Monday, February 25, 2013

अलसाई दुपहरी में दबे पाँव : शशांक दुबे!

चर्चित संस्‍मरणकार कान्‍ति‍कुमार जैन की पुस्‍तक ‘बैकुंठपुर का बचपन’ पर लेखक-पत्रकार शशांक दुबे की समीक्षा-
लिखने-पढ़ने के शौकीन किसी सम्‍वेदनशील पाठक के सिर पर यदि एक पिस्तौल तानकर उससे यह सवाल किया जाये कि साठ के दशक में हिन्‍दी साहित्य का जो शामियाना किसी अमीर की शादी में लगने वाले टैंट की तरह सुदूर फैला हुआ दिखाई देता था, सतर के दशक में उसके घटकर आधे हो जाने, आठवें दशक में एक चौथाई रह जाने और नब्बे के दशक में उसकी हैसियत ‘जंगल की सैर’ में लगाये जानेवाले ‘दस बाय दस’ के टैंट की तरह रह जाने और कहानी, कविता, उपन्यास, आलोचना की परखचियाँ उड़ जाने के बाद भी जिन लोगों ने छपे हुये अक्षरों की ताकत को छोटा नहीं होने दिया उनमे से कोई तीन नाम तत्काल बताओ तो दूसरा और तीसरा नाम लेते वक़्त भले ही उसे पल भर सोचना पड़े, लेकिन ‘कान्‍ति‍ कुमार’ के रूप में पहला नाम लेने में वह कतई देर नहीं लगायेगा। दरअसल ‘काव्यम् शास्त्रम् रसिकम्’ की तथाकथित चौथे दशक की अवधारणाओं के हैंग-ओवर में लिप्त आलोचक भले ही संस्मरण, यात्रा-वर्त्‍तांत, व्यंग्‍य और सिनेमा को साहित्य के हाशिए पर खड़ी विधा मानकर नाक-भौं सिकोड़ते रहे हों, हिन्‍दी साहित्य का गोवर्धन इन्हीं विधाओं के लेखकों ने ही थामा है और लघु-पत्रिकाओं के संसार में अपनी सक्रिय उपस्थिति से पाठकों को सदैव खुशदम करते रहे हैं। आज हर पाठक अपने हाथ आई लघु पत्रि‍का की अनुक्रमणिका पर निगाह मारते वक़्त बाईं और कहीं संस्मरण और दाईं और कहीं कान्‍ति‍ कुमार का नाम देखना चाहता है।
‘लौट कर आना नहीं होगा’, ‘जो कहूँगा सच कहूँगा’, और ‘अब तो बात फ़ैल गयी’ के रूप में रोचक, चित्‍ताकर्षक और ज़र्रा-ज़र्रा पठनीय संस्मरणों की त्रयी लिखने वाले ‘संस्मरण किंग’ कान्‍ति‍ कुमार एक बार फिर अपनी उसी धार और उसी तेवर के साथ ‘बैकुंठपुर में बचपन’ के जरिये उपस्थित हुए हैं। फर्क है तो बस इतना कि जहाँ अब तक वह हमें रामेश्‍वर शुक्ल अंचल, आचार्य रजनीश, शिव मंगल सिंह सुमन, हरिशंकर परसाई, शरद जोशी जैसे नामवरों के बहुविध आयामों से परिचित कराते रहे हैं, इस बार उन्होंने अपने संस्मरणों के केन्‍द्र में समाज के उस तबके को रखा है, जिसकी समाज में उपस्थिति तो है, लेकिन पूरी खामोशी के साथ। यह वह वर्ग है जहाँ केवल हारी-बिमारी में ही फल खाये जाते हैं, जहाँ केवल त्योहार के दिन ही जुआ खेला जाता हैं, जहाँ शादी-ब्याह में कपडे़ खराब होने की परवाह किये बगैर पीठ पर हल्दी के छापे मारे जाते हैं और जहाँ मेहमान के लिये घर में लाई गई मिठाई का पैकेट मेहमान के रवाना होने से पहले कूडे़दान के हवाले कर दिया जाता है। ये वे  लोग हैं, जिनमें न तो किसी बडी़ आकांक्षा की घोडी़ कुलाँचे मार रही है, न किसी बडे़ आक्रोश की चिंगारी खदबदा रही है। चालीस और पचास के दशक के भारतीय कस्बाई मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग के जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं को सूक्ष्मता से बयाँ करते इन संस्‍मरणों में तत्कालीन समय और समाज पूरी सघनता से मौजूद है। इन्हें रचते हुए कान्‍ति‍जी ने कभी तालाब के किनारे खडे़ होकर ढेला मारा है तो कभी कमीज उतार कर खुद तालाब में उतरे हैं। इन्हें पढ़ते हुए आम आदमी के जीवन की स्वाभाविक उठापठक को देख कभी पाठक के मुँह से ‘अरे, ये तो अपने जैसे ही हैं’ निकलता है तो कभी किसी का पतन देख यह बात निकलती है-
ऐसे तो न देखो के बहक जाएं कहीं हम,
आखिर तो इक इंसान हैं फरिश्ता तो नहीं हम।
कान्‍ति‍ कुमार के संस्मरणों में जिस प्रकार बचपन की शैतानियाँ हैं, मस्तियाँ हैं, अलसाई दुपहरी में किये जाने वाले प्रयोग और रात के सन्नाटे के रोमांच हैं, साँप को सीता की लट मानकर उनसे छेड़छाड़ की हिम्मत है और चूहों को बिल से खेंच निकालने की निरपेक्षता है, उन्हें वही किशोर हासिल कर सकता है, जो ‘राजा बेटा’ की तरह नहा-धोकर स्कूल पहुँचकर फिर वहाँ से सीधे घर वापस न आए और घर पहुँचकर तुरन्त पट्टेदार पायजामा पहनकर पहले ‘होम वर्क’ और फिर ‘होम के वर्क’ (मसलन बडे़ भाई साहब के कपड़ों की इस्त्री करना या पिताजी के हुक्के में तम्‍बाकू भरना या माँ के चूल्हे के लिये लकडियों की दो फाँक करना जैसे काम) में न जुट जाये। जीवन के तिलस्मी खजाने को कोई ‘रामपुर का लक्ष्मण’ नहीं खोज सकता। इसके लिये तो एक घुमंतू, मनमौजी, अपने परिवेश के प्रति कुछ ज्यादा ही उत्सुक किशोर का जिगर चाहिये।
गाँव के संस्मरण पढ़ते वक्‍त पाठकों को सबसे बडा़ खतरा इस बात का रहता है कि कहीं लेखक के शरीर में यकायक फणीश्‍वरनाथ रेणु की आत्मा न समा जाये। दरअसल होता यूँ है कि लोकप्रिय भाषा में बिल्कुल न समझे जाने वाले या कोई दूसरा ही अर्थ बतानेवाले इन शब्दों से हमारे लेखक कई बार इतने प्रभावित हो जाते हैं कि कई-कई शब्द या वाक्य या मौका लगा तो पूरे के पूरे पैरे पेल देते हैं। ऐसा करते वक्‍त उनका हाथ आँचलिक शब्दकोश पर, सिर आलोचक के कदमों पर और निगाह अकादमी के पुरस्कार पर होती है। लेकिन कान्‍ति‍ कुमार जी का इस प्रकार के अबूझमाड़ में कतई विश्‍वास नहीं है। अव्वल तो वे आँचलिक शब्दों का प्रयोग बहुत विवक से करते हैं, बिल्कुल खीर में चावल की तरह, चावल में कंकर की तरह नहीं। दूसरे, हर ऐसे शब्द को आम बोलचाल की भाषा में व्याख्यातीत भी करते चलते हैं। मसलन किताब में एक अध्याय है- ‘चरकट्टा’, जिसे पढ़कर प्रभाष जोशी का ‘दारूकुट्टा’ याद आ जाता है (हालाँकि प्रभाषजी ने अपने लेखों में ‘घुन्ना’, ‘भेरू’, ‘लड्डूगुरु’, ‘ढेके दिखाना’ जैसे कई मालवी शब्दों का सटीक प्रयोग किया है, लेकिन दिल्ली के भाई लोगों को यह शब्द मन-कर्म और वचन से अपनेवाला लगा। इसलिये न सिर्फ यह शब्द पॉपुलर हुआ, बल्कि प्रभाषजी ‘दारूकुट्टाफेम’ भी हो गये। बावजूद इसके कि उन्होंने कभी दारू छुई तक नहीं।)