Wednesday, February 27, 2013

झोपडिय़ों में दिन गुजार रहे आतंकवाद से पीडि़त परिवार!


आतंकवाद से बचने के लिए गाँव की खुशहाल जि़न्दगी छोड़कर आना पड़ा कैम्प में

आशुतोष शर्मा 

रियासी (जम्मू कश्मीर) आंगन में टहलती बकरिओं के एक झुंड के ठीक पीछेतीन टूटे हुए दरवाज़े शरमाते हुए तीन अलग-अलग छप्परों के अन्दर आने को बुलाते हैं।हर एक छप्पर (जिसकी पैमाइश मुश्किल से 10-10 फी होगीमें  बिखरा हुआ सामानटूटी हुई छत और दीवारों में दरारेंखस्ता हाल उजड़ी हुई इस जगह को 35 लोगअपना घर कहते हैं। 

ये कहानी इस छप्पर के नीचे रहने वाले सिर्फ  एक आतंकवाद से प्रभावितविस्थापित परिवार की नहीं हैरियासी के तलवाड़ा कैंप में आतंकवाद सेप्रभावित विस्थापित गाँववालों के 900 से अधिक परिवार हैं जो बुनियादीसुविधाओं के अभाव में झुग्गी-झोपडिय़ों में अपना जीवन बिता रहे हैं 

जम्मू से लगभग 72 किमी की दूरी पर बसाया गया आतंकवाद से प्रभावितविस्थापित लोगों का ये कैंप लगभग 15 साल पुराना है। इस कैंप में दूर दराज़ केपहाड़ों से लोग आतंकियों की गोलियों के डर से घर-बार छोड़कर बसे हैं। हालांकि,कुछेक परिवारों को राहत राशि के नाम पर प्रति परिवार मात्र 1600 रुपये हरमाह मिलते हैंलेकिन कश्मीरी पंडित विस्थापितों की बनिस्बत वह भी ऊंट केमुंह में जीरा ही है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार विस्थापितों को नौ किलो आटा दो किलो चावल और एक पशु के चारे के लिए तीन सौ रुपये प्रति महीना भीमिलना था। विडंबना यह है कि इन लोगों को ये रहत भी नहीं मिल पाती है।

नाजो देवी (59) का परिवार ऐसा ही एक विस्थापित परिवार है जो अपने गाँव कीखुशहाल जि़ंदगी से दूर झोंपड-पट्टी जैसे बदहाल कैंप में दिन गुज़ारने कोमजबूर है। यहां किसी भी कैंप वाले के पास बैठ जाइएएक ही ग़म सुनने कोमिलता है। सीढ़ीनुमा हरे भरे खेतपेड़-पौधों से हरे-भरे जंगलसाफ़ -सुथरे नदीनालेघर का अनाजदूध-दहीदालेंताज़ा सब्जीकिस चीज़ की कमी थी। फिरअचानक जि़ंन्दगी डरावनी लगने लगी। आतंकवाद ने मासूम लोगों को अपना निशाना बनाना शुरू किया। कई जगह मासूम लोगों की निर्मम हत्याएं हुई। जान बचानेकी खातिर इन लोगों को अपना सब कुछ भुला कर गाँव छोडऩा पड़ा। ये बात 90 के दशक की है।
मुआवजा तो दूर की बातइन लोगों को सरकारी राशन के लिए भी मारामारी करनी पड़ती है। विस्थापितों को इंसाफ  देने के राज्य और केंद्र सरकार चाहे जितने मर्जीदावे करेलेकिन सच्चाई कुछ और ही कहती है। पैंथर्स पार्टी की याचिका पर वर्ष 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू संभाग के दो हजार से अधिक विस्थापितों को राहत राशि राशन देने का आदेश दिया थामगर उस पर भी पूरा अमल नहीं हो पाया है।

नाजो अपने पति रिखी राम, 7 बेटों और 3 बेटियों के साथ इस कैंप में आई थीलेकिन आज उसके परिवार में 31 सदस्य हैंलेकिन रहने के लिए वही तीन छप्पर।

