाती है।
3) लगभग पूरी दिल्ली में बिजली के मीटर तेज चल रहे हैं। इस पर कोई कार्रवाई नहीं की गयी है।
4) दिल्ली के लोग बिजली कंपनियों की ‘रेड राज’ से दुखी हैं। ये कंपनियां किसी के भी घर रेड कर देती हैं। उनसे मोटी रिश्वत मांगी जाती है और रिश्वत न देने पर उनके खिलाफ केस बना दिया जाता है।
दिल्ली में बिजली महंगी क्यों हुई?
दिल्ली में बिजली के दाम पिछले 2 वर्षों में लगभग दो गुना हो गये हैं। यह केवल और केवल भ्रष्टाचार की वजह से हुए हैं। बिजली कंपनियां अपने खातों में भारी गड़बड़ी करके फर्जी घाटा दिखाती हैं, जिसके आधर पर बिजली के दाम बढ़ा दिये जाते हैं। इन कंपनियों का ऑडिट क्यों नहीं कराया जाता?
2010 में इन कंपनियों ने 630 करोड़ रुपये के घाटे का दावा किया था और दिल्ली में बिजली के दाम बढ़ाने की मांग की थी लेकिन DERC के तत्कालीन अध्यक्ष श्री बरजिंदर सिंह ने इनकी हेराफेरी पकड़ ली। उन्होंने पाया कि इन कंपनियों को 630 करोड़ का घाटा नहीं बल्कि 3577 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ था। उन्होंने एक आदेश बनाया। इस आदेश में उन्होंने लिखा कि दिल्ली में बिजली के दाम बढ़ने नहीं बल्कि 23 प्रतिशत घटने चाहिए। उसी आदेश में उन्होंने यहां तक लिखा कि आने वाले वर्षों में इन कंपनियों को और भी मुनाफा होगा और आने वाले वर्षों में बिजली के दाम और भी कम होंगे।
यह आदेश 5 मई 2010 की सुबह पास होने वाला था। 4 मई 2010 को शीला दीक्षित सरकार ने चिट्ठी लिखकर बरजिंदर सिंह जी को यह आदेश पारित करने से रोक दिया। प्रश्न उठता है कि आखिर शीला दीक्षित सरकार ने ऐसा क्यों किया? शीला दीक्षित जी तो हमारी मुख्यमंत्री हैं। दिल्ली की जनता ने उन्हें वोट दिया था। अगर दिल्ली में बिजली के दाम कम हो रहे थे तो उन्हें तो खुश होना चाहिए था। फिर शीला दीक्षित जी ने इस आदेश को क्यों रोका? इससे साफ जाहिर है कि शीला जी की बिजली कंपनियों से सांठगांठ है। जनता के हितों को ताक पर रखकर वो टाटा और अंबानी को फायदा पहुंचा रही हैं।
मजे की बात यह है कि भाजपा भी इस षड्यंत्र में शीला जी के साथ थी। भाजपा ने इस मुद्दे को विधानसभा या संसद में एक बार भी नहीं उठाया। इस कार्रवाई पर दिल्ली हाई कोर्ट ने शीला जी को बुरी तरह लताड़ा। दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश के कुछ अंश संलग्न हैं। (देखें एनेक्‍सी)
कुछ महीनों बाद बरजिंदर सिंह जी रिटायर हो गये। उनकी जगह शीला जी ने पी सुधाकर को DERC का चेयरमैन बना दिया। सुधाकर जी का एक ही काम था – जो बिजली कंपनियां कहें, वो करते जाओ। तब से दिल्ली वालों के लिए मुसीबत आ पड़ी। सुधाकर जी ने आते ही कहा कि बिजली कंपनियों को भारी घाटा हो रहा है, इसलिए दिल्ली में बिजली के दाम बढ़ाने की जरूरत है। 2011 में उन्होंने 22 प्रतिशत बिजली के दाम बढ़ा दिये, 2012 में 32 प्रतिशत और अभी कुछ दिन पहले 3 प्रतिशत बिजली के दाम बढ़ा दिये।
अगर इन सब बातों को जोड़ा जाए तो जनवरी 2011 के मुकाबले दिल्ली में बिजली के दाम लगभग दोगुने हो गये हैं। बिजली कंपनियों का घाटा सरासर फर्जी हैं। इसके कुछ उदाहरण:
1) पिछले साल बिजली कंपनियों के जांच (इंस्पेक्शन) के दौरान पता चला कि दिल्ली के लगभग 10 प्रतिशत उपभोक्ताओं की बिजली कंपनियों ने जीरो खपत दिखायी हुई है। जबकि उन उपभोक्ताओं ने अपना-अपना बिजली का बिल जमा किया था। इससे जाहिर है कि ये कंपनियां अपनी आमदनी को छिपा रही हैं।
2) अनिल अंबानी ने अपने ही ग्रुप की कुछ और कंपनियां बनायी हैं। दिल्ली की बिजली कंपनियां इन ग्रुप कंपनियों से महंगे में बिजली खरीद कर इन्हीं को सस्ते में बेचती हैं और फर्जी घाटा बनाती है।
3) बिजली कंपनियां बाजार से सीधे सामान न खरीद कर अपनी ग्रुप कंपनियों से खरीदती हैं। यह सामान बाजार भाव से कई ज्यादा मूल्य पर खरीदा जाता है और इस तरह से फर्जी घाटा दिखाया जाता है।
4) दिल्ली को जितनी बिजली की जरूरत है उससे दोगुनी बिजली महंगे दामों में खरीद कर आगे सस्ते दामों में बेची जाती है। इस एक कारण की वजह से हजारों करोड़ों का नुकसान दिखाया गया है।
पानी क्यों महंगा हुआ?
