इलाहाबाद में संगम के किनारे कुंभ सजा है। बांस-बल्लियों के सहारे बसा एक पूरा शहर। एक अलग समाज…! इस समाज को सुरक्षा भी चाहिए ही। सुरक्षा के लिए उत्तर प्रदेश पुलिस, उत्तराखंड पुलिस से लेकर रैपिड ऐक्शन फोर्स के करीब एक लाख जवान दिन-रात, चैबीसों घंटे खड़े रहते हैं। बल्लियों के सहारे ही थाने बने हैं। पुलिस वालों के आसियाने खड़े हैं।
(विकास कुमार युवा पत्रकारों की उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्त्व करते हैं जो सरोकारी पत्रकारिता कर रहे हैं। विकास कलम चलाने में जितने माहिर हैं उतनी ही खूबसूरती से उनकी अंगुलियां कैमरे पर भी चलती हैं। फिलहाल तहलका से संबद्ध। यह रिपोर्ताज उनके ब्लाग
इस सब के अलावा जो एक बात चैंकाती है वो है मेला पुलिस का नजरिया, बात करने का ढंग और आम लोगों से उनकी सहजता। एक पल को तो विश्वास ही नहीं होता कि ये पुलिस हमारे देश की है! कुंभ में जितनी सहजता से मेला पुलिस के जवान श्रद्धालुओं से बातचीत करते हैं वैसा मैंने आजतक नहीं देखा था। मैं दूसरे शाही स्नान से एक दिन पहले की शाम संगम किनारे था। सूरज डूब हो रहा था। लाइट जल गई थी। श्रद्धालुओं की भीड़ लगातार गंगा में डुबकी लगा रही थी।
पुलिस को माईक से यह निर्देश मिल रहा था कि शाम हो जाने की वजह से अब श्रद्धालुओं को वे गंगा में स्नान करने से रोकें। इसके बाद मैंने जो देखा उसपर सहज विश्वास करना मुश्किल था। मेरे पास ही एक परिवार नहाने के लिए खुद को तैयार कर रहा था। तभी एसपी रैंक का एक पुलिस अधिकारी परिवार के पास आता है। हाथ जोड़ कर कहता है, ‘माता जी, शाम हो गयी है। अभी गंगा में नहाने मत जाइये। कल सुबह नहा लीजिएगा।’
इतनी विनम्रता से पुलिस के किसी अधिकारी को आम लोगों से बात करते हुए मैंने अब तक नहीं देखा था। मुझे एक सुखद आश्चर्य हुआ। मैंने उस पुलिस वाले के चेहरे को और उनके कंधे पर लगे बैच को गौर से देखा। वह यूपी पुलिस का अधिकारी था। संगम से लौटते हुए मैंने देखा कि चितकबरे वर्दी में एक पुलिस जवान किसी बूढ़ी महिला का हाथ पकड़ कर उसे सड़क पार करा रहा था। बगैर झल्लाए… बिना चिल्लाए… पूरी जिम्मेवारी के साथ।
मौनी अमावस्या वाले दिन करीब तीन करोड़ लोग संगम पहुंचे थे। इतनी बड़ी संख्या में लोगों को संभालने का काम बगैर डराये, प्रेम और सम्मान से ‘मेला पुलिस’ ही कर सकती है। उत्तर प्रदेश के बाकी हिस्सों सहित पूरे देश में पुलिस का ऐसा मानवीय चेहरा बिरले ही दिखाई देता है। और न ही पुलिस के जवान अपनी ड्यूटी ही इतनी जिम्मेवारी से करते हैं। यही कारण है कि जब इतनी बड़ी संख्या का एक छोटा सा हिस्सा एक शाम इलाहाबाद स्टेशन पर पहुंचता है तो एक भगदड़ मच जाती है और छत्तीस लोगों की जान चली जाती है।

No comments:
Post a Comment