Tuesday, February 26, 2013

हकीकत से आंख चुराती रिपोर्ट!


♦ महेंद्र सुमन
Press_Council_of_Indiaबिहार के मीडिया पर प्रेस काउंसिल की हालिया रिपोर्ट पता नही क्यों संपादकों की बजाय प्रबंधकों को टारगेट करती है और इस कमजोर व भ्रामक प्रस्थापना पर विज्ञापन का अर्थशास्त्र गढ़ने की कोशिश करती है कि बिहार जैसे पिछड़े राज्य में बड़े अखबारों के विज्ञापन के मुख्य स्रोत राज्य सरकार के विज्ञापन हैं।
भारतीय मीडिया पर राबिन जैफ्री ने अपने शोधपूर्ण अध्ययन में वर्नाकुलर प्रेस की विज्ञापनों में बढ़ती हिस्सेदारी एवं स्थानीय उभरते गैरसरकारी विज्ञापन स्रोतों जैसे उदीयमान रूझानों को विस्तार से चिन्हित किया है। तेजी से विस्तार लेती व एकीकृत होती भारतीय अर्थव्यवस्था में बिहार कारपोरेट उत्पादों का एक बड़ा उभरता हुआ बाजार है (मिसाल के लिए अखिल भारतीय स्तर पर आटोमोबाइल की बिक्री में गिरावट के विपरीत बिहार में इसकी बिक्री में उछाल को लें।) इसके अलावा, राजधानी पटना एक बड़ा कोचिंग हब है जिसकी बाजारी रणनीति आक्रामक रूप से विज्ञापनों पर केंद्रित रहती है। बिहारी अखबारों का सामान्य पाठक भी जान सकता है कि रोजाना इनमें विज्ञापनों की कितनी भरमार रहती है।
रिपोर्ट में बिहार में पत्रकारिता की गौरवशाली परंपरा का बिलकुल सही गौरवगान किया गया है। मगर लंबे अरसे से चली आ रही उस वर्चस्वशाली धारा का जिक्र नहीं किया गया है जो सामाजिक-राजनीतिक रूप से अत्यंत पूर्वाग्रस्त सत्तालोलुप अवसरवादियों की रही है। कोई अर्थशास्त्र नहीं बल्कि सामाजिक-राजनीतिक कारणों से ही मीडिया ‘जंगल राज‘ में तत्कालीन लालू-राबड़ी सरकार के खिलाफ विषवमन कर रहा था, और मुख्यतः मीडिया का सामाजिक-राजनीतिक चरित्र ही है जिसके कारण आज वह नीतीश का कीर्तिगान कर रहा है। हकीकत से आंखें चुराए उपरोक्त सामाजिक-राजनीतिक अवसरवादी विषवमन व कीर्तिगान के दो अति ध्रुवों से बाहर नहीं निकल सकते। नीतीश का चर्चित मीडिया मैनेजमेंट उनके बहुचर्चित ‘ग्रोथ मिराकल‘ की तरह ही आधी हकीकत आधा फसाना है।
Mahendra Suman(सामाजिक व रातनीतिक कार्यकर्ता महेंद्र सुमन पटना में रहते हैं।

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