दिल्ली में पानी की भी यही समस्या है। आधी से ज्यादा दिल्ली में पानी नहीं आता, केवल बिल आते हैं। पानी आता है तो गंदा आता है। बिल इतने ज्यादा बढ़-चढ़ कर आ रहे हैं कि लोगों के लिए पानी के बिल जमा कराना नामुमकिन हो रहा है। जैसे…
♣ रंजीत सिंह, सुंदर नगरी के पुनर्वास बस्ती में रहते हैं। उनका पांच महीने का पानी का बिल 5,558 रुपये आया है।
♣ शीला, नंदनगरी में रहती हैं उनका चार महीने का पानी का बिल 12,837 रुपये आया है।
♣ मित्र बहादुर भी दिल्ली के एक पुनर्वास बस्ती में रहते हैं। उनका भी पांच महीने का पानी का बिल 16,576 रुपये आया है।
पानी के दाम बढ़ने का कारण भी भ्रष्टाचार है। पिछले नौ साल में एक आम परिवार का पानी का बिल 18 गुना बढ़ गया। इन्हीं नौ सालों में दिल्ली जल बोर्ड में 10,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का भ्रष्टाचार हुआ। ये 10,000 करोड़ रुपये हमारे पानी के बिलों में लग कर आ रहे हैं। इन 10,000 करोड़ रुपये के काम यदि ईमानदारी से कराये जाते तो दिल्ली के लोगों के घरों में बेहद सस्ता और साफ पानी पहुंच जाता।
Arvind Kejriwal
Annexure
21. On a close scrutiny of the aforesaid directions, it is clear as noon day that there has been an order of prohibition to the Commission not to pass the tariff order. Mr. Dave, learned senior counsel for the respondent would contend that it was issued keeping in view the public interest. The same is not discernible. It is neither evident nor demonstrable. It was an unwarranted interdiction. It is understandable that the State Government could have suggested some kind of a matter relating to policy having nexus with public interest, but unfortunately that is not so. By the impugned communication contained in Annexure P-7, the State Government could not have prevented the Commission from exercising its statutory powers. In any event, under Section 108, the State Government could have only to be a subterfuge, in fact, totally divorced from the arena of public interest. Quite apart from that the communication is in the form of injunction, which we are absolutely indubitable, the State Government cannot issue. This interdiction is decidedly beyond the scope of language employed in Section 108 of the 2003 Act and, in fact, contrary to the legislative intent. Thus, we are disposed to think that the submissions canvassed by learned Attorney General deserve acceptation and, accordingly, we hold that the communication of the present nature made by the State Government is absolutely unjustified, unwarranted and untenable and, accordingly, the same stands quashed.
73. We will be failing in our duty if we do not express our views on the conduct of the distribution companies. A distribution company is not an illiterate litigant who seeks redressal of his grievances at any stage and before whichever forum. They are guided by their law officers and are expected to know how to conduct themselves. The manner in which they submitted the representation to the State Government requiring its interference at a stage when the regulatory body was proceeding with the determination was totally unwarranted. They should have been well advised not to curb the determination process by the regulatory Commission. They should have understood the status of the regulatory commission in proper perspective. The State Government, as we have already held, and repeat at the cost of repetition, had traveled beyond its power by issuing a direction purported to have been so done in exercise of power under Section 108 of the 2003 Act. The State Government totally misdirected itself at the instance of the distribution companies. The distribution companies can very well contend that they can afford to make an erroneous representation or bring something which is not within the parameters of the statute to the State Government, yet, it is obligatory on the part of the State Government to look into the parameters of law and pass appropriate directions. But, a pregnant one, we can well appreciate if a layman such a path but the companies which are run by people who are qualified and educated and assisted by their own legal officers should not have taken recourse to such a path. It is nothing but subterfuge. It is against the national interest. The prudence does not countenance it. The law does not give sanction to it. It is, in a way, an innovative game play with the law. We are inclined to think that the companies harboured the notion they are children who can approach the Government like going to a laboratory to play a game of minor experimental science. It is absolutely impermissible and we, without any reservation, express our displeasure. We hope and trust that the distribution companies shall behave with responsibility, maturity and intellectual honesty keeping in mind the interest of the citizens and not to be obsessed with their own interest in singularity ostracizing statutory paradigms of law. This is a caution for the future. We expect more sensibility from them, as they cannot afford to suffer from intellectual paraplegia.
(अरविंद केजरीवाल। सामाजिक कार्यकर्ता। उन्हें 2006 में उत्कृष्ट नेतृत्व के लिए रमन मेगसेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया, क्योंकि उन्होंने भारत के सूचना अधिकार के आंदोलन को जमीनी स्तर पर सक्रिय बनाया, और सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह बना कर सबसे गरीब नागरिकों को भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए, सशक्त बनाने के लिए सामाजिक आंदोलन किया। 

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