Tuesday, March 19, 2013

राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम के "गिद्ध"!


एक गरीब जो दिन भर बमुश्किल आधा पेट भरने के हिसाब से कमाई कर पाता है तो क्या उसे इस देश में इसलिये जीने का हक नहीं है क्योंकि वह प्रशासकीय अव्यवस्था और भ्रष्टाचारी माहौल की वजह से अपनी तमाम जिन्दगी अपना व अपने परिवार के भरण पोषण में व्यतीत कर देता है और उसे शिक्षित व जागरूक होने का मौका नहीं मिल पाता जबकि उसके द्वारा किये जा रहे कार्य खरीदने या बेचने वाली हर वस्तु पर रुपया उसे कर(Tax) के रूप में अदा करना ही पड़ रहा है, जबकि उसे सरकारी व्यवस्था से मिलने वाला सरकारी सहयोग प्राप्त नहीं होता यह तो सर्वविदित हैं| मगर हद तो तब हो जाती है जब चील-कौये और गिद्ध के समान वे सरकारी कर्मचारी इन मासूम ज़िन्दगियों की उस चमड़ी को भी नोच लेना चाहते हैं, जो उनके शरीर के ऊपर एक पतली चादर के समान है जिसके अन्दर की एक-एक हड्डी तक साधारण आँखों से नजर आ जाती है| यह पूरा नजारा नजर आयाराजस्थान राज्य पथ परिवहन निगमकीबस नं. RJ-27-PA-0032 (STAR LINE)जिसपर श्री. मनोज सोलं दिनांक 12-03-2013 समय16:15:34 PM कोगोगुंदा बाइपास से उदयपुरसवार हुये और जब उन्होंने 24 रु. केटिकिटके लिये100/-रु.परिचालक को दिये तो परिचालक ने5/- रु.वापस किया, श्री. मनोज सोलंकी ने सोचा कि बाकी रुपयापरिचालक मुहमद ख़ान उन्हें बाद में वापस कर देगा मगरआखिरी स्टॉप (बडगाव)आने तक परिचालक ने ऐसा कोई एहसास नहीं कराया, जिससे यह मालूम पड़े कि परिचालक बाकी बचे रु. लौटाने का ईरादा रखता हो, आखिर श्री. मनोज सोलंकी को परिचालक को याद दिलाने की जरूरत पड़ ही गई कि "क्या रु. वापस किये जायेंगे", जबकि परिचालक के पास काफी समय पहले से ही छुट्टे रुपये जमा थे, पूछने पर परिचालक ने जवाब दिया कि"मैंने रुपये वापस कर दिये हैं", परिचालक की तरफ से यह भी कहा गया कि"आपने रु. पहले क्यूँ नहीं मांगे?"इसके जवाब में श्री. मनोज सोलंकी को कहना पड़ा कि"जब आप मेरे साथ ऐसा व्यवहार कर रहे हैं, तो इन मासूम व गरीबों के साथ कैसा व्यवहार करते होंगे? इन्हें तो आप जैसे लोग कदम-कदम पर लूटते होंगे?" ऐसा कहने पर बस में बैठी कई सवारियों ने कहा कि"हमारा भी 2-3 रु. रोजाना ये रख लेते हैं, वापिस नहीं करते और अधिक बोलने पर बस से नीचे उतार देते हैं"|यह सब होने पर परिचालक ने श्री. मनोज सोलंकी से कहा कि"तुम कौन हो, जो मुझसे इस तरह बातचीत कर रहे हो?"श्री. मनोज सोलंकी ने कहा कि"मैं एक आम नागरिक हूँ"और उन्होंने अपनाID Card परिचालक को दिखाया, जिसके बाद परिचालक फौरन माफी माँगने लगा|
इस पूरे प्रकरण में यह साफ नजर आता है कि राजस्थान सरकार और उसकी राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम किस प्रकार मदहोशी में सोई हुई है और जिन गरीबों और मासूमों के बल पर सत्ता में बैठ कर सत्ता सुख हासिल कर रही है उसके राज्य में इन मासूमों के साथ किस प्रकार का अन्याय किया जा रहा है और वह भी सीनाजोरी के साथ| ऐसी हजारों बसें राज्य के ग्रामीण इलाकों से भ्रमण कर रही हैं और उसमें काम करने वाले कर्मचारी किस प्रकार से वेतन, महँगाई भत्ता व बोनस लेने के साथ-साथ प्रतिदिन का ही लगभग 500/- रु. से 1000/- रु. तक की लूटमार इन गरीबों की चमड़ी को नोंच कर खाने का कार्य कर रहे हैं| दिखने में तो यह हमसब के लिये 1-2 रु. हो सकता है लेकिन उन मासूमों के लिये तो यह 2/- रु. उनके दिनभर के पेट भरने का साधन बन सकता है, अगर 1 बस से यह कर्मचारी दिनभर में 500/- रु. भी इस गैर-कानूनी तरीके से ग्रामीणों को लूटकर कमाते हैं तो पूरे महीने में 15000/- रु. के आसपास और वर्ष भर में 1 लाख 80 हजार रु. के आसपास गैर-कानूनी रूप से गरीबों व मासूमों की हाय लेते हुये प्राप्त करते हैं जो शायद उनकी अय्याशी के काम ही आती होगी|