। बहरहाल वह इस शब्द को खोलकर बताते हैं कि चरकट्टा यानी चारा काटने वाला। इसी चरकट्टे के बारे में वह आगे लिखते हैं, ‘वह घोडे़ को खरहरा करता। खरहरा यानी लोहे की कंघी’। इस किस्म के बारीक विश्‍लेषणों का लाभ यह होता है कि पाठक स्मृतियों के रोचक संसार में डुबकी लगाकर निकलते-निकलते कच्ची माटी से सने देसज शब्दों की पोटली भी उठाए लिये चलता है, जो आगे चलकर उसे भाषाई दृष्टि से समृद्ध करते हैं। बरसों पहले राज कपूर की फिल्म ‘श्री चार सौ बीस’ में ‘प्यार हुआ इकरार हुआ है, प्यार से फिर क्यूँ डरता है दिल’ गीत लिखते हुए गीतकार शैलेन्‍द्र ने ‘रातें दसों दिशाओं से कहेगी अपनी कहानियाँ’ पंक्‍ति‍ लिखी थी। तो संगीतकार शंकर (जयकिशन) ने कहा था कि दिशायें तो चार होती हैं, दस कहाँ से आ गईं। तब शैलेन्द्र ने चार लोकप्रिय, चार पैंतालीस डिग्री पर स्थित, एक आकाश और एक पाताल मिलाकर दस दिशायें बताई थीं। शंकर सहमत तो हो गये, लेकिन उन्होंने टिप्पणी की कि मैं तो समझ गया मगर श्रोता कैसे समझेंगे ? शैलेन्द्र का जवाब था, ‘हमारा काम सिर्फ श्रोताओं का मनोरंजन करना नहीं है, उनकी रुचियों का परिष्कार करना भी है।’ कान्‍ति‍जी भी पाठक को आह्लादित करने के साथ-साथ उनके ज्ञान का संवर्धन करते चलते हैं।
कुछ परिवारों में अब भी ऐसी परम्‍परा है जिसके अंतर्गत घर का मुखिया या ऊँची आवाज वाला सदस्य कोई अच्‍छा साहित्‍य पढ़कर सुनाता है और पूरा परिवार उसका लुत्फ लेता है। बेशक प्रतिशत के लिहाज से ऐसे घरों की संख्या काफी छोटी या यूँ कहें कि लगभग नगण्य होगी, लेकिन फिर भी हर शहर मे ऐसे कुछ घर तो होंगे ही। आमतौर पर ऐसे घरों में संस्‍मरण सुनाते वक्‍त वाचक को इस बात का खुटका (भय) समानांतर रूप से सताता रहता है कि अभी कहीं कोई औरत बेपर्दा होगी, अभी कहीं कोई दुःखी आत्मा ेेे के सफिक्स या प्रिफिक्स के साथ आधे अपशब्द कहेगी, अभी कहीं ढक्कन खुलेगा, अभी कहीं गिलास ढुलेगा, यह डर वैसा ही है जैसा मुश्किल दौरों में भारतीय टीम को बैटिंग करते देख लगता है, अब गये-तब गये-सब गये। ‘बैकुंठपुर में बचपन’ पढ़ते वक्‍त ऐसा कोई भय नहीं सताता। सस्वर रचना पाठ करते समय कहीं भी आवाज मंद करने की, कुछ शब्द या पंक्‍ति‍याँ काटने की जेहमत उठाने की कोई जरूरत नहीं। हो भी कैसे ? आखिर आम आदमी के ये संस्मरण आम आदमी की भाषा में आम आदमी के लिये ही तो लिखे गये हैं। इसलिये इन्हें खुलकर पढा़ जा सकता है। सिर्फ पढा़ ही नहीं, गुना भी जा सकता है और आने वाले कल के लिये सहेज कर भी रखा जा सकता है, क्योंकि ये संस्मरण हमें समाज के अमिताभ बच्चन या सचिन तेंदुलकर जैसे ‘सुपर हीरोज’ की स्थूलताओं से नहीं, बल्कि बैंडमास्टर और मुश्किल खाँ जैसे ‘अनसंग हीरोज’ की सूक्ष्मताओं से परिचित कराते हैं।
पुस्‍तक : बैकुंठपुर में बचपन, पृष्‍ठ : 224
प्रकाशक: सामयि‍क बुक्‍स, 3320-21, जटवाड़ा दरि‍यागंज,
एन.एस. मार्ग, नई दि‍ल्‍ली- 110002

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