Thursday, February 28, 2013

फासिज्म का चेहरा प्रायः संगीतात्मक होता है!


तार्किकता, भावुकता और फासिज्म
♦ अपूर्वानंद
28फरवरी को याद करने पर अब कहा जाने लगा है कि यह नकारात्मक स्मृति है और इंसानी फितरत के मुताबिक़ हमें आगे बढ़ना चाहिए। हिंदुओं को, खासकर गुजराती हिंदुओं, यह नागवार गुजरता है कि उन्हें बार-बार 28 फरवरी, 2002 की याद दिलायी जाए। आखिर गुजरात में 2002 के बाद पूरा अमन है और वह विकास के मार्ग पर एक दृढसंकल्प मुख्यमंत्री के नेतृत्व में संकल्पपूर्वक बढ़ा जा रहा है और वहां के मुसलमान भी अब कुछ और बात करना चाहते हैं।
दरअसल भुलाने और आगे बढ़ जाने की शुरुआत 2002 में ही हो गयी थी। 28 फ़रवरी से राज्य-संरक्षण में शुरू हुए मुसलमानों के कत्लेआम ने भारत के उद्योगपतियों के एक हिस्से को भी झकझोर दिया था। लेकिन कुछ समय बाद ही पूंजीवाद के तर्क ने मानवीयता की कमजोरी पर विजय पा ली और उन्‍होंने नाराज़ मुख्यमंत्री से क्षमायाचना करके गुजरात की प्रगति में उन्हें हिस्सा लेने की इजाजत मांग ली थी। सार्वजनिक रूप से उन्हें गांधी और पटेल से तुलनीय बताया जाना अब अटपटा भी नहीं लगता, बल्कि उलट कर कहा जा सकता है कि गांधी और पटेल में ऐसे कई गुण नहीं थे जो गुजरात के हृदय-सम्राट में पाये जाते हैं, इसलिए यह तुलना वस्तुतः इन दोनों के प्रति पक्षपात है। पूंजीवाद के मूल अंतर्राष्ट्रीय चरित्र ने अंततः यूरोपियन यूनियन को अपनी मानवीय हिचक को किनारे करके गुजराती यथार्थ को कबूल करते हुए कारोबारी नज़रिया अपनाने को प्रेरित किया। यह संभव नहीं था कि आर्थिक निवेश के ठोस आकर्षक आमंत्रण को न्याय के अमूर्त आग्रह के चलते ठुकरा दिया जाए।
दिल्ली विश्वविद्यालय के एक वाणिज्य महाविद्यालय में, जहां 98% से कम अंक लाने पर दाखिला मुमकिन नहीं, इस कठोर विकासपुरुष के स्वागत के पीछे पूंजीवादी, वाणिज्यिक कारोबारीपन का यथार्थवादी दृष्टिकोण ही है, जिसकी शिक्षा अब युवाओं को देने का दायित्व भारत के शिक्षा-संस्थानों पर है।
आर्थिक संसार यथार्थ है और उसके अपने नियम हैं जो मानवीय भावनाओं से बाधित नहीं होते। इसलिए ऐसे कई लोग, जो 2002 के मुस्लिम-संहार को बुरा मानते हैं, कहते हैं कि उसने गुजरात के विकास में कोई रुकावट नहीं डाली। विकासवादी तर्क, जो पूंजीवादी तर्क ही है, कहता है कि चूंकि आर्थिक पक्ष प्राथमिक है, जिसके बिना जीवन संभव नहीं, हमेशा दूसरी चीज़ों पर उसे तरजीह दी जानी चाहिए। इसके साथ ही एक दूसरा तर्क पूर्ण की अंश पर वरीयता का प्रस्तुत किया जाता है। अगर एक जनसंहार का नायक पूरे गुजराती समाज को तरक्की के रास्ते पर लिए जा रहा है, तो उस समाज के एक बहुत छोटे हिस्से की, इस प्रसंग में मुसलमान, भावना की रक्षा मात्र के लिए उसके खिलाफ जाने में क्या बुद्धिमानी है? क्या यह तार्किक और उचित नहीं होगा कि यह अल्पांश