Thursday, February 21, 2013

धार्मिकता और धर्म-निरपेक्षता एक साथ नहीं चल सकतीं!


र्म-निरपेक्षता क्या है? क्या यह सर्व-धर्म-समभाव है? क्या आप धार्मिक भी बने रह सकते हैं और धर्म-निरपेक्ष भी? कोई भी धार्मिक व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह सर्व-धर्म-समभाव के अर्थ में धर्म-निरपेक्ष नहीं हो सकता। क्योंकि उसका अपना एक धर्म है और उसके लिए दूसरे धर्म पराये हैं। असल में धार्मिकता और धर्म-निरपेक्षता एक साथ नहीं चल सकतीं।
यूरोप के आधुनिक इतिहास पर गौर करें तो पायेंगे कि वहां इसकी धारणा सीधे धर्म के विरोध में विकसित हुई। दूसरे लोक की कल्पना को नकारना और इस लोक या यथार्थ को इसी के नियमों के आधार पर व्याख्यायित करना चिन्तन का इहलौकिकीकरण (सेक्युलराइजेशन) माना गया।
इस अर्थ में धर्म-निरपेक्षता चिंतन की वह प्रवृत्ति है जो विज्ञान और बुद्धिवाद के आधार पर विकसित होती है, अनुभव, तर्क और प्रयोग पर बल देती है और धार्मिक चिंतन की अबौद्धिक पारलौकिकता का निषेध करती है। इसके साथ यूरोप के इतिहास का यह तथ्य भी जुड़ा हुआ है कि मध्य-युग में राज्य के ऊपर धर्म (चर्च) की स्थापित सत्ता को चुनौती देना और राज्य के समस्त इहलौकिक क्रिया-कलाप से धर्म को अलग कर देना भी क्रमशः धर्म-निरपेक्षता का एक रूप बन गया। धर्म-निरपेक्षता राज्य के एक गुण के रूप में विकसित हुई जिसके अनुसार वह धर्म को व्यक्तिगत सरोकार मानेगा, सामाजिक संबंधों से धर्म को अलग करेगा और धर्म के आधार पर किसी को विशेषाधिकार न प्रदान करेगा। इसका आशय यह भी है कि धर्म-निरपेक्ष राज्य अपनी विचारधारा निर्मित और प्रचारित करेगा, बुद्धि और तर्क को प्रोत्साहन देगा और धार्मिक चेतना के आग्रहों को अप्रासंगिक बनाता जायेगा।
अपने देश में धर्म-निरपेक्षता की जो परिभाषा फैलायी गयी, वह धार्मिकता के ज्यादा करीब थी। इसे सर्व-धर्म-समभाव या धर्मों से समान सापेक्षता के रूप में लिया जाता है। इस परिभाषा के अनुसार हमारा शासक वर्ग किसी भी या सभी धर्मों को समान रूप से प्रोत्साहन देकर सांप्रदायिकता की ताकतों को मजबूत करता है और उनसे वोट की लगातार भ्रष्ट होती गयी राजनीति की शतरंज खेलता है।
इस स्थिति का फायदा उठा कर कुछ लोग धर्म-निरपेक्षता की जरूरत से ही इनकार करने लगे हैं। वे कहते हैं कि भारत धर्म और सम्प्रदायों का देश है और धर्म-निरपेक्षता यहां की प्रकृति के अनुकूल नहीं है। उनके तर्क पर चला जाए तो हमें यूरोप से प्राप्त आधुनिक विज्ञान, टेकनोलाजी तथा लोकतंत्र और समाजवाद की धारणाओं से भी मुक्त हो जाना चाहिए। ऐसी हालत में जो हमारे पास बच जायेगा, वह वर्गों और वर्णों में विभाजित, मध्य-युगीन और अस्पृश्यता के काले धब्बों से भरा जर्जर समाज होगा या फिर हिंदू सांप्रदायिकता के वर्चस्व से नियंत्रित एक ऐसा राज्य-तंत्र जो अपने मूल आशय में फासिज्म का भारतीय रूप होगा। साम्प्रदायिकता की विघटनकारी परिणतियों से परिचित कोई भी व्यक्ति इन दोनों विकल्पों को स्वीकार नहीं करेगा।
जहां तक परंपरा का सवाल है, भारत में धार्मिक और साम्प्रदायिक चिन्तन के अलावा, और उसके खिलाफ, बुद्धिवादी और भौतिकवादी चिंतन की एक मजबूत परंपरा रही है। बुद्ध के समय में चिंतन के तमाम रूप सक्रिय थे और अधिकांश बुद्धिवादी तथा भौतिकवादी थे। खुद बुद्ध ने ईश्वर की धारणा का निषेध करके आत्मवादी चिंतन पर गंभीर प्रहार किया। चाणक्य का प्रसिद्ध अर्थशास्त्र अपनी मूल संरचना में एक धर्म-निरपेक्ष कृति है। बाद में मुगल बादशाह अकबर ने एक खास तरह की धर्म-निरपेक्षता बरतने की कोशिश की। असली मुद्दा यह है कि आप परंपरा में से क्या चुनते हैं और वर्तमान में आपका पक्ष क्या है?
अब समय आ गया है कि धर्म-निरपेक्षता को उसके सही परिप्रेक्ष्य में देखा जाये और जनता की एकता तथा उसके जनवादी आंदोलन के सामने खतरा बन रही तानाशाही और सांप्रदायिकता की शक्तियों का मुकाबला किया जाए।

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