हमारी, राज्य सरकार व राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम से माँग है कि इस परिचालक के ऊपर तो फौरन कार्यवाही की जाये और उसका जवाब संस्था को लिखित में दिया जाये और साथ ही इस प्रकार का घिनौना कार्य परिवहन निगम की बसों में न हो उसकी व्यवस्था फौरन ही करवाई जाये, जिससे इन मासूमों के पेट पर लात मारने वाले इन दरिंदों को नसीहत मिल सके व सजा प्राप्त हो और इनके अंजाम को देखते हुये अन्य कर्मचारी ऐसे किसी भी घिनौने कार्य को करने से पहले उसके अंजाम को दिलों में बैठा लें जिससे आपके परिवहन निगम का नाम ऊँचा हो सके| हम समझ सकते हैं, कि यह एक छोटा सा अपराध है, जिसके मामले में इतने कड़क शब्दों का प्रयोग करना उचित नहीं है मगर हम यह भी जानते हैं कि मकान में उग रहे छोटे पीपल के पौधे को अगर हम उसकी बाल्यावस्था में ही समाप्त न करें तो वह बड़ा होने पर मकान को नुकसान पहुँचाने का कार्य करेगा जबकि बड़े होने पर हमारे द्वारा उसे नष्ट करने पर पेड़ से ज्यादा नुकसान हमारे मकान को ही होगा| अतः जरूरत है बाल्यावस्था में ही ऐसे अपराधों पर रोकथाम लगाई जाये|
जरूरी है ऐसे कर्मचारियों को सजा दिलाना यह कार्य हम इसलिये नहीं करना चाहते कि हमारी इनसे निजी दुश्मनी है, बल्कि हम इसलिये चाहते हैं कि अगर इनको सजा मिली तो उस डर से बाकी के कर्मचारी गिद्धों के समान इन मासूमों का शोषण करने की हिम्मत न कर सकें क्योंकि हम जानते हैं कि स्प्रिंग को उतना ही दबाया जा सकता है जितनी उसमें दबने की क्षमता है, जहाँ अति हो गई तो वह या तो टूट जायेगी या पलट कर आप पर वार करेगी और नुकसान पहुँचायेगी| हम नहीं चाहते कि कोई उधम सिंह बनकर ऐसे मामले को सुलझाने की पहल करे, एक बारगी उधम सिंह तो ठीक हैं क्योंकि वह कुछ समझदार हैं मगर यह मासूम तो उस माटी के पुतले हैं जिन्हें जिस तरह चाहे मोड़ा जा सके और अगर इनके गुस्से का उपयोग गलत दिशा में हो गया तो वे यह नहीं देख पायेंगे कि कौन सही है और कौन गलत बल्कि अंजाम सबको भुगतना पड़ जायेगा और हम ऐसी स्थिती आने से पहले ही परिस्थितीयों को बदलना चाहते हैं और चाहते हैं कि दरिंदगी की इन वारदातों को रोका जाये|
हम चाहते हैं कि एक नज़र इस मामले को उदाहरण के रूप में लेते हुये समझें - अगर एक महिला जिसको जबरन उसकी अनुमति के बिना बालविवाह करवा दिया जाता है और अदालत भी इस इल्जाम पर उस महिला का साथ देती है मगर दूसरी अदालत इसलिये उसे सरकारी नौकरी से वंचित करती है कि"उसने बालविवाह किया था"(अदालत के अनुसार - परिस्थिती चाहे कुछ भी हो अगर हमने उसे नौकरी दी तो उसका संदेश समाज में गलत जायेगा और बालविवाह को कानूनी सहमती माना जायेगा) इस वजह से उसे नौकरी से वंचित कर दिया गया| जबकि पहली अदालत ने खुद कहा कि उस महिला के साथ अन्याय हुआ है, उसका जबरन विवाह करवाया गया है जिसमें विवाह करवाने वालों को दोषी माना गया| जब एक महिला को कानून का गलत संदेश ना जाये"इस बिनाह पर नौकरी से वंचित किया जा सकता है", तो राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम में गिद्ध के समान काम करने वाले"ऐसे कर्मचारियों के खिलाफ भी कठोर कार्यवाही होनी चाहिये"यही हमारी राज्य सरकार और राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम से प्रार्थना है|

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