अपनी अल्पसंख्यक भावुकता का दमन करके अपने को पूर्ण में विलीन कर दे? यह विकासवादी तर्क, जो बुनियादी तौर पर आर्थिक है, ओडीसा के नियमगिरि के गर्भ से राष्ट्र निर्माण के लिए उपयोगी खनिज को वहां के आदिवासियों की उस पर्वत के प्रति भावुक श्रद्धा के आगे झुक कर उसी गर्भ में अनुपयोगी अवस्था में पड़े रहने देने की मांग को मूर्खतापूर्ण भावुकता मानता है। आदिवासियों की भावुकता और पूंजीवादी तर्क के संघर्ष में राज्य का अपने पक्ष का चुनाव स्पष्ट है। बल्कि ऐसे प्रसंगों में ऐसी अल्पसंख्यक भावुकता का मुकाबला करने के लिए विकासवादी आर्थिक तर्क अपने पक्ष में राष्ट्रवादी भावुकता का सहारा लेता है। इस संघर्ष में राष्ट्रवादी भावुकता भावुकता रह भी नहीं जाती, वह स्वाभाविक और तार्किक की श्रेणी में प्रवेश कर जाती है।
भावुकता एक प्रकार की स्नायुविक दुर्बलता है जो रुग्ण शरीर में पायी जाती है। चूंकि शरीर एक है, और वह राष्ट्र का है, उसके एक अंग के रोग से पूरे शरीर को हानि नहीं पहुंचने दी जा सकती। इसलिए उसकी चिकित्सा आवश्यक हो उठती है। राजकीय हिंसा या बहु-संख्यक हिंसा वस्तुतः इसी प्रकार की दुर्बलता के साथ शल्यचिकित्सात्मक व्यवहार है। वह राष्ट्र के शरीर को एक विकार से मुक्ति दिलाने को एक एक अनिवार्य युक्ति के रूप में औचित्य प्राप्त करता है।
Modi
आदिवासियों या मुसलमानों को एक अविकसित अंग के रूप में देखे जाने की प्रवृत्ति हमारे अवचेतन का अंग है। यही बात दलितों के प्रसंग में भी कही जा सकती है। प्रगति या विकास के समक्ष जब ये समुदाय समावेशन का प्रश्न उठा देते हैं तो स्वस्थ समुदाय अधीर हो उठते हैं क्योकि समावेशन विकास की गति को धीमा कर देता है। यहां पिछड़ने का ख़तरा आजाता है जो कोई समुदाय और राष्ट्र नहीं उठा सकता। समावेशन समय का अपव्यय भी लगता है। जो स्वयं को पिछड़ा हुआ कहते हैं वे पहले ही बराबरी के व्यवहार का अधिकार खो बैठते हैं। क्योंकि वे अनुपयोगी और अनुत्पादक हैं, आसान तरीका उनसे छुटकारा पाने का ही है। साम्यवादी देशों में आबादियों के बड़े पैमाने पर अदल-बदल, घुमंतू समूहों और समलैंगिकों के संहार के पीछे यही धारणा काम कर रही थी। आश्चर्य की बात नहीं कि हिटलर ने भी इनके साथ वही व्यवहार किया। स्टालिन और हिटलर दोनों का, यहूदियों के प्रति एक सा ही व्यवहार था।
लघुता के प्रति यह हिंसक व्यवहार एकदम न्यायपूर्ण और तर्कसंगत प्रतीत होता है। ऐसा नहीं है कि हिटलर के साथ संधि करते समय स्टालिन को उसकी विचारधारा का पता नहीं था। इस संधि में हिटलर के साथ मिल कर पोलैंड का बंटवारा करने में उसे ज़रा भी हिचक नहीं थी। यहां पोलैंड के लघुता के कारण उसकी बलि दी जा सकती थी। स्टालिन जो कर रहा था, उसका औचित्य एक बड़े उद्देश्य के सहारे सिद्ध किया जा रहा था। सोवियत संघ के भीतर राष्ट्र के नाम पर और बाहर साम्यवाद के बड़े लक्ष्य के नाम पर इसे ज़रूरी बताया गया। दिलचस्प यह है कि खुद पोलैंड के साम्यवादियों ने इसमें हिस्सा लिया।
तो क्या वहां इसका कोई विरोध न था? क्या इन स्थतियों की गुजरात से तुलना उपयुक्त है? यहां ठहर कर थोड़ा विचार करना उचित होगा। हमें मालूम है कि सोवियत संघ में या पोलैंड में, और बाद में चेकोस्लवाकिया, हंगरी, बुल्गारिया जैसे देशों में आतंरिक विरोध बहुत ज़्यादा था, इसलिए दमन भी उतना ही भयंकर था। सोवियत संघ में सोवियत राष्ट्र और साम्यवाद के नाम पर मारे गये लोगों की संख्या से ही इस दमन का पता चल जाता है।
विक्टर सर्ज ने इसी तथ्य की ओर संकेत किया जब उन्होंने लिखा कि सोवियत खुफिया पुलिस के तहखानों में हम जब यातना झेल रहे थे, बाहर के देशों के प्रगतिशील लेखक और कलाकार स्टालिन की प्रशस्ति में कविता लिख रहे थे। इस कथन की विडंबना कितनी जाहिर है, क्योंकि ये कवि-कलाकार अपने देशों में अभिव्यक्ति की आज़ादी और दूसरी आजादियों के अभाव के खिलाफ ही संघर्षरत थे।
हिटलर के दमन के विरुद्ध अंतराष्ट्रीय एकजुटता हो सकी, स्टालिन के दमन के खिलाफ नहीं। कम-से कम प्रगतिशीलों ने उस समाज की ओर से मुंह फेर लिया। इसकी कीमत खुद उस विचार मात्र को इस रूप में चुकानी पड़ी है कि अब हमेशा के लिए वह संदिग्ध हो गया है, हालांकि यह कहा जाता है कि पूर्व-साम्यवादी देशों त्रुटिपूर्ण साम्यवाद था, असली नहीं।
स्टालिन ने साम्यवाद और राष्ट्रवाद का एक कारगर मेल तैयार किया था। राष्ट्र हमेशा ही एक उपयोगी संकल्पना रही है। पूंजीवाद के विकल्प के रूप में उभरे साम्यवादी देशों ने भी राष्ट्र और राष्ट्रवाद का सहारा नहीं छोड़ा था। सोवियत संघ की राजकीय भाषा के कुछ सबसे लोकप्रिय शब्दों में देशभक्ति एक था। सोवियत संघ में भी उत्पादकता बढ़ाना एक राष्ट्रीय कर्तव्य था और उस पावन कार्य में लगे लोग देशभक्त थे। देशभक्ति और विकास के आख्यान में लघु-भावुकताओं का विघ्न बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। ये लघु भावुकताएं कई प्रकार की हो सकती हैं। व्यक्ति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मांग ऐसी ही एक और भावुकता है। चीन को विकास के आदर्श के रूप में पेश करते समय वहां इन स्वतंत्रताओं के अभाव को नज़रअंदाज कर देने को कहा जाता है। पूर्व साम्यवादी देशों में व्यक्ति एक समस्या था और उसके मुकाबले समूह या समाज को प्राथमिकता दी गयी थी। दोनों स्थितियों का अंतर देखा जा सकता है। एक स्थिति में साम्यवाद तो दूसरी में विकास, जो पूंजीवादी प्रत्यय है, औचित्य साधन का सहारा है।
जो बात इन सभी स्थतियों में उनकी बेमेलपन के बावजूद सामान्य है, वह यह कि हर जगह भावुकता के स्थान पर तार्किकता की दुहाई दी जाती है। साम्यवादी दलों में आत्मगत भावुकता को कमजोरी, यहां तक कि घृणित रोग माना जाता रहा है। कॉमरेडों को हमेशा की भावुकता से सावधान रहने को कहा जाता रहा है। उसी प्रकार गुजरात जैसी स्थति में मुसलमानों को लेकर बेचैन रहने वालों को भावुक करार दिया जाता है, विकास की परियोजना में जिनके लिए कोई स्थान नहीं है। गुजरात में ऐसे भावुक लोग वहां के मुखर समुदाय के हाशिये पर हैं। दूसरी तरफ, भारत और उसके बाहर अब धीरे-धीरे गुजरात संहार के प्रणेता के प्रति वितृष्णा की अतार्किकता और इसलिए उसकी व्यर्थता का एहसास बढ़ता जा रहा है। और अब यह उसके साथ कारोबारी रिश्ता कायम करने की प्रतियोगिता में बदल रहा है।
तार्किकता के नायकों को भी लेकिन विडंबनापूर्ण ढंग से तब तक चैन नहीं आता, जब तक उन्हें सौंदर्यात्मक स्वीकृति न मिल जाए। क्या यह इसलिए है कि मनुष्य मात्र आवश्यकता की पूर्ति करके संतुष्ट रह जाने वाला जीव नहीं है, वह कुछ और की मांग करता है और यही मांग उसे सौंदर्य-सृजन की ओर ले जाती है, बल्कि वह अपने पूरे जीवन को ही सौंदर्यात्मक ढंग से संगठित करना चाहता है!
इसलिए यह स्वाभाविक ही है कि गुजरात के मुख्यमंत्री अब एक ऐसे व्यक्ति के रूप में खुद को प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसका कविता, कला, संस्कृति से अनुराग है। गुजरात के स्कूलों में पठन-अभियान के प्रणेता, विराट गांधी-स्मारक के परिकल्पक, साबरमती तट को विहार स्थल में बदल देने वाले व्यक्ति को आप जनसंहार का षड्यंत्रकारी कैसे कह सकते हैं? उनका हृदय मूल रूप से कोमल है जिसे बाह्य आवरण की कठोरता ने छिपा रखा है। यह कठोरता उन्हें अपना हित ठीक से न पहचान पाने वाले सामान्य जन की भलाई के ख्याल से ही अपनानी पड़ती है। एक प्रकार से यह शल्य-चिकित्सक की कठोरता है। इसे हिंसा कहना भाषा का गलत उपयोग है।
पहले उद्योग जगत, फिर शिक्षा जगत और कला-जगत से स्वीकृति 2002 के जन-संहार के दाग की ओर से ध्यान फिराने की जुगत है। गत वर्ष अहमदाबाद में नॅशनल बुक ट्रस्ट के सहयोग से साबरमती के किनारे पुस्तक मेले का आयोजन इसी परियोजना का हिस्सा था और अभी ‘रोमांसिंग प्रिंट’ का आयोजन भी। यह मानीखेज है कि इस आयोजन में इस नायक को उसकी संकल्पशक्ति की दृढ़ता के कारण आराध्य बताया जा रहा है। रोमांस करने वाला समाज जब इस कठोर दृढ़ता की याचना करने लगे, खतरे की घंटी बजनी चाहिए। थियोडोर अडोर्नो के इस वाक्य के स्मरण के साथ कि फासिज्म का चेहरा प्रायः संगीतात्मक होता है।
[सौजन्‍य : अपूर्वानंद वाया जनसत्ता]
(अपूर्वानंद। वरिष्‍ठ आलोचक और मानवाधिकार कार्यकर्ता। दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में प्राध्‍यापक। पटना में लंबे समय तक संस्‍कृति की आंदोलनकारी गतिविधियों की अगुवाई की। अशोक वाजपेयी के समय महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा से जुड़े रहे। 

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