साल 2008 में अहमदाबाद धमाकों के बाद लेखक द्वारा लिखा गया यह लेख हैदराबाद बम धमाकों के संदर्भ में पुन:प्रकाशित किया जा रहा है।
मेरे दोस्त कहते हैं मैं अक्सर महिलाओं के खयाल में रहता हूं, सच कहते हैं।
देखो ना, जाने कब फटा था अहमदाबाद में बम, जाने कब आयी थी बिहार में बाढ़, फि र भी दो औरतों को अपने साथ लिए घूम रहा हूं,पीछा ही नहीं छोड़तीं कमबख्त।
एक तो मर भी चुकी है। फ ल के ठेले के पास खड़ी थी, पीली साड़ी पहन कर, अमरूद ले रही थी, दाहिने हाथ में प्लास्टिक की थैली थी,बाएं हाथ में कुछ छोटे नोट दबा रखे थे। ठेले पर सेब भी थे, अनार भी, लेकिन अमरूद सस्ता होता है न।
अक्सर सोचता हूं उसके बारे में। कौन पीछे उसकी राह देखता होगा उस शाम, किस गाँव कीकितनी घोर गरीबी छोड़ कर उसका परिवार शहर आया होगा, ताकि कजऱ् से फांसी न लगानीपड़े। किस से कह कर आयी होगी 'बस अभी आयी बेटा, अमरूद लाने जा रही हूं' कौन नाराज़ होताहोगा, 'इत्ती देर हो गई, अमरूद लाने में, इत्ती देर लगती है क्या'? सच है, अमरूद लाने में इत्ती देरकहां लगती है? हां, मरने में थोड़ा वक्त ज़रूर लग जाता है। धीमी-धीमी मौत मरते हैं ना इसमुल्क के करोड़ों लोग।
अहमदाबाद के उस बाज़ार से सैकड़ों मील दूर, बिहार के मधेपुरा जिले के लखीपुरा गाँव में रहती है दूसरी औरत मरी नहीं है अभी, हां मरने चली थी उस रोज़। गाँव आयीरक्षा नाव वापस जाने को थी, खाना बांट कर नेशनल डिज़ास्टर रेस्पोंस फ ोर्स के कमांडेंट डैनियल अधिकारी के पास खाने का आखिऱी थैला बचा था, और सारा गाँवभूखा था। जैसे ही थैला हवा मैं उछला, वो पागल औरत पानी में कूद गयी, पेट जो भरना था परिवार का। मर सकती थी, लेकिन भूख से मरने से तो ज़्यादा इज्ज़तदारहोती ये मौत।
थैली उसके हाथ में आयी कि एक और आदमी कूद गया पानी में, लड़ते रहे वो कितनी देर तक, मुझे इस कहानी का अंत नहीं मालूम, पता नहीं उस पागल औरत के घरउस दिन रोटी बनी या नहीं, क्या पता अब तक जिंदा भी है या मर गई, अगली नाव की राह देखते-देखते। अक्सर दिल्ली में लाल बत्ती होने पर, गाड़ी में बैठे-बैठे भीखमांगने वाले बच्चों को देख कर सोचता था, अगर उन दो औरतों के बच्चे कभी भटकते हुए आमने-सामने मिल गए तो पता है क्या बोलेंगे एक दूसरे से?
'माँ को कभी घर से मत निकलने देना।'

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