 "तीन कमरों में हमारा परिवार बड़ी मुश्किल से गुज़ारा करता है। बरसात के दिनों में हमारी मुश्किलें और भी बढ़ जाती हैं। गर्मियों में अगर मौसम साफ़  हो तो हम लोगकिसी तरह रात में बाहर सो कर या दिन में पेड़ों के नीचे बैठ कर गुजऱ-बसर कर लेते हैंये कहना है नाजो देवी का अपनी कैंप की जि़न्दगी के बारे में।   
राजौरीपुंछऊधमपुरडोडारामबन  रियासी जिले के विस्थापित अक्सर ये आरोप लगाते रहते हैं कि सरकार कश्मीर के विस्थापितों को सभी प्रकार की सुविधाप्रदान की है लेकिन उनकी अनदेखी की है। पिछले एक दशक से भी आधिक समय से ये लोग अपने हक की लड़ाई लड़ रहे है।

तलवाड़ा कैंप में रहने वाले कुल 994 परिवारों में से सिर्फ 665 को ही सरकार मुआवजा देती हैजबकि बाकि के 339 को सरकार ने सिर्फ      झुग्गी-झोपड़ी दे कर अपनापल्ला झाड़ लिया है। विस्थापितों की मानें तो कई-कई महीनों तक उन्हें मुआवजे का राशन नहीं मिलता। इसके अलावा  तो माइग्रेंट स्कूल में अध्यापकों की संख्या पूरीहै और  ही उनके टूटे-फू टे शेडों की सरकार द्वारा कभी मरम्मत करवाई गई है।

कैंप में चन्ना गाँव के दलीप सिंह कहते हैं, "आतंकवादिओं ने मेरी गर्भवती पत्नी और चार साल की बेटी की गोली मर कर हत्या कर दी। उस हमले में मुझे भी कईगोलियां लगींमगर मैं बच गया। कैंप में  कर मैने दूसरी शादी कई सालों के बाद की।दलीप कहते हैं, "पैसे  होने के कारन कारण मैं अपना इलाज ठीक से नहींकरवा सकाइसलिए मेरी सेहत अब भी खराब रहती हैमुझे और मेरे परिवार को सरकार की तरफ से कोई आर्थिक मदद नहीं मिलती।दलीप मजदूरी करके अपनापरिवार चलाता है।

उन दिनों की बातें याद करते हुए गाँव नरकोट के नंबरदारजो कैंप निवासी भी हैं, "अप्रैल 17, 1998 की बात हैआतंकवादियों ने हमारे गाँव में एक ही रात में 27 लोगोंकी हत्या कर दी।  अगले ही दिन हमने गाँव खाली कर दिया।"

माइग्रेट एक्शन कामेटी के अध्यक्ष बलवान सिंह कहते हैं, "10 वर्ष पहले डोडारियासी  रामबन के 1400 परिवारों को पंजीकृत किया था लेकिन सुविधा मुहैया करवानेसे उन्हें अभी तक सरकार ने महरूम रखा है।उन्होंने कहा कि कश्मीर से माइग्रेंट हुए लोगों को सरकार सभी प्रकार की सुविधा प्रदान कर रही है। लेकिन डोडारियासी रामबन के विस्थापितों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। "विस्थापित कश्मीरी पंडित और हम लोग एक तरह के हालात के शिकार हैंफि  भी हम से सौतेला बर्ताव हैसरकार का। हमने भी जानें गवाई हैंघर छोड़े हैं। हर तरह से बरबाद हुए हैं फि  हमें हमारा हक क्यों नहीं दिया जा रहा?" वो सवाल करते हैं। और अगले हि पल खुद हिजवाब भी  दे देते हैं, "हम लोग विस्थापित कश्मीरी पंडितों की तरह पढ़े-लिखे नहीं हैं। इसीलिए तो आज तक हमें इस लोकतंत्र में अपना हक वसूल करना नहीं आया।

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