‘बड़ों का बचपन’ पुस्तक एकलव्य, भोपाल का एक बेहद रोचक प्रकाशन है। इसमें संजीव ठाकुर ने दुनिया भर के 29 मशहूर हस्तियों के बचपन की यादें, शरारतें, शिक्षा, दीक्षा आदि दी हैं । देसी-विदेशी और राजनीतिज्ञों से लेकर लेखक, फिल्मी हस्तियाँ सभी शामिल हैं । महत्वपूर्ण लेखकों में गोर्की, शरतचन्द्र चटर्जी, फकीर मोहन सेनापति, अमृता प्रीतम, तसलीमा नसरीन, पांडेय बेचैन शर्मा उग्र आदि हैं । बहुत रोमांचक है लेखकों के बचपन को जानना । कितनी गरीबी और संघर्षों में बीता गोर्की का बचपन । बचपन में पिता जल्दी गुजर गये तो कभी नानी के घर तो कभी दूसरे पिता के । खाने-पीने तक का ठिकाना नहीं, पढ़ने की बात तो दूर । लेकिन पढ़ने का शौक न जाने कैसे लग गया। इतना कि मॉं के बटुए से पैसे चुराकर परियों की कहानी खरीद लाया । चोरी पकड़े जाने पर खूब पिटाई हुई । गोर्की लिखते हैं कि मुझे पिटने का डर नहीं था, दु:ख हुआ किताब के छिन जाने का । कौन सा काम नहीं किया गोर्की ने बचपन में । रविवार की सुबह बोरी लेकर शहर में निकल जाता और फटे कपड़े, लोहे की कील, पुरानी हड्डियाँ, रद्दी कागज जमा करके कबाड़ी की दुकान में बेच आता । थोड़ा और बड़ा हुआ तो बेकरी में काम करने लगा। इसी बचपन से पैदा हुआ दुनिया का महान कथाकार गोर्की ‘माँ’, ‘मेरा बचपन’ आदि रचनाओं का लेखक।
बंगाल के लेखक शरतचन्द्र का बचपन भी ऐसे ही अभावों में बीता लेकिन उतना ही शरारतपूर्ण । हुक्के की चिलम में पत्थर भर देते तो कभी स्कूल की छुट्टी जल्दी करने के लिए घड़ी की सूई आगे बढ़ा दी। भूत-प्रेतों को सरेआम चुनौती देने के लिए उन्हीं के अड्डे में खेलते । यही व्यक्ति आगे चलकर ‘चरित्रहीन’, ‘श्रीकांत’ जैसे महान उपन्यासों का लेखक बना । प्रसिद्ध फ्राँसीसी विचारक रूसो ने तो कौन सी शरारत, चोरी और गुंडई नहीं की । न स्कूल में टिकता, न किसी काम में । फ्राँस की क्राँति के पीछे रूसो की स्वत्रंता की अवधारणा प्रमुख थी । चार्ली चैपलिन की माँ अदाकारा थीं जब उनको गले की बीमारी हुई तो चैपलिन को स्टेज पर आना पड़ा । आर्थिक परिस्थितियाँ इतनी दयनीय थीं कि चैपलिन शाम को नाटकों में काम करते और दिन में अखबार बेचते । खिलौने बनाए, बढ़ई की दुकान पर काम किया । अमृता प्रीतम, तसलीमा नसरीन सभी की ऐसी ही कहानियाँ । अंग्रेजी के कहर से प्रसिद्ध बंगला लेखिका तसलीमा भी नहीं बचीं । जहाँ गणित और सभी विषयों में खूब नम्बर आए अंग्रेजी में सिर्फ तैंतीस । मुश्किल से पास हुईं । डॉक्टर पिता ने रात-दिन अंग्रेजी रटाई तो अगली बार नंबर और कम हो गये । आज तसलीमा के नाम पर बंगाली की तीस मशहूर किताबें हैं और अंग्रेजी भी फर्राटे से बोलती हैं ।
राजनेताओं में गाँधी, अम्बेडकर, माओ, इंदिरा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री, अब्दुल कलाम आदि हैं । गाँधी की ईमानदारी को कौन नहीं जानता ? बचपन में चोरी की तो तुरन्त गलती भी मान ली पत्र लिखकर । पत्र पढ़कर पिता की आँखों से आँसू बहने लगे । यानी गलती किस से नहीं होती । बड़ी बात है कि उसे स्वीकार करना । भूतपूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम का बचपन तमिलनाडु के रामेश्वरम में बीता । बचपन में उन्होंने भी अखबार बेचे । कौन भूल सकता है अम्बेडकर के बचपन को । अछूत माने गये, दुत्कारे गये । आज समानता के लिये देश के मसीहा ।
बहुत प्रेरणादायक प्रसंगों से भरी पड़ी है पूरी किताब । बच्चे ऐसे किताबें पढ़कर ही पुस्तकों की तरफ आते हैं । संजीव ठाकुर का कहना सही है कि मनुष्य के जीवन का सबसे सुनहला अध्याय बचपन ही होता है । सम्भावनाओं का अनंत आकाश लिये ।
एकलव्य प्रकाशन को इस सीरिज में और भी पुस्तकें अलग-अलग निकालनी चाहिए । जैसे लेखकों का बचपन, वैज्ञानिकों, राजनीतिज्ञों, फिल्मी नायक-नायिका आदि । हर बच्चे के लिये जरूरी किताब ।
पुस्तक : बड़ों का बचपन
लेखक : संजीव ठाकुर
प्रकाशक : एकलव्य प्रकाशन, ई-10, बी.डी.ए. कॉलोनी, शंकर नगर, शिवाजी नगर, भोपाल- 462016
मूल्य : 90 रुपये
पृष्ठ : 175
चित्रांकन : प्रदीप चिंचालकर
लेखक : संजीव ठाकुर
प्रकाशक : एकलव्य प्रकाशन, ई-10, बी.डी.ए. कॉलोनी, शंकर नगर, शिवाजी नगर, भोपाल- 462016
मूल्य : 90 रुपये
पृष्ठ : 175
चित्रांकन : प्रदीप चिंचालकर

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