लखनऊ। नए वित्तीय वर्ष का आगामी बजट अगले माह सदन में पेश किया जाएगा। जिसके बाद पता चलेगा कि किस क्षेत्र के लिए कितनाबजट आवंटित किया गया। देश की दो तिहाई जनता भले ही गाँवों में बसती हो लेकिन इसे सरकार की सुस्ती ही कहेंगे कि साल 2012-2013 में ग्रामीण विकास से जुड़ी योजनाओं के लिए आवंटित कुल बजट का एक तिहाई भाग खर्च ही नहीं किया जा सका। 99 हज़ार करोड़रुपये इस क्षेत्र को जारी किए गए जिसमें से 30 करोड़ हजार खर्च ही नहीं किए जा सके।
मनरेगा जैसी गाँवों से जुड़ी योजनाओं में तकरीबन 11 हज़ार करोड़ रुपये बिना खर्च ही लौटाए गए। इंदिरा आवास योजना के लिए आवंटितधनराशि में से 5,859 करोड़ रुपये खर्च नहीं किए जा सके। मनरेगा के लागू होने के चार साल बाद यानि 2008-2009 में इस योजना केतहत, रोजगार तलाश रहे केवल 14 फ ीसदी लोगों को वादे के हिसाब से 100 दिन का रोजगार मिला। आने वाले बजट से गाँवों मेंरोजगार से जुड़ी उम्मीदों के बाबत रूरल रिलेशन के संस्थापक प्रदीप लोखंडे कहते हैं, "बजट में अगर कुछ ऐसा प्रावधान हो जिससे हरतालुका में 10 हज़ार नए रोजगार पैदा किए जा सकें। इससे कई समस्याएं दूर की जा सकेंगी। गाँवों में लोगों को यह समस्या है कि सरकारने ग्रामीणों के के लिए पैसा तो खातों में डाल दिया लेकिन लोगों को ये मालूम ही नहीं है कि वो पैसा उन्हें कैसे मिल सकता है। कई खाते हैंजो बंद पड़े हैं। लोगों को आर्थिक रुप से भी साक्षर किए जाने की बड़ी जरूरत है, ताकि वो ये जान सकें कि योजनाओं का लाभ कैसे मिलपाएगा।"
जहां एक ओर गाँवों से जुड़े लोगों को इस बजट से खास उम्मीदें हैं, वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें इस बजट से कोई विशेष आशा नहीं है।
फ ार्मर फ ोरम, सहारनपुर के अध्यक्ष और आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य योगेश दहियाकहते हैं, "देश की दो तिहाई जनता कुपोषण की शिकार है। 80 फीसदी ग्रामीण जनसंख्या 20 रुपये प्रतिदिन सेज्यादा नहीं कमाती। ऐसे में ये लोग क्या शिक्षा पर ध्यान देंगे और क्या स्वास्थ्य पर। देश में 3 लाख किसानआत्महत्या कर चुके हैं, कई और किसान आत्महत्या की करने की लाइन में हैं। किसी और पेशे में इतनीआत्महत्या नहीं होती। बजट में ग्रामीणों के लिए शामिल 15-16 हज़ार करोड़ रुपये में से 90 फीसदी सरकारीविभागों के वेतन में खर्च हो जाते हैं, 5 फीसदी रखरखाव आदि पर खर्च दिए जाते हैं। आम जनता के लिए बाकीबचता ही क्या है।"
योगेश आगे कहते हैं, "सारा पैसा बंदरबांट में चला जा रहा है। कायदे से लोगों को खुद तय करना चाहिए कि 2014में उन्हें गाँवों के लिए कैसा बजट चाहिए। हमें पारंपरिक बजट की जगह रचनात्मक बजट की जरूरत है।"
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 90 के दशक में खेती से जुड़ी योजनाओं में कुल बजट का तकरीबन 16 फीसदीआवंटित हुआ जो कि साल 2000 से 2010 के बीच घटकर 14.8 फीसदी रह गया। 2008-2009 में केन्द्रसरकार द्वारा सकल घरेलू उत्पाद का 3.3 फीसदी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में खर्च होता था जो 2011-2012 में घटकर2.3 सदी हो गई।
ग्रामीण विकास मंत्रालय की एक रिपोर्ट में बजट को लेकर चिंता जताते हुए कहा गया है, "खेती के क्षेत्र में बजटकी घटती प्राथमिकता और खेती से जुड़ी लागत में लगातार हुई बढ़ोत्तरी की वजह से खेती से होने वाली आय औरग्रामीण जनता की क्रय क्षमता में कमी आई है। वहीं, किसानों की आत्महत्या की दर और ग्रामीणों में पनपतेअसंतोष में बढ़ोत्तरी हुई है। उम्मीद की जा रही थी कि बजट खेती के क्षेत्र में हो रही इस कमी को पूरा करने कीओर ध्यान देगा लेकिन लगता है कि बजट की प्राथमिकताओं में ये क्षेत्र काफ ी नीचे है